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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 430, कुल 711 में से

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पृष्ठ 430
२४ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६९४०७

जागृत होती है। इसके बिना जागृत हुए ईश्वर के दर्शन नहीं होते। तुम एकाग्रता के साथ निर्जन में गाया करना -

‘‘‘जागो माँ कुलकुण्डलिनी! तुम नित्यानन्द-स्वरूपिणी!
प्रसुप्तभुजगाकारा आधारपद्मवासिनी!’

‘‘गाना गाकर ही रामप्रसाद सिद्ध हुए थे। व्याकुल होकर गाना गाने पर ईश्वरदर्शन होते हैं।’’

मणि – जी हाँ, यह सब एक बार करने से ही मन का खेद मिट जाता है।

श्रीरामकृष्ण – अहा! खेद मिट जाता है – सत्य है।

‘‘योग के सम्बन्ध की दो-चार बातें तुम्हें बतला देनी चाहिए।

गुरू ही सब करते हैं। नरेन्द्र स्वतः सिद्ध

‘‘बात यह है कि अण्डे के भीतर बच्चा जब तक बड़ा नहीं हो जाता तब तक चिड़िया उसे नहीं फोड़ती।

‘‘परन्तु कुछ साधना करनी चाहिए। गुरु ही सब कुछ करते हैं, परन्तु अन्त में कुछ साधना भी करा लेते हैं। बड़े पेड़ को काटते समय जब लगभग काटना समाप्त हो जाता है तो कुछ हटकर खड़ा हुआ जाता है। पेड़ फिर आप ही हरहराकर टूट जाता है।

‘‘जब नाली काटकर पानी लाया जाता है, और जब वह समय आता है कि थोड़ासा ही काटने से नहर के साथ नाली का योग हो जाय, तब नाली काटनेवाला कुछ हटकर खड़ा हो जाता है। तब मिट्टी भीगकर धँस जाती है और नहर का पानी हरहराकर नाली में घुस पड़ता है।

‘‘अहंकार, उपाधि, इन सब का त्याग होने के साथ ही ईश्वर के दर्शन होते हैं। मैं पण्डित हूँ, मैं अमुक का पुत्र हूँ, मैं धनी हूँ, मैं मानी हूँ, इन सब उपाधियों को त्याग देने से ही ईश्वर के दर्शन होते हैं।

‘‘ईश्वर ही सत्य हैं और सब अनित्य – संसार अनित्य है – इसे विवेक कहते हैं। विवेक के हुए बिना उपदेशों का ग्रहण नहीं होता।

‘‘साधना करते करते ही उनकी कृपा से लोग सिद्ध होते हैं। कुछ परिश्रम भी करना चाहिए। इसके बाद दर्शन और आनन्द।

‘अमुक स्थान पर सोने का घड़ा गड़ा हुआ है, यह सुनते ही मनुष्य दौड़ पड़ता है और खोदने लग जाता है। खोदते खोदते सिर से पसीना निकल जाता है। बहुत देर तक खोदने के बाद कहीं कुदार में ठनकार आती है। तब कुदार फेंककर वह देखने लगता है कि घड़ा निकला या नहीं? घड़ा अगर दीख पड़ा तब तो उसके आनन्द का पारावार नहीं रह जाता – वह नाचने लगता है।

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