श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
४७० श्रीरामकृष्णवचनामृत २३ मार्च, १८८४
तो जी वही गाना एक बार और।
गाना समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण महिमाचरण से कह रहे हैं - 'तुम वही श्लोक एक बार कहो तो जरा, जिसमें ईश्वरभक्ति की बातें हैं।'
महिमाचरण ने, 'अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्', कहकर सुनाया; श्रीरामकृष्ण ने कहा, और वह भी कहो जिसमें 'लभ लभ हरिभक्तिम्' है।
महिमाचरण कहने लगे -
विरम विरम ब्रह्मन् किं तपस्यासु वत्स।
व्रज व्रज द्विज शीघ्रं शंकरं ज्ञानसिन्धुम्॥
लभ लभ हरिभक्तिं वैष्णवोक्तां सुपक्वाम्।
भवनिगडनिबन्धच्छेदनीं कर्तरीं च॥
श्रीरामकृष्ण - शंकर हरि-भक्ति देंगे।
महिमा - पाशमुक्तः सदा शिवः।
श्रीरामकृष्ण - लज्जा, घृणा, भय और संकोच, ये सब पाश हैं, क्यों जी?
महिमा - जी हाँ। गुप्त रखने की इच्छा, प्रशंसा से अत्यधिक सिकुड़ना।
श्रीरामकृष्ण - ज्ञान के दो लक्षण हैं। पहला तो यह कि कूटस्थ बुद्धि हो। लाख दुःख, कष्ट, विपत्तियाँ और विघ्न हों - सब में निर्विकार रहना - जैसे लोहार के यहाँ का लोहा, जिस पर हथौड़ा चलाते हैं। और दूसरा है पुरुषकार - पूरी जिद। काम और क्रोध से अपना अनिष्ट हो रहा है - देखा कि एकदम त्याग!! कछुआ जब अपने हाथ पैर भीतर समेट लेता है, तब उसके चार खण्ड कर डालने पर भी उन्हें वह बाहर नहीं निकालता।
(ठाकुरदादा आदि से) "वैराग्य दो तरह का है। तीव्र वैराग्य और मन्द वैराग्य। मन्द वैराग्य वह है जिसका भाव है, 'होता है - हो जायगा।' तीव्र वैराग्य शान पर लगाये हुए छुरे की धार है - माया के पाशों को तुरन्त काट देता है।
"कोई किसान कितने ही दिनों से मेहनत करता है, परन्तु पानी खेत में आता ही नहीं मन में जिद है ही नहीं! और कोई दो-चार दिन मेहनत करने के बाद - 'आज पानी लाकर दम लूँगा' इस तरह का हठ ठान बैठता है। नहाना-खाना सब बन्द कर देता है। दिन भर मेहनत करने के बाद जब कुल-कुल स्वर से पानी आने लगता है तब उसे कितना आनन्द होता है! तब वह घर जाकर अपनी स्त्री से कहता है - 'ले आ तेल - मालिश करके नहाऊँगा'। नहा-खाकर फिर सुख की नींद सोता है।
"एक की स्त्री ने कहा, 'अमुक को बड़ा वैराग्य हुआ है - तुम्हें कुछ भी न हुआ।' जिसे वैराग्य हुआ था, उसके सोलह स्त्रियाँ थीं, एक एक करके वह सब को छोड़ रहा है।
२३ मार्च, १८८४ परिच्छेद ७८ ४७१
२३ मार्च, १८८४ परिच्छेद ७८ ४७१
“उस स्त्री का स्वामी कन्धे पर अँगोछा डाले हुए नहाने जा रहा था। उसने कहा, अरी, सुन, त्याग करने की शक्ति उसमें नहीं है, थोड़ा थोड़ा करके कभी त्याग नहीं होता। देख, मैं अब चला!
“घर का कोई प्रबन्ध न करके, उसी अवस्था में कन्धे पर अँगोछा डाले हुए, घर छोड़कर वह चला गया। इसे ही तीव्र वैराग्य कहते हैं।
“एक तरह का वैराग्य और है, उसे मर्कट-वैराग्य कहते हैं। संसार की ज्वाला से जलकर गेरुआ वस्त्र पहनकर काशी चला गया। बहुत दिनों तक कोई खबर नहीं। फिर एक चिट्ठी आयी – 'तुम लोग कोई चिन्ता न करो, यहाँ मुझे एक काम मिल गया है।'
“संसार की ज्वाला तो है ही। बीबी कहना नहीं मानती, वेतन सिर्फ बीस रुपया महीना, बच्चे का 'अन्नप्राशन' नहीं हो रहा है, बच्चे को पढ़ाने का खर्च नहीं, घर टूटा हुआ, छत चू रही है, मरम्मत के लिए रुपये नहीं!
“इसीलिए जब कोई कम उम्र का लड़का आता है तब मैं उससे पूछ लेता हूँ कि तुम्हारे कौन कौन हैं।
(महिमा के प्रति) “तुम्हारे लिए संसार-त्याग करने की क्या जरूरत है? साधुओं को कितनी तकलीफ होती है! एक की स्त्री ने पूछा, 'तुम संसार छोड़ोगे – क्यों? दस घरों में घूमघूमकर भीख माँगोगे, इससे तो एक घर में खाते हो, यही अच्छा है।'
“सदाव्रत की तलाश में रास्ता छोड़कर साधु-सन्त तीन कोस से भी दूर चले जाते हैं। मैंने देखा है, जगन्नाथ के दर्शन करके सीधे रास्ते से साधु आ रहे हैं, परन्तु सदाव्रत के लिए उन्हें सीधा रास्ता छोड़कर जाना पड़ता है।
“यह तो अच्छा है – किले से लड़ना। मैदान में खड़े होकर लड़ने में असुविधाएँ हैं। विपत्ति, देह पर गोले और गोलियाँ आकर गिरती है।
“हाँ कुछ दिनों के लिए निर्जन में जाकर, ज्ञान-लाभ करके संसार में आकर रहो। जनक ज्ञान-लाभ करके संसार में आकर रहे थे। ज्ञान-लाभ हो जाने पर फिर जहाँ रहो, उसमें कोई हानि नहीं।”
महिमाचरण – महाराज, मनुष्य विषय में क्यों फँस जाता है?
