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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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४६२श्रीरामकृष्णवचनामृत९ मार्च, १८८४

तक पहुँच सकते हो। जहाँ कल्लोल होगा, वहाँ समुद्र भी अवश्य होगा। अनाहत ध्वनि के अनुसार आगे बढ़ने पर उसका प्रतिपाद्य जो ब्रह्म उसके पास पहुँचा जा सकता है। उसे ही वेदों में परम पद कहते हैं।* मैं पन रहते वैसा दर्शन नहीं होता। जहाँ ‘मैं’ भी नहीं, ‘तुम’ भी नहीं, ‘एक’ भी नहीं, ‘अनेक’ भी नहीं, वहीं पर यह दर्शन होता है।

“मानो सूर्य और दस जलपूर्ण घड़े हैं, प्रत्येक घड़े में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी दे रहा है। पहले देखा जाता है एक सूर्य और दस परछाइयों के सूर्य। यदि नौ घड़े तोड़ डाले जायें, तो बाकी रहते हैं एक सूर्य और एक परछाईंवाला सूर्य। एक एक घड़ा मानो एक एक जीव है। परछाईं के सूर्य को पकड़ पकड़कर वास्तव सूर्य के पास जाया जाता है; जीवात्मा से परमात्मा में पहुँचा जाता है। जीव (जीवात्मा) यदि साधन-भजन करे, तो परमात्मा का दर्शन कर सकता है। अन्तिम घड़े को तोड़ देने पर क्या है वह मुँह से नहीं कहा जा सकता।

“जीव पहले अज्ञानी बना रहता है। ईश्वरबुद्धि नहीं रहती वरन् नाना वस्तुओं की बुद्धि, अनेक चीजों का बोध रहता है। जब ज्ञान होता है, तब उसकी समझ में आता है कि ईश्वर सभी भूतों में है। जिस प्रकार पैर में काँटा चुभता है तो एक और काँटे को ढूँढ़कर उससे वह काँटा निकाला जाता है, अर्थात् ज्ञानरूपी काँटे के द्वारा अज्ञानरूपी काँटे को निकाल बाहर करना।

“फिर विज्ञान होने पर अज्ञान-काँटा और ज्ञान-काँटा दोनों को ही फेंक देना। उस समय केवल दर्शन ही नहीं, वरन् ईश्वर के साथ रातदिन बातचीत चलती रहती है।

“जिसने केवल दूध की बात सुनी है उसे अज्ञान है, जिसने दूध देखा है उसे ज्ञान हुआ और जो दूध पीकर मोटा-ताजा हुआ है उसे विज्ञान प्राप्त हुआ है।”

अब सम्भव है, श्रीरामकृष्ण अपनी स्थिति भक्तों को समझा रहे हैं। विज्ञानी की स्थिति का वर्णन कर, सम्भव है, अपनी स्थिति कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – ज्ञानी साधु और विज्ञानी साधु में भेद है। ज्ञानी साधु के बैठने का कायदा अलग है। मूँछों पर हाथ फेरकर बैठता है। कोई आये तो कहता है, ‘क्या जी, तुम्हें कुछ पूछना है?’

“विज्ञानी साधु सदा ईश्वर का दर्शन करता रहता है, उनके साथ बातचीत करता है, अर्थात् जो विज्ञानी है उसका स्वभाव दूसरा होता है। कभी जड़ की तरह, कभी पिशाच की तरह, कभी बालक की तरह और कभी उन्माद की तरह।

“कभी समाधिमग्न होकर बाहर का ज्ञान खो बैठता है – जड़ की तरह बन जाता है।


* “यत्र नादो विलीयते। तद्विष्णोः परमं पदम्। सदा पश्यन्ति सूरयः।”

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