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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 433

४१० श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ दिसम्बर, १८८३

के नीचे एक साधु अकेले खटिया पर बैठे हैं। देखते ही वे साधु के पास पहुँचे और आनन्द के साथ उनसे हिन्दी में वार्तालाप करने लगे।

श्रीरामकृष्ण (साधु के प्रति) - आप किस सम्प्रदाय के हैं - गिरि या पुरी कोई उपाधि है क्या?

साधु - लोग मुझे परमहंस कहते हैं।

श्रीरामकृष्ण - अच्छा, अच्छा। शिवोऽहम् - यह अच्छा है। परन्तु एक बात है। यह सृष्टि, स्थिति और प्रलय सभी कुछ हो रहा है, उन्हीं की शक्ति से। यह आद्याशक्ति और ब्रह्म अभिन्न हैं। ब्रह्म को छोड़कर शक्ति नहीं होती। जिस प्रकार जल को छोड़कर लहर नहीं होती, वाद्य को छोड़कर वादन नहीं होता।

“जब तक उन्होंने इस लीला में रखा है, तब तक द्वैत ज्ञान होता है। शक्ति को मानने से ही ब्रह्म को मानना पड़ता है; जिस प्रकार रात्रि का ज्ञान रहने से ही दिन का ज्ञान होता है! ज्ञान की समझ रहने से ही अज्ञान की समझ होती है।

“और एक स्थिति में वे दिखाते हैं कि ब्रह्म, ज्ञान तथा अज्ञान से परे हैं, मुँह से कुछ कहा नहीं जाता। जो है सो है।”

इस प्रकार कुछ वार्तालाप होने के बाद श्रीरामकृष्ण गाड़ी की ओर जा रहे हैं। साधु भी उन्हें गाड़ी तक पहुँचा देने के लिए साथ साथ आ रहे हैं। मानो श्रीरामकृष्ण उनके कितने दिनों के परिचित हैं, साधु की बाँह में बाँह डालकर वे गाड़ी की ओर जा रहे हैं।

साधु उन्हें गाड़ी पर चढ़ाकर अपने स्थान पर आ गए।

अब श्रीरामकृष्ण सुरेन्द्र के बगीचे में आए हैं। भक्तों के साथ बैठकर साधु की ही बात शुरू की!

श्रीरामकृष्ण - ये साधु अच्छे हैं। (राम के प्रति) जब तुम आओगे तो इस साधु को दक्षिणेश्वर के बगीचे में ले आना।

“ये साधु बहुत अच्छे हैं। एक गाने में कहा है - सरल हुए बिना सरल को पहचाना नहीं जाता।

“निराकारवादी - अच्छा ही है। वे ही निराकार और साकार हुए हैं, - और भी कितने ही कुछ हैं। जिनका नित्य है, उन्हीं की लीला है। वही जो वाणी व मन से परे हैं, नाना रूप धारण करके अवतीर्ण होकर काम कर रहे हैं। उसी ‘ॐ’ से ‘ॐ शिव’ ‘ॐ काली’ व ‘ॐ कृष्ण’ हुए हैं। निमन्त्रण में मालिक ने एक छोटे लड़के को भेज दिया है - उसका कितना मान है, क्योंकि वह अमुक का नाती या पोता है।”

सुरेन्द्र के बगीचे में भी कुछ जलपान करके श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर की ओर भक्तों के साथ जा रहे हैं।

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