श्रीरामकृष्ण – उन्हें बिना प्राप्त किये ही विषय में रहता है, इसलिए। उन्हें प्राप्त कर लेने पर फिर मुग्ध नहीं होता। पतिंगा अगर एक बार उजाला देख लेता है, तो फिर और उसे अन्धकार अच्छा नहीं लगता।
“उन्हें पाने की इच्छा रखनेवालों को वीर्य-धारण करना पड़ता है।
“शुकदेवादि ऊर्ध्वरेता थे। इनका रेतपात कभी नहीं हुआ।
“एक और है धैर्येरता। पहले रेतपात हो चुका है,– परन्तु इसके बाद से वे वीर्यधारण करने लगे हैं। बारह वर्ष तक धैर्येरता रहने पर विशेष शक्ति पैदा होती है।
४७२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २३ मार्च, १८८४
भीतर एक नयी नाड़ी होती है; उसका नाम है मेधानाड़ी। उस नाड़ी के होने पर सब स्मरण रहता है – आदमी सब जान सकता है।
“वीर्यपात से बल का क्षय होता है। स्वप्नदोष से जो कुछ निकल जाता है, उसमें दोष नहीं। ऐसा खाद्य पदार्थ के गुण से होता है। इस तरह निकल जाने पर भी जो कुछ रहता है, उसी से काम होता है। फिर भी स्त्री-प्रसंग हरगिज न करना चाहिए।
“अन्त में जो कुछ रहता है वह refine (सार पदार्थ) है। लाहा बाबू के यहाँ राब के घड़े रखे थे। घड़ों के नीचे एक एक छेद करके फिर एक साल बाद जब देखा, तब सब दाने बँध गये थे – मिश्री की तरह। जितना सीरा निकलना था, सब छेद से निकल गया था।
“स्त्रियों का सम्पूर्ण त्याग संन्यासियों के लिए है। तुम लोगों का विवाह हो गया है, कोई दोष नहीं है।
“संन्यासी को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। पर साधारण लोगों के लिए यह सम्भव नहीं है। सा, रे, ग, म, प, ध, नि; ‘नि’ में तुम्हारी आवाज बहुत देर तक नहीं रह सकती।
“संन्यासी के लिए वीर्यपात बहुत ही बुरा है; इसीलिए उन्हें सावधानी से रहना पड़ता है, ताकि स्त्रियाँ दृष्टि में भी न पड़ें। भक्त-स्त्री होने पर भी वहाँ से हट जाना चाहिए। स्त्री-रूप देखना भी बुरा है। जाग्रत अवस्था में चाहे न हो पर स्वप्न में अवश्य वीर्य-स्खलन हो जाता है।
“संन्यासी जितेन्द्रिय होने पर भी लोक-शिक्षा के लिए स्त्रियों के साथ उसे बातचीत न करनी चाहिए। भक्त-स्त्री होने पर भी उससे ज्यादा देर तक बातचीत न करे।
“संन्यासी की है निर्जला एकादशी। एकादशी और दो तरह की है। एक फलमूल खाकर रखी जाती है, एक पूड़ी-कचौड़ी और मालपुए खाकर। (सब हँसते हैं।)
“कभी तो ऐसा भी होता है कि उधर पूड़ियाँ उड़ रही हैं और इधर दूध में दो-एक रोटियाँ भी भीग रही हैं, फिर खायेंगे! (सब हँसते हैं।)
(हँसते हुए) “तुम लोग निर्जला एकादशी न रख सकोगे।
“कृष्णकिशोर को मैंने देखा, एकादशी के दिन पूड़ियाँ और पकवान उड़ा रहे थे। मैंने हृदय से कहा, हृदय, मेरी इच्छा होती है कि मैं भी कृष्णकिशोर की एकादशी रखूँ। (सब हँसते हैं।) एक दिन ऐसा ही किया भी। खूब कसकर खाया। परन्तु उसके दूसरे दिन फिर कुछ न खाया गया।” (सब हँसते हैं।)
जो भक्त पंचवटी में हठयोगी को देखने गये थे, वे लौटे। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – “क्यों जी, कैसा देखा? अपने गज से तो नापा ही होगा?” श्रीरामकृष्ण ने देखा, भक्तों में कोई भी हठयोगी को रुपये देने के लिए राजी नहीं है।
२३ मार्च, १८८४ | परिच्छेद ७८ | ४७३
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| २३ मार्च, १८८४ | परिच्छेद ७८ | ४७३ |
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श्रीरामकृष्ण – साधु को जब रुपये देने पड़ते हैं तब फिर वह नहीं भाता।
"राजेन्द्र मित्र की तनख्वाह आठ सौ रुपया महीना है – वह प्रयाग से कुम्भ मेला देखकर आया था। मैंने पूछा – 'क्यों जी, मेले में कैसे सब साधु देखे?' राजेन्द्र ने कहा – 'कहाँ? – वैसा साधु एक भी न देखा। एक को देखा था, परन्तु वह भी रुपया लेता था।'
"मैं सोचता हूँ, साधुओं को अगर कोई रुपया-पैसा न देगा तो वे खायेंगे क्या? यहाँ कुछ देना नहीं पड़ता, इसलिए सब आते हैं। मैं सोचता हूँ, इन लोगों को अपना पैसा बहुत प्यारा है। तो फिर रहें न उसी को लेकर।"
श्रीरामकृष्ण जरा विश्राम कर रहे हैं। एक भक्त छोटी खाट पर बैठे हुए उनके पैर दबा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भक्त से धीरे धीरे कह रहे हैं, "जो निराकार हैं वही साकार भी हैं। साकाररूप भी मानना चाहिए। काली-रूप की चिन्ता करते हुए साधक काली-रूप के ही दर्शन पाता है। फिर वह देखता है कि वह रूप अखण्ड में लीन हो गया। जो अखण्ड सच्चिदानन्द हैं वही काली भी हैं।"
(३)
श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले गोल बरामदे में महिमाचरण आदि के साथ हठयोगी की बातें कर रहे हैं। रामप्रसन्न भक्त कृष्णकिशोर के पुत्र हैं। इसीलिए श्रीरामकृष्ण उन पर स्नेह करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – रामप्रसन्न उसी तरह अल्हड़पने में घूम रहा है। उस दिन यहाँ आकर बैठा, कुछ बोला भी नहीं; प्राणायाम साधकर श्वास चढ़ाये बैठा रहा। खाने को दिया, परन्तु खाया भी नहीं। एक और दूसरे दिन भी बुलाकर बैठाया। वह पैर पर पैर चढ़ाकर बैठा – कप्तान की ओर पैर करके। उसकी माँ का दुःख देखकर रोता हूँ।
(महिमाचरण से) "उस हठयोगी की बात तुमसे कहने के लिए उसने कहा था। प्रति दिन उसका साढ़े छः आने का खर्च है। इधर खुद कुछ न कहेगा!"
महिमा – कहने से सुनता कौन है! (श्रीरामकृष्ण और दूसरे हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आकर अपने आसन पर बैठे। पानिहाटी के श्रीयुत मणि सेन दो-एक मित्रों के साथ आये हैं, श्रीरामकृष्ण के हाथ टूटने के सम्बन्ध में पूछताछ कर रहे हैं। उनके साथियों में एक डाक्टर भी है।
श्रीरामकृष्ण आजकल डाक्टर प्रतापचन्द्र मजूमदार का इलाज कर रहे हैं। मणिबाबू के साथवाले डाक्टर ने उनकी चिकित्सा का अनुमोदन नहीं किया। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – "वह (प्रताप) कुछ बेवकूफ तो है नहीं, तुम क्यों ऐसी बात कह रहे हो?"
इसी समय लाटू ने जोर से पुकारकर कहा, "शीशी गिरकर फूट गयी है।"
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४७४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २३ मार्च, १८८४
मणि सेन हठयोगी की बात सुनकर कह रहे हैं - “हठयोगी किसे कहते हैं? हॉट (hot) का तो अर्थ है गरम!”
मणि सेन के डॉक्टर के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण ने पीछे से कहा - “उसे जानता हूँ। यदु मल्लिक से मैंने कहा भी था, यह तुम्हारा डॉक्टर बिलकुल खोखला है - अमुक डॉक्टर से भी इसकी बुद्धि मोटी है!”
अभी सन्ध्या नहीं हुई है। श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठकर मास्टर से बातचीत कर रहे हैं। वे खाट के पास पाँवपोश पर पश्चिम की ओर मुँह करके बैठे हैं; इधर महिमाचरण पश्चिमवाले गोल बरामदे में बैठकर मणि सेन के डॉक्टर के साथ उच्च स्वर में शास्त्रालाप कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण अपने आसन से सुन रहे हैं और कुछ हँसकर मास्टर से कह रहे हैं - “देखो, झाड़ रहा है; रजोगुण है। रजोगुण होने से कुछ पाण्डित्य दिखलाने और लेक्चर देने की इच्छा होती है। सतोगुण से मनुष्य अन्तर्मुख हो जाता है, खुद के गुण छिपा रखने की इच्छा होती है। पर आदमी खासा है - ईश्वर के नाम पर कितना उत्साह है!”
