श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 394, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ें| १४ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६१ | ३७१ |
|---|
श्रीरामकृष्ण (शिक्षक से) – मूर्तिपूजन में दोष क्या है? वेदान्त में हैं, जहाँ 'अस्ति, भाति और प्रिय' है, वहीं उनका प्रकाश है, इसलिए उनके सिवाय और किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है।
“और देखो, छोटी छोटी लड़कियाँ कितने दिन गुड़िया लेकर खेलती हैं? जितने दिन तक उनका विवाह नहीं होता और जितने दिन तक वे पति-सहवास नहीं करतीं। विवाह हो जाने पर गुड़ियाँ-गुड्डों को उठाकर सन्दूक में रख देती हैं। ईश्वरलाभ हो जाने पर फिर मूर्तिपूजन की क्या आवश्यकता है?”
मणि की ओर देखकर श्रीरामकृष्ण कहते हैं – “अनुराग होने पर ईश्वर मिलते हैं। खूब व्याकुलता होनी चाहिए। खूब व्याकुलता होने पर सम्पूर्ण मन उन्हें अर्पित हो जाता है।
“एक आदमी के एक लड़की थी। बहुत कम आयु में लड़की विधवा हो गयी थी। पति का मुख उसने कभी न देखा था। दूसरी स्त्रियों के पतियों को आते-जाते वह देखती थी। उसने एक दिन कहा, 'पिताजी, मेरा पति कहाँ है?' उसके पिता ने कहा, 'गोविन्दजी तेरे पति हैं। उन्हें पुकारने पर वे तुझे दर्शन देंगे।' यह सुनकर वह लड़की द्वार बन्द करके गोविन्द को पुकारती और रोती थी। वह कहती थी – 'गोविन्द! तुम आओ, मुझे दर्शन दो, तुम क्यों नहीं आते?' छोटी लड़की का यह रोना सुनकर गोविन्दजी स्थिर न रह सके। उसे उन्होंने दर्शन दिए।
“बालक जैसा विश्वास। बालक माँ को देखने के लिए जिस तरह व्याकुल होता है वैसी व्याकुलता चाहिए। इस व्याकुलता के होने पर समझना चाहिए कि अरुणोदय हुआ। इसके बाद सूर्योदय होगा ही। इस व्याकुलता के बाद ही ईश्वरदर्शन होता है।
“जटिल बालक की कथा आती है। वह पाठशाला जाता था। कुछ जंगल की राह से पाठशाला जाना पड़ता था; इसलिए वह डरता था। उसने अपनी माँ से यह कहा। माता ने कहा, 'डर क्या है? तू मधुसूदन को पुकारना।' बच्चे ने पूछा, 'मधुसूदन कौन है?' माता ने कहा, 'मधुसूदन तेरे दादा होते हैं।' जब अकेले में जाते समय वह डरा, तब एक आवाज लगायी – 'मधुसूदन दादा!' कहीं कोई न आया। तब वह, 'कहाँ हो मधुसूदन दादा! जल्दी आओ, मुझे बड़ा डर लग रहा है' कहकर जोर जोर से पुकारते हुए रोने लगा। मधुसूदन न रह सके। आकर कहा, 'यह हैं हम, तुझे भय क्या है?' यह कहकर उसे साथ लेकर वे पाठशाला के रास्ते तक छोड़ आए, और कहा, 'तू जब बुलाएगा तभी मैं दौड़ा जाऊँगा, भय क्या है?' यही बालक का विश्वास है! यही व्याकुलता है!
“एक ब्राह्मण के यहाँ भगवान् की सेवा होती थी। एक दिन किसी काम से उसे किसी दूसरी जगह जाना पड़ा। वह अपने छोटे बच्चे से कह गया, 'आज श्रीठाकुरजी का भोग लगाना, उन्हें खिलाना।' बच्चे ने ठाकुरजी का भोग लगाया, परन्तु ठाकुरजी चुपचाप