श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ दिसम्बर, १८८३
“घड़ा बाहर लाकर उसमें से मुहरें निकालकर वह गिनता है। तब कितना आनन्द होता है! दर्शन, स्पर्श और सम्भोग – क्यों?” मणि – जी हाँ। श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप हो रहे। फिर कहने लगे – “जो मेरे अपने आदमी हैं, उन्हें डाँटने पर भी वे आएँगे। “अहा! नरेन्द्र का कैसा स्वभाव है! माँ काली को पहले उसके जी में जो आता था वही कहता था। मैंने चिढ़कर एक दिन कहा था ‘मूर्ख, तू अब यहाँ न आना।’ तब वह धीरे धीरे जाकर कुछ काम करने लगा। जो अपना आदमी है, उसको तिरस्कार करने पर भी वह नाराज नहीं होता – क्यों?” मणि – जी हाँ। श्रीरामकृष्ण – नरेन्द्र स्वतःसिद्ध है। निराकार पर उसकी निष्ठा है। मणि (सहास्य) – जब आता है तब एक महाभारत रच लाता है। श्रीरामकृष्ण आनन्द से हँसते हुए कहते हैं – “हाँ सच हैं।”
(४)
दूसरे दिन मंगलवार, २५ दिसम्बर, कृष्णपक्ष की एकादशी है। दिन के ग्यारह बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण ने अभी भोजन नहीं किया। मणि और राखाल आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के कमरे में बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण (मणि से) – एकादशी करना अच्छा है। इससे मन बहुत पवित्र होता है और ईश्वर पर भक्ति होती है, समझे? मणि – जी हाँ। श्रीरामकृष्ण – धान की लाही और दूध – यही खाओगे, क्यों?