अधर आये, प्रणाम किया और मास्टर के पास बैठ गये। श्रीयुत अधर सेन डिप्टी मैजिस्ट्रेट हैं। उम्र तीस साल की होगी। दिन भर ऑफिस का काम करके, कितने ही दिनों से शाम के बाद श्रीरामकृष्ण के पास आ रहे हैं। इनका मकान कलकत्ते के शोभा बाजार बनियाटोले में है। कई दिनों से ये आये नहीं थे।
श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, इतने दिन क्यों नहीं आये?
अधर – कई कामों में फँसा था। स्कूलों की सभाओं और कुछ दूसरी मीटिंग में भी जाना पड़ा था।
श्रीरामकृष्ण – मीटिंग, स्कूल लेकर और सब बिलकुल भूल गये थे।
अधर – (विनयपूर्वक) – जी, नहीं, काम के कारण बाकी सब बातें दबी सी पड़ी थीं। आपका हाथ कैसा है?
श्रीरामकृष्ण – यह देखो, अभी तक अच्छा नहीं हुआ। प्रताप की दवा खा रहा था।
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण एकाएक अधर से कहने लगे – “देखो, यह सब अनित्य है। मीटिंग, स्कूल, ऑफिस, यह सब अनित्य है। ईश्वर ही वस्तु है और सब अवस्तु। बस मन लगाकर उन्हीं की आराधना करनी चाहिए।”
अधर चुप है।
श्रीरामकृष्ण – यह सब अनित्य है। शरीर अभी अभी है, अभी अभी नहीं। जल्दी उन्हें पुकार लेना चाहिए।
“तुम लोगों को सब त्याग करने की आवश्यकता नहीं है। कछुए की तरह संसार में रहो। कछुआ स्वयं तो पानी में भोजन की तलाश करता है, परन्तु अपने अण्डे किनारे
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२३ मार्च, १८८४ परिच्छेद ७८ ४७५
पर रखता है – उसका सब मन वहीं रहता है जहाँ उसके अण्डे हैं।
"कप्तान का स्वभाव अब अच्छा हो गया है। जब पूजा करने बैठता है तब बिलकुल ऋषि की तरह जान पड़ता है। इधर कपूर की आरती और बहुत ही सुन्दर स्तव पाठ करता है। पूजा करके जब उठता है, तब भाव के कारण उसकी आँखें सूज जाती हैं, मानो चींटियों ने काटा हो। और सारे समय गीता, भागवत यही सब पढ़ता रहता है। मैंने दो-चार अंग्रेजी शब्द कहे, इससे बिगड़ बैठा। कहा – अंग्रेजी पढ़नेवाले भ्रष्टाचारी होते हैं।"
कुछ देर बाद अधर ने बड़े विनीत भाव से कहा –
"हमारे यहाँ बहुत दिनों से आप नहीं पधारे हैं। बैठकखाने में मानो संसारीपन की दुर्गन्ध आती है और बाकी तो सब अँधेरा ही अँधेरा है।"
भक्त की यह बात सुनकर श्रीरामकृष्ण के स्नेह का सागर उमड़ पड़ा। भावावेश में वे उठकर खड़े हो गये। अधर और मास्टर के मस्तक और हृदय पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। स्नेहपूर्वक कहा – "मैं तुम लोगों को नारायण देख रहा हूँ। तुम्हीं लोग मेरे अपने आदमी हो।"
अब महिमाचरण भी कमरे में आकर बैठे।
श्रीरामकृष्ण – (महिमा से) – धैर्यरीता की बात उस समय जो तुम कह रहे थे, वह ठीक है। वीर्यधारण किये बिना इन सब बातों की धारणा नहीं होती।
"किसी ने चैतन्यदेव से कहा, 'आप इन भक्तों को इतना उपदेश दे रहे हैं, तो भी वे अपनी उतनी उन्नति क्यों नहीं कर पाते?'
"चैतन्यदेव ने कहा – 'ये लोग योषित्-संग करके सब अपव्यय कर देते हैं, इसीलिए धारणा नहीं कर सकते। फूटे घड़े में पानी रखने से क्रमशः सब निकल जाता है।'"
महिमा आदि भक्तगण चुपचाप बैठे हैं। कुछ देर बाद महिमाचरण ने कहा – ईश्वर के पास हम लोगों के लिए प्रार्थना कर दीजिये, जिससे हम लोगों को वह शक्ति प्राप्त हो।
श्रीरामकृष्ण – अब भी सावधान हो जाओ! सच है कि आषाढ़ का पानी है, रोकना मुश्किल है, परन्तु पानी निकल भी तो बहुत चुका है, अब बाँध बाँधने से रुक जायगा।
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परिच्छेद ७९
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अवतारवाद
(१)
प्राणकृष्ण, मास्टर, राम, गिरीश, गोपाल आदि के संग में
शनिवार, ५ अप्रैल १८८४। सुबह के आठ बजे हैं। मास्टर ने दक्षिणेश्वर में पहुँचकर देखा, श्रीरामकृष्ण प्रसन्नचित्त हैं; अपनी छोटी खाट पर बैठे हैं। जमीन पर कई भक्त बैठे थे। उनमें श्रीयुत प्राणकृष्ण मुखोपाध्याय भी थे।
प्राणकृष्ण जनाई के मुखर्जियों के वंश के हैं। कलकत्ते में श्यामपुकुर में रहते हैं, मेकेंजी लायल के एक्सचेंज (Exchange) नामक नीलाम-घर के कार्याध्यक्ष हैं। ये गृहस्थ तो हैं परन्तु वेदान्तचर्चा में उनकी बड़ी प्रीति है। श्रीरामकृष्णदेव की बड़ी भक्ति करते हैं – कभी कभी उनके दर्शन कर जाया करते हैं। अभी अभी एक दिन श्रीरामकृष्णदेव को अपने घर ले जाकर उन्होंने उत्सव मनाया था। ये बागबाजार के घाट में रोज प्रातःकाल गंगास्नान करते हैं और वहाँ कोई नाव ठीक हो गयी तो उस पर चढ़कर सीधे दक्षिणेश्वर श्रीरामकृष्ण के दर्शन के लिए चले आते हैं। आज भी इसी तरह उन्होंने नाव किराये पर की थी। नाव जब किनारे से आगे बढ़ी तब उसमें लहरों की टक्कर लगने लगी। मास्टर भी उनके साथ थे। उन्होंने कहा, मुझे उतार दीजिये। प्राणकृष्ण और उनके दूसरे मित्र समझाने लगे, परन्तु उन्होंने कहा, नहीं, मुझे उतार दीजिये, मैं पैदल चलकर दक्षिणेश्वर जाऊँगा। लाचार हो उन्हें उतार देना पड़ा।
मास्टर ने पहुँचकर देखा, वे लोग कुछ पहले ही पहुँच गये हैं; श्रीरामकृष्ण से वार्तालाप कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण को साष्टांग प्रणाम करके वे भी एक ओर बैठे।
अवतारवाद
श्रीरामकृष्ण – (प्राणकृष्ण से) – परन्तु आदमी में उनका ज्यादा प्रकाश है। अगर कहो, अवतार कैसे सिद्ध होगा, जिनमें भूखप्यास ये सब जीवों के धर्म हैं – सम्भव है कि उनमें रोग-शोक भी हों – तो इसका उत्तर यह है कि पंचभूतों के फन्दे में पड़कर ब्रह्म रो रहे हैं।
५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४७७
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| ५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४७७ |
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“देखो न, श्रीरामचन्द्र सीता के वियोग से रोने लगे थे। जब हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह का अवतार लिया, तब हिरण्याक्ष का वध हो जाने पर भी भगवान अपने धाम को नहीं गये थे। वराह के ही रूप में रहने लगे। कुछ बच्चे भी हो गये थे! उन्हें लेकर एक तरह से बड़े मजे में रहते थे। देवताओं ने कहा, यह इन्हें क्या हो गया? – ये तो अब आना ही नहीं चाहते। तब सब मिलकर शिव के पास गये और सब हाल उन्हें कह सुनाया। शिव ने उनके पास जाकर उन्हें बहुत समझाया, पर सुनता कौन है, वे अपने बच्चों को दूध पिलाने लगे! (सब हँसे।) तब शिव ने त्रिशूल से देह नष्ट कर दी। भगवान् खिल-खिलाकर हँसे और अपने लोक को चले गये।”
प्राणकृष्ण – (श्रीरामकृष्ण से) – महाराज, यह अनाहत शब्द क्या है?
