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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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४७० श्रीरामकृष्णवचनामृत २३ मार्च, १८८४

तो जी वही गाना एक बार और।

गाना समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण महिमाचरण से कह रहे हैं - 'तुम वही श्लोक एक बार कहो तो जरा, जिसमें ईश्वरभक्ति की बातें हैं।'

महिमाचरण ने, 'अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्', कहकर सुनाया; श्रीरामकृष्ण ने कहा, और वह भी कहो जिसमें 'लभ लभ हरिभक्तिम्' है।

महिमाचरण कहने लगे -

विरम विरम ब्रह्मन् किं तपस्यासु वत्स।
व्रज व्रज द्विज शीघ्रं शंकरं ज्ञानसिन्धुम्॥
लभ लभ हरिभक्तिं वैष्णवोक्तां सुपक्वाम्।
भवनिगडनिबन्धच्छेदनीं कर्तरीं च॥

श्रीरामकृष्ण - शंकर हरि-भक्ति देंगे।

महिमा - पाशमुक्तः सदा शिवः।

श्रीरामकृष्ण - लज्जा, घृणा, भय और संकोच, ये सब पाश हैं, क्यों जी?

महिमा - जी हाँ। गुप्त रखने की इच्छा, प्रशंसा से अत्यधिक सिकुड़ना।

श्रीरामकृष्ण - ज्ञान के दो लक्षण हैं। पहला तो यह कि कूटस्थ बुद्धि हो। लाख दुःख, कष्ट, विपत्तियाँ और विघ्न हों - सब में निर्विकार रहना - जैसे लोहार के यहाँ का लोहा, जिस पर हथौड़ा चलाते हैं। और दूसरा है पुरुषकार - पूरी जिद। काम और क्रोध से अपना अनिष्ट हो रहा है - देखा कि एकदम त्याग!! कछुआ जब अपने हाथ पैर भीतर समेट लेता है, तब उसके चार खण्ड कर डालने पर भी उन्हें वह बाहर नहीं निकालता।

(ठाकुरदादा आदि से) "वैराग्य दो तरह का है। तीव्र वैराग्य और मन्द वैराग्य। मन्द वैराग्य वह है जिसका भाव है, 'होता है - हो जायगा।' तीव्र वैराग्य शान पर लगाये हुए छुरे की धार है - माया के पाशों को तुरन्त काट देता है।

"कोई किसान कितने ही दिनों से मेहनत करता है, परन्तु पानी खेत में आता ही नहीं मन में जिद है ही नहीं! और कोई दो-चार दिन मेहनत करने के बाद - 'आज पानी लाकर दम लूँगा' इस तरह का हठ ठान बैठता है। नहाना-खाना सब बन्द कर देता है। दिन भर मेहनत करने के बाद जब कुल-कुल स्वर से पानी आने लगता है तब उसे कितना आनन्द होता है! तब वह घर जाकर अपनी स्त्री से कहता है - 'ले आ तेल - मालिश करके नहाऊँगा'। नहा-खाकर फिर सुख की नींद सोता है।

"एक की स्त्री ने कहा, 'अमुक को बड़ा वैराग्य हुआ है - तुम्हें कुछ भी न हुआ।' जिसे वैराग्य हुआ था, उसके सोलह स्त्रियाँ थीं, एक एक करके वह सब को छोड़ रहा है।