श्रीरामकृष्ण – अनाहत शब्द सदा आप ही आप हो रहा है। वह प्रणव-ओंकार की ध्वनि है, परब्रह्म से आती है, योगी इसे सुनते हैं। विषयी जीवों को यह ध्वनि नहीं सुन पड़ती। योगी जानते हैं कि वह ध्वनि एक ओर तो नाभि-कमल से उठती है और दूसरी ओर उस क्षीरसिन्धु-शायी परब्रह्म से।
परलोक के सम्बन्ध में श्री केशव सेन का प्रश्न
प्राणकृष्ण – महाराज, परलोक कैसा है?
श्रीरामकृष्ण – केशव सेन ने भी यह बात पूछी थी। जब तक आदमी अज्ञान दशा में रहता है, अर्थात् जब तक ईश्वर-लाभ नहीं होता, तब तक जन्म ग्रहण करना पड़ता है। परन्तु ज्ञान हो जाने पर, फिर इस संसार में नहीं आना पड़ता। पृथ्वी में या किसी दूसरे लोक में नहीं जाना पड़ता।
“कुम्हार धूप में सूखने के लिए हण्डियाँ रख देता है। देखा नहीं तुमने? – उनमें कच्ची हण्डियाँ रहती हैं और पकी हुई भी। कभी कभी जानवरों के आने-जाने से कुछ हण्डियाँ फूट जाती हैं। उनमें जो हण्डी पकी हुई होती है उसे कुम्हार फेंक देता है, उससे फिर उसका कोई काम नहीं चलता। और अगर कच्ची हण्डी फूटी तो कुम्हार उसे ले लेता है, भिगोकर गाला बनाकर चाक पर फिर चढ़ा देता है – उससे फिर दूसरी हण्डी तैयार करता है। इसी तरह, जब तक ईश्वर-दर्शन नहीं हुए तब तक कुम्हार के हाथ जाना होगा, अर्थात् इस संसार में घूम-घामकर आना होगा।
“उबाले हुए धानों के गाड़ने से क्या होगा? फिर उससे पेड़ नहीं होता! मनुष्य यदि ज्ञानाग्नि में सिद्ध हो जाय, तो फिर वह नयी सृष्टि के काम का नहीं रहता – वह मुक्त हो जाता है।
वेदान्त और अहंकार। ज्ञान और विज्ञान
“पुराणों के मत में हैं भक्त और भगवान् – मैं एक अलग और तुम अलग। शरीर
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| ४७८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ५ अप्रैल, १८८४ |
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एक पात्र है जिसमें मन-बुद्धि-अहंकार रूपी पानी है। ब्रह्म सूर्य-स्वरूप हैं। इस पानी में उनका प्रतिबिम्ब गिर रहा है। भक्त ईश्वर का वही रूप देखता है।
“वेदान्त के मत से ब्रह्म ही वस्तु है और सब माया, स्वप्नवत्, अवस्तु। अहं-रूपी एकै लाठी सच्चिदानन्द-समुद्र में पड़ी हुई है। (मास्टर से) तुम इसे सुनते जाना - अहं-लाठी को उठा लेने पर एक सच्चिदानन्द-समुद्र रह जाता है। अहं-लाठी के रहने से दो दीख पड़ते हैं। इधर पानी का एक हिस्सा और उधर एक हिस्सा। ब्रह्मज्ञान होने पर मनुष्य को समाधि हो जाती है। तब यह अहं मिट जाता है।
“परन्तु लोक-शिक्षा के लिए शंकराचार्य ने 'विद्या का अहं' रखा था। (प्राणकृष्ण से) परन्तु ज्ञानियों का एक लक्षण और भी है। कोई कोई सोचते है, 'मैं ज्ञानी हो गया।' ज्ञान का लक्षण क्या है? ज्ञानी किसी की बुराई नहीं कर सकता। वह बालक-सा हो जाता है। लोहे के खड्ग में अगर पारस-पत्थर छुआ दिया जाय तो खड्ग सोने का हो जाता है। सोने से हिंसा का काम नहीं होता। बाहर से भले ही जान पड़ता हो कि इसमें राग-अहंकार है, परन्तु वास्तव में ज्ञानी में यह कुछ नहीं रहता।
“दूर से जली रस्सी देखिये तो जान पड़ता है कि यह रस्सी ही पड़ी हुई है, परन्तु पास जाकर फूँक मारिये तो सब राख होकर उड़ जाती है। क्रोध का, अहंकार का बस आकार मात्र है, परन्तु वह यथार्थ में क्रोध नहीं - अहंकार नहीं।
“बच्चे में आसक्ति नहीं रहती। अभी अभी उसने घरौंदा बनाया। कोई उसे छू ले तो तिनककर नाचने लगे, रोना शुरू कर दे, परन्तु खुद ही थोड़ी देर में उसे बिगाड़ डालता है। अभी अभी देखो तो कपड़े पर रीझ है। कहता है, मेरे बाबूजी ने ले दिया है, मैं नहीं दूँगा; परन्तु एक खिलौना दो; बस भूल जाता है, कपड़े को वहीं छोड़कर चला जाता है।
“ये ही सब ज्ञानी के लक्षण हैं। चाहे घर में बड़ा ऐश्वर्य हो - शीशे, मेज, तस्वीरें, गाड़ी-घोड़े, परन्तु दिल में आ जाय तो सब छोड़-छाड़कर काशी की राह पकड़ ले।
“वेदान्त के मत से जागरण अवस्था भी कुछ नहीं है। किसी लकड़हारे ने स्वप्न देखा था। कच्ची नींद में ही किसी दूसरे के जगा देने पर उसने झुँझलाकर कहा - 'तूने क्यों मुझे कच्ची नींद में जगाया? मैं राजा हो गया था और सात लड़कों का बाप। मेरे बच्चे लिखते-पढ़ते थे, अस्त्रविद्या सीख रहे थे। मैं सिंहासन पर बैठा राज कर रहा था। क्यों मेरा सब्ज-बाग उजाड़ डाला?' उस आदमी ने कहा - 'अरे वह तो स्वप्न था, उसमें क्या रखा है?' लकड़हारे ने कहा, 'चल, तू नहीं समझा। मेरा लकड़हारा होना जिस तरह सच है, स्वप्न में राजा होना उसी तरह सच है। लकड़हारा होना यदि सत्य हो तो स्वप्न में राजा होना भी सत्य है।”
अब श्रीरामकृष्ण विज्ञानी की बात कह रहे हैं -
“नेति-नेति करके आत्म-साक्षात्कार करने को ज्ञान कहते हैं। नेति-नेति विचार
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५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४७९
५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४७९
करके मनुष्य समाधि में आत्मदर्शन करता है।
“विज्ञान अर्थात् विशेष रूप से ज्ञान प्राप्त करना। किसी ने दूध का नाम ही नाम सुना है, किसी ने दूध देखा भर है और किसी ने दूध पिया है। जिसने सिर्फ सुना है, वह अज्ञानी है, जिसने देखा है वह ज्ञानी है, और जिसने पिया है, वह विज्ञानी है, विशेष रूप से ज्ञान उसी को हुआ है। ईश्वर को देखकर उनसे वार्तालाप करना, जैसे वे परम आत्मीय हों, इसी का नाम विज्ञान है।
“पहिले 'नेति-नेति' किया जाता है। वे पंचभूत नहीं हैं, मन, बुद्धि, अहंकार भी नहीं हैं; वे सब तत्त्वों से परे हैं। छत पर चढ़ना होगा, सब सीढ़ियों को एक एक करके छोड़ जाना होगा। सीढ़ियाँ कभी छत नहीं हैं, परन्तु छत पर पहुँचकर देखा जाता है, जिन चीजों से छत बनी है – ईंट-चूना-सुरखी – उन्हीं चीजों से सीढ़ियाँ भी बनी हैं, पर सीढ़ियाँ कभी छत नहीं हैं। जो परब्रह्म हैं वे ही जीव-जगत् और चौबीसों तत्त्व भी हुए हैं। जो आत्मा हैं वे ही पंचभूत भी हुए हैं। मिट्टी इतनी कड़ी क्यों है अगर वह आत्मा से ही हुई है? उनकी इच्छा से सब हो सकता है। हाड़ और मांस, शोणित और शुक्र से ही तो होते हैं। समुद्र का फेन कितना कड़ा होता है!
क्या गृहस्थ को विज्ञान हो सकता है? साधना चाहिए
“विज्ञान के होने पर संसार में भी रहा जा सकता है। तब अच्छी तरह अनुभव हो जाता है कि जीव और जगत् वे ही हुए हैं, वे संसार से अलग नहीं हैं। श्रीरामचन्द्र ने ज्ञान-लाभ के पश्चात् जब कहा कि मैं संसार में न रहूँगा, तब दशरथ ने समझाने के लिए वशिष्ठ को उनके पास भेजा। वशिष्ठ ने कहा, 'राम! यदि संसार ईश्वर से अलग हो तो तुम इसे छोड़ सकते हो।' श्रीरामचन्द्र चुप हो रहे। वे अच्छी तरह जानते थे, ईश्वर से अलग कोई चीज नहीं है। उन्हें फिर संसार न छोड़ना पड़ा। बात यह है कि दिव्य दृष्टि चाहिए। मन के शुद्ध होने पर ही वह दृष्टि होती है। देखो न, कुमारी-पूजा क्या है। मल और मूत्र त्याग करके आयी हुई लड़कियाँ, उन्हें मैंने देखा – साक्षात् भगवती की मूर्ति। एक ओर स्त्री है और एक ओर बच्चा; दोनों को मनुष्य प्यार कर रहा है, किन्तु भाव भिन्न हैं, तात्पर्य यह है कि खेल सब मन का है। शुद्ध मन में एक खास भाव होता है। उस मन को प्राप्त कर लेने पर इसी संसार में ईश्वर के दर्शन होते हैं। अतएव साधना चाहिए।
“साधना चाहिए। यह समझ लेना चाहिए कि स्त्रियों पर सहज ही आसक्ति हो जाती है। स्त्रियाँ स्वभाव से ही पुरुषों को प्यार करती हैं। पुरुष स्वभाव से ही स्त्रियों को प्यार करते हैं। दोनों इसीलिए जल्दी गिर जाते हैं।”
(हठयोगी आता है।)
पंचवटी में कई दिनों से एक हठयोगी रहते हैं। वे सिर्फ दूध और अफीम खाते हैं
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और हठयोग करते हैं। रोटी-भात, यह कुछ नहीं खाते। अफीम और दूध के दाम उनके पास नहीं हैं। श्रीरामकृष्ण जब पंचवटी के पास गये थे तब वे हठयोगी से बातचीत करके आये थे। हठयोगी ने राखाल से कहा था, 'परमहंसजी से कहकर मेरी कोई व्यवस्था करा देना।' श्रीरामकृष्ण ने कहला भेजा था कि कलकत्ते के बाबू जब आयेंगे तब उनसे कहा जायगा।
हठयोगी – (श्रीरामकृष्ण से) – आपने राखाल से क्या कहा था?
श्रीरामकृष्ण – कहा था, बाबुओं से कहूँगा। अगर वे कुछ देंगे तो दे देंगे। परन्तु क्यों – (प्राणकृष्णादि से) तुम शायद इन्हें like (पसन्द) नहीं करते?
प्राणकृष्ण चुपचाप बैठे रहे।
(हठयोगी चला जाता है।)
श्रीरामकृष्ण की बातचीत होने लगी।
श्रीरामकृष्ण – (प्राणकृष्णादि भक्तों से) – और संसार में रहने पर सत्य का खूब ध्यान चाहिए। सत्य से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है। मेरी तो इस समय सत्य की दृढ़ता कुछ कम हो गयी है, पहले बहुत थी। 'नहाऊँगा' यह कहा नहीं कि गंगा में उतरा, मन्त्रोच्चारण किया, सिर पर पानी भी डाला, परन्तु फिर भी सन्देह होता था कि शायद अच्छी तरह नहाना अभी नहीं हुआ। अमुक स्थान पर शौच के लिए जाऊँगा यह सोचा नहीं कि वहीं गया। राम के मकान गया, कलकत्ते में। कह दिया कि पूड़ियाँ न खाऊँगा। जब खाने को दिया गया, तब देखा, भूख लगी है; परन्तु कह जो दिया है कि पूड़ियाँ न खाऊँगा तो मजबूरन मिठाई से पेट भरा। (सब हँसते हैं।) इस समय तो दृढ़ता कुछ घट गयी है। टट्टी की हाजत नहीं है, परन्तु कह डाला है कि टट्टी जाऊँगा, क्या किया जाय? राम* से पूछा, उसने कहा, नहीं लगी है तो जाकर क्या कीजियेगा? तब मैंने विचार किया, सभी तो नारायण हैं, राम भी नारायण है, उसकी बात क्यों न मानूँ? हाथी नारायण है, परन्तु महावत भी तो नारायण है। महावत जिस समय कह रहा है, हाथी के पास मत आओ, उस समय उसकी बात क्यों न मानी जाय? इस तरह विचार करके अब पहले की अपेक्षा दृढ़ता कुछ घट गयी है।
"अब इस समय देख रहा हूँ, एक और अवस्था आ रही है। बहुत दिन हुए वैष्णवचरण ने कहा था, आदमी के भीतर जब ईश्वर के दर्शन होंगे, तब पूर्ण ज्ञान होगा। अब देख रहा हूँ, अनेक रूपों में वही विचरण कर रहे हैं। कभी साधु के रूप में, कभी छल-रूप में, और कभी खल-रूप में। इसीलिए कहता हूँ, साधुरूपी नारायण, छलरूपी नारायण, खलरूपी नारायण, लुच्चारूपी नारायण।
* राम चटर्जी – दक्षिणेश्वर मन्दिर के एक पुजारी।
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“अब चिन्ता है, सब को किस तरह भोजन कराया जाय। सब को भोजन कराने की इच्छा होती है। इसलिए एक-एक आदमी को यहाँ रखकर भोजन कराता हूँ।”
प्राणकृष्ण – (मास्टर को देखकर, सहास्य) – अच्छा आदमी है! (श्रीरामकृष्ण से) महाराज, नाव से उतरकर ही दम लिया!
श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – क्या हुआ?
प्राणकृष्ण – ये नाव पर चढ़े थे; जरा सी लहर की टक्कर लगी और इन्होंने कहा, उतार दो हमको – (मास्टर से) किस तरह फिर आये आप?
मास्टर – (सहास्य) – पैदल चलकर।
संसारी लोगों के लिए विषय-कर्मत्याग कठिन है
प्राणकृष्ण – (श्रीरामकृष्ण से) – महाराज, अब सोच रहा हूँ, काम छोड़ दूँगा। काम करने लगा, तो फिर और कुछ नहीं होगा। इन्हें (साथ के एक बाबू की ओर इशारा करके) काम सिखा रहा हूँ। मेरे छोड़ देने पर ये काम करेंगे, अब और नहीं होता।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, बड़ी झंझट है। इस समय कुछ दिन निर्जन में ईश्वर-चिन्तन करना बहुत अच्छा है। तुम कहते तो हो कि छोड़ोगे। कप्तान ने भी यही बात कही थी। संसारी आदमी कहते तो हैं, पर कर नहीं सकते।
“कितने ही पण्डित हैं जो ज्ञान की बातें कहा करते हैं। वे मुख ही से कहते हैं, काम कुछ नहीं कर सकते। जैसे गिद्ध उड़ता तो बहुत ऊँचे है, परन्तु उसकी नजर मरघट पर ही रहती है। अर्थात् उसी कामिनी-कांचन पर – संसार पर आसक्ति। अगर मैं सुनता हूँ कि किसी पण्डित को विवेक-वैराग्य है तो मुझे सचमुच उनसे श्रद्धापूर्ण भय होता है और नहीं तो वे सब भेड़-बकरे-से ही जान पड़ते हैं।”
प्राणकृष्ण प्रणाम करके बिदा हुए। उन्होंने मास्टर से चलने के लिए पूछा। मास्टर ने कहा; मैं अभी न जाऊँगा, आप चलिये। प्राणकृष्ण ने हँसते हुए कहा, तुम अब और नाव पर कदम रखोगे? (सब हँसते हैं।)
मास्टर ने पंचवटी में थोड़ी देर टहलकर, जिस घाट में श्रीरामकृष्ण नहाते थे, उसी में नहाया। इसके बाद श्रीभवतारिणी और राधाकान्त के दर्शन किये। वे सोच रहे हैं, मैंने सुना था ईश्वर निराकार हैं, तो फिर क्यों मैं इस मूर्ति के सामने प्रणाम कर रहा हूँ? क्या श्रीरामकृष्ण साकार देव-देवियों को मानते हैं इसलिए? मैं तो ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं समझता; परन्तु जब कि श्रीरामकृष्ण मानते हैं, तो मैं किस खेत की मूली हूँ – मानना ही होगा।
मास्टर श्रीभवतारिणी माता के दर्शन कर रहे हैं। देखा, उनके दोनों बायें हाथों में खड्ग और नरमुण्ड शोभा दे रहे हैं, दोनों दाहिने हाथों में वर और अभय। एक ओर वे
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भयंकरा मूर्ति हैं और दूसरी ओर भक्तवत्सला मातृमूर्ति। उनमें दो भावों का एकत्र समावेश हो रहा है। भक्तों के निकट, अपने दीन-हीन जीवों के निकट, माता दयामयी और स्नेहमयी के स्वरूप में आती हैं और यह भी सत्य है कि वे भयंकरा और कालकामिनी भी हैं। एक ही आधार में ये दो भाव क्यों हैं, इसका हाल तो वे ही जानें।
मास्टर श्रीरामकृष्ण की व्याख्या याद कर रहे हैं। सोच रहे हैं – सुना है, केशव सेन ने भी श्रीरामकृष्ण के पास देवी-प्रतिमा का अस्तित्व स्वीकार कर लिया था। 'क्या यही मृण्मय आधार में चिन्मयी मूर्ति है?' केशव यही बात कहते थे।
अब वे श्रीरामकृष्ण के पास आकर बैठे। वे नहा चुके हैं, यह देखकर श्रीरामकृष्ण ने उन्हें फलमूल प्रसाद खाने के लिए दिया। गोल बरामदे में आकर उन्होंने प्रसाद पाया। पानीवाला लोटा बरामदे में ही रह गया था। वे जल्दी से श्रीरामकृष्ण के पास आकर कमरे में बैठ ही रहे थे कि श्रीरामकृष्ण ने कहा, तुम लोटा नहीं लाये?
मास्टर – जी हाँ, लाता हूँ।
श्रीरामकृष्ण – वाह!
मास्टर का चेहरा फीका पड़ गया। बरामदे से लोटा लाकर कमरे में रखा।
मास्टर का घर कलकत्ते में है। घर में शान्ति न मिलने के कारण उन्होंने श्यामपुकुर में किराये का मकान लिया है। उनका स्कूल भी वहीं है। उनके अपने मकान में उनके पिता और भाई रहते हैं। श्रीरामकृष्ण की इच्छा है कि वे अपने मकान में आकर रहें; क्योंकि एक ही घर और एक ही थाली के खानेवालों में भजन-पूजन करने की बड़ी सुविधा है। यद्यपि श्रीरामकृष्ण बीच-बीच में ऐसा कहते थे, तथापि दुर्भाग्यवश मास्टर अपने घर वापस नहीं जा सके। आज श्रीरामकृष्ण ने फिर वही बात उठायी।
श्रीरामकृष्ण – क्यों, अब तुम घर जाओगे?
मास्टर – मेरा तो वहाँ रहने के लिए किसी तरह जी नहीं चाहता।
श्रीरामकृष्ण – क्यों, तुम्हारा बाप मकान गिरवाकर वहाँ नयी इमारत खड़ी कर रहा है।
मास्टर – घर में मुझे बड़ी तकलीफ मिली है। वहाँ जाने को मेरा किसी तरह मन नहीं होता।
श्रीरामकृष्ण – तुम किससे डरते हो?
मास्टर – सब से।
श्रीरामकृष्ण – (गम्भीर स्वर में) – वह भय वैसा ही है जैसा तुम्हें नाव पर चढ़ते समय होता है।
देवताओं का भोग लग गया। आरती हो रही है। कालीमन्दिर में आनन्द हो रहा है। आरती का शब्द सुनकर, कंगाल, साधु, फकीर, सब अतिथि-शाला में दौड़े आ रहे हैं।
५ अप्रैल, १८८४ परिच्छेद ७९ ४८३
५ अप्रैल, १८८४ परिच्छेद ७९ ४८३
किसी के हाथ में पत्तल है, किसी के हाथ में थाली लोटा। सब ने प्रसाद पाया। आज मास्टर ने भी भवतारिणी का प्रसाद पाया।
(३)
केशवचन्द्र सेन और 'नवविधान'। 'नवविधान में सार है'
श्रीरामकृष्ण प्रसाद ग्रहण करके जरा विश्राम कर रहे हैं। इतने में राम, गिरिन्द्र तथा और भी कई भक्त आ पहुँचे। भक्तों ने माथा टेककर प्रणाम किया और आसन ग्रहण किया।
श्रीयुत केशवचन्द्र सेन के नवविधान की चर्चा चली।
राम – (श्रीरामकृष्ण से) – महाराज, मुझे तो ऐसा नहीं जान पड़ता कि नवविधान से कोई उपकार हुआ हो। केशव बाबू अगर सच्चे होते, तो फिर उनके शिष्यों की यह दशा क्यों होती? मेरे मत से उनके भीतर कुछ भी नहीं है। जैसे खपरे बजाकर दरवाजे में ताला लगाना। लोग सोचते हैं, इसके खूब रुपये हैं – झनकार हो रही है, परन्तु भीतर बस खपरे ही खपरे हैं! बाहर के लोग भीतर की खबर क्या जानें!
श्रीरामकृष्ण – कुछ सार जरूर है। नहीं तो इतने आदमी केशव को क्यों मानते हैं? शिवनाथ को लोग क्यों नहीं पहचानते? ईश्वर की इच्छा के बिना ऐसा कभी होता नहीं।
"परन्तु संसार का त्याग किये बिना आचार्य का काम नहीं होता। लोग कहते हैं, यह संसारी आदमी है, यह खुद तो कामिनी और कांचन का छिपकर भोग करता है और हमसे कहता है, 'ईश्वर ही सत्य हैं – संसार स्वप्नवत् अनित्य है।' सर्वत्यागी हुए बिना उसकी बात सब लोग नहीं मानते। जो लोग संसार में पड़े हैं उन्ही में कोई कोई मान सकते हैं। केशव के घर-द्वार, कुटुम्ब-परिवार था, अतएव मन भी संसार में था। संसार की रक्षा भी तो करनी होगी? इसीलिए इतना लेक्चर उसने दिया, परन्तु अपने संसारे को बड़ी मजबूती में रख गया है। कैसा दामाद है! मैं उसके घर के भीतर गया, देखा बड़े बड़े पलंग हैं। सांसारिक काम करने लगे तो धीरे धीरे ये सब आ जाते हैं। भोग की ही भूमि संसार कहलाती है।"
राम – वे पलंग और मकान केशव को हिस्से में मिले थे। महाराज, आप कुछ भी कहें, परन्तु विजय बाबू ने कहा है – 'केशव सेन ने मुझसे कहा था, मैं ईसा और गौरांग का अंश हूँ और तुम अपने को अद्वैत का अंश बतलाया करो।' और उसने क्या कहा था – आप जानते हैं? आपको कहा था – वे भी नवविधान के हैं! (श्रीरामकृष्ण और सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – परमात्मा जाने, मैं तो यह भी नहीं जानता कि नवविधान का अर्थ क्या है। (सब हँसते हैं।)
४८४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ अप्रैल, १८८४
राम – केशव की शिष्यमण्डली कहती है, ज्ञान और भक्ति का समन्वय सब से पहले केशव बाबू ने किया है।
श्रीरामकृष्ण – (आश्चर्य में आकर) – यह क्या! तो फिर अध्यात्म-रामायण है क्या? नारद श्रीरामचन्द्र की स्तुति करते हैं – 'हे राम! वेदों में जिस परब्रह्म की कथा है, वह तुम्हीं हो। तुम्हीं (ब्रह्म ही) मनुष्य के रूप में हमारे पास हो, तुम्हें (ब्रह्म को) ही हम मनुष्य देख रहे हैं; वस्तुतः तुम मनुष्य नहीं हो – वही परब्रह्म हो।' श्रीरामचन्द्र ने कहा, 'नारद, तुम पर मैं प्रसन्न हुआ हूँ; तुम वर माँगो।' नारद ने कहा, 'राम, और क्या वर माँगूँ; अपने पादपद्मों में मुझे शुद्धा भक्ति दो। और अपनी भुवनमोहिनी माया में कभी फँसा न देना।' इस तरह अध्यात्म-रामायण में केवल ज्ञान और भक्ति की ही बातें हैं।
फिर केशव के शिष्य अमृत की बात चली।
राम – अमृत बाबू कैसे हो गये हैं।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, उस दिन मैंने बड़ा दुबला देखा।
राम – महाराज, अब लेक्चर की भी बात सुन लीजिये। जब खोल में पहला धावा मारा गया तब साथ ही कहा गया – 'केशव की जया' आपने कहा था – बँधी तलैया में ही दल* होता है। इसी पर एक दिन लेक्चर में अमृत बाबू ने कहा, साधु ने कहा है सही कि बँधी तलैया में दल होता है, परन्तु भाइयो, दल चाहिए – संगठन चाहिए – सच कहता हूँ – सच कहता हूँ – दल चाहिये। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण – यह क्या है! राम-राम यह भी लेक्चर है!
फिर यह बात उठी कि कोई कोई जरा अपनी तारीफ चाहते हैं।
श्रीरामकृष्ण – निमाई-संन्यास का नाटक हो रहा था। केशव के यहाँ मुझे ले गये थे। वहाँ सुना, न जाने किसने कहा, ये दोनों केशव और प्रताप गौरांग और नित्यानन्द हैं। प्रसन्न ने तब मुझसे पूछा, तो फिर आप कौन हैं? देखा, केशव एकटक मेरी ओर देख रहा था, मैं क्या कहता हूँ यह सुनने के लिए। मैंने कहा, मैं तुम्हारे दासों का दास, रेणु की रेणु हूँ। केशव ने हँसकर कहा ये पकड़ में नहीं आना चाहते।
राम – केशव कभी कभी आपको जान दि बैपटिस्ट बतलाते थे।
एक भक्त – और कभी कभी आपको उन्नीसवीं सदी के चैतन्य बतलाते थे।
श्रीरामकृष्ण – इसके क्या माने?
भक्त – अर्थात् अंग्रेजी की इस शताब्दी में चैतन्यदेव फिर आये हैं और वे आप हैं।
श्रीरामकृष्ण – (अन्यमनस्क होकर) – खैर, वह तो जैसे हुआ। अब यह
* यहाँ 'दल' शब्द पर श्लेष है। 'दल' शब्द के दो अर्थ हैं – काई तथा सम्प्रदाय।
५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४८५
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बतलाओ कि हाथ कैसे अच्छा हो। अब बस यही सोचता हूँ कि हाथ कैसे अच्छा हो।*
त्रैलोक्य के गाने की बात चली। त्रैलोक्य केशव के समाज में भगवत्-गुणानुवाद-कीर्तन करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – अहा! त्रैलोक्य का क्या ही सुन्दर गाना है!
राम – क्या सब बिलकुल ठीक होता है?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, बिलकुल ठीक। अगर वैसा न होता तो मन को इतना क्यों खींचता?
राम – आप ही के सब भाव लेकर गीतों की रचना की गयी है। केशव सेन उपासना के समय उन्हीं सब भावों का वर्णन करते थे और त्रैलोक्य बाबू उसी तरह के पद जोड़ते थे। देखिये, एक गाना है –
(भावार्थ) 'प्रेम के बाजार में आनन्द का मेला लगा हुआ है। भक्तों के संग हरि अपनी मौज में कितने ही खेल खेल रहे हैं।'
"आप भक्तों के साथ आनन्द करते हैं, यह देखकर इस गाने की रचना हुई है।"
श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – तुम अब जलाओ मत। मुझे भला क्यों लपेटते हो? (सब हँसते हैं।)
गिरीन्द्र – ब्राह्मगण कहते हैं, परमहंसदेव में Faculty of organisation नहीं है।
श्रीरामकृष्ण – इसका क्या मतलब?
मास्टर – आप संगठन करना नहीं जानते, आप में बुद्धि कम है, यह कहते हैं।
श्रीरामकृष्ण – (राम से) – अब यह बतलाओ, मेरा हाथ क्यों टूटा? तुम इसी विषय पर एक लेक्चर दो। (सब हँसते हैं।)
"ब्राह्मसमाजी निराकार-निराकार कहा करते हैं। खैर, कहें। उन्हें अन्दर से पुकारने ही से हुआ। अगर अन्तर की बात हो तो वे तो अन्तर्यामी हैं, वे अवश्य समझा देंगे, उनका स्वरूप क्या है।
"परन्तु यह अच्छा नहीं – यह कहना कि हम लोगों ने जो कुछ समझा है, वही ठीक है, और दूसरे जो कुछ करते हैं, सब गलत। हम लोग निराकार कह रहे हैं, अतएव वे साकार नहीं, निराकार हैं; हम लोग साकार कह रहे हैं, अतएव वे साकार हैं, निराकार नहीं! मनुष्य क्या कभी उनकी इति कर सकता है?
"इसी तरह वैष्णवों और शाक्तों में भी विरोध है। वैष्णव कहता है 'हमारे केशव ही एकमात्र उद्धारकर्ता हैं' और शाक्त कहता है, 'बस हमारी भगवती एकमात्र उद्धार करनेवाली है।'
* उनके टूटे हाथ से मतलब है।
४८६ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ अप्रैल, १८८४
“मैं वैष्णवचरण को सेजो बाबू* के पास ले गया था। वैष्णवचरण वैरागी है, बड़ा पण्डित है, परन्तु कट्टर वैष्णव है। इधर सेजो बाबू भगवती के भक्त हैं। अच्छी बातें हो रही थीं, इसी समय वैष्णवचरण ने कह डाला, ‘मुक्ति देनेवाले तो एक केशव ही हैं।’ केशव का नाम लेते ही सेजो बाबू का मुँह लाल हो गया और वे बोले, ‘तू साला!’ (सब हँस पड़े।) मथुर बाबू शाक्त जो थे! उनके लिए यह कहना स्वाभाविक ही था। मैंने इधर वैष्णवचरण को खींच लिया।
“जितनें आदमियों को देखता हूँ, धर्म-धर्म करके एक दूसरे से झगड़ा किया करते हैं। हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मसमाजी, शाक्त, वैष्णव, शैव, सब एक दूसरे से लड़ाई-झगड़ा करते हैं यह बुद्धिमानी नहीं है। जिन्हें कृष्ण कहते हो, वे ही शिव, वे ही आद्याशक्ति हैं, वे ही ईसा हैं और वे ही अल्लाह हैं। एक राम उनके हजार नाम।
“वस्तु एक ही है, केवल उसके नाम अलग अलग हैं। सब लोग एक ही वस्तु की चाह कर रहे हैं। अन्तर इतना ही है कि देश अलग है, पात्र अलग और नाम अलग। एक तालाब में बहुत से घाट हैं। हिन्दू एक घाट से पानी ले रहे हैं, घड़े में भरकर कहते हैं, ‘जल’। मुसलमान एक दूसरे घाट से पानी भर रहे हैं, चमड़े के बैग में – कहते हैं, ‘पानी’। क्रिस्टान तीसरे घाट से पानी ले रहे हैं – वे कहते हैं ‘वाटर’ (Water)। (सब हँसते हैं।)
“अगर कोई कहे, नहीं यह चीज जल नहीं है, यह पानी है या वाटर नहीं जल है, तो यह हँसी की ही बात होगी। इसीलिए दल, मतान्तर और झगड़े होते हैं। धर्म के नाम पर लठ्ठम लट्ठा, मार-काट? यह सब अच्छा नहीं है। सब उन्हींके पथ पर जा रहे हैं। आन्तरिकता होने पर, व्याकुलता आने पर – उन्हें मनुष्य प्राप्त करेगा ही। (मणि से) तुम यह सुनते जाओ – वेद, पुराण, तन्त्र-शास्त्र उन्हींको चाहते हैं; वे किसी दूसरे को नहीं चाहते। सच्चिदानन्द बस एक ही हैं। जिन्हें वेदों में ‘सच्चिदानन्द ब्रह्म’ कहा है, तन्त्र में उन्हींको ‘सच्चिदानन्द शिव’ कहा है, उन्हींको उधर पुराणों में ‘सच्चिदानन्द कृष्ण’ कहा है।”
श्रीरामकृष्ण ने सुना, राम घर में कभी कभी स्वयं भोजन पकाते हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मणि से) – क्या तुम भी अपने हाथ से भोजन पकाते हो?
मणि – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – कोशिश करके देखो न जरा, थोड़ा सा गो-घृत छोड़ कर भोजन किया करो। शरीर और मन शुद्ध जान पड़ने लगेंगे।
* रानी रासमणि के दामाद श्रीयुत मथुरानाथ विश्वास।
५ अप्रैल, १८८४ परिच्छेद ७९ ४८७
राम की घर-गृहस्थी की बहुत सी बातें हो रही हैं। राम के पिता परम वैष्णव हैं। घर में श्रीधर की सेवा होती है। राम के पिता ने अपना दूसरा विवाह किया था उस समय राम की उम्र बहुत कम थी। पिता और विमाता राम के घर में ही थे, परन्तु विमाता के साथ रहकर राम सुखी नहीं रह सके। इस समय विमाता की उम्र चालीस साल की है। विमाता के कारण राम और उनके पिता में कभीकभी अनबन हो जाती थी। आज वे ही सब बातें हो रही हैं।
राम – बाबूजी की बुद्धि मारी गयी है।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – सुना? बाबूजी की बुद्धि मारी गयी है और आपकी बहुत अच्छी है।
राम – उनके (विमाता के) मकान में आने ही से अशान्ति होती है। एक न एक झंझट पैदा होती है। हमारा परिवार नष्ट होने पर आ गया। इसीलिए मैं कहता हूँ, वे अपने मायके में क्यों नहीं जाकर रहतीं?
गिरीन्द्र – (राम से) – अपनी स्त्री को उसी तरह मायके में क्यों नहीं रखते? (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – यह क्या कुछ हण्डी और घड़ा है? हण्डी एक जगह रही और उसका ढक्कन दूसरी जगह! शिव एक ओर तथा शक्ति दूसरी ओर!
राम – महाराज, हम लोग सुख से हैं, वे आयी नहीं कि तोड़फोड़ मचाया। ऐसी दशा में –
श्रीरामकृष्ण – हाँ, अलग एक मकान कर दो, यह एक बात हो सकती है। महीने-महीने सब खर्च देते जाना। पिता कितने बड़े गुरु हैं! राखाल मुझसे पूछता था, क्या मैं बाबूजी की थाली में खा लूँ? मैंने कहा, 'अरे, यह क्या? तुझे हो क्या गया है जो तू अपने बाप की थाली में न खायेगा?'
"परन्तु एक बात है। जो लोग सन्मार्ग में हैं, वे अपना जूठा किसी को खाने के लिए नहीं देते। यहाँ तक कि कुत्ते को भी जूठन नहीं दी जाती।"
गिरीन्द्र – महाराज, माँ-बाप ने अगर कोई घोर अपराध किया हो, कोई घोर पाप किया हो तो?
श्रीरामकृष्ण – तो वह भी सही। माता यदि व्याभिचारिणी हो तो भी उसका त्याग न करना चाहिए। अमुक बाबुओं की गुरुपत्नी का चरित्र नष्ट हो गया। तब उन्होंने कहा, उनका लड़का गुरु बनाया जाय। मैंने कहा, 'यह तुम क्या कहते हो? तुम सूरन को छोड़कर सूरन की आँख लोगे? नष्ट हो गयी तो क्या हुआ? तुम उसे ही अपना इष्ट समझो।' एक गाने में है – 'मेरे गुरु यद्यपि कलवार की दूकान पर जाया करते हैं, तथापि मेरे गुरु नित्यानन्द राय हैं।'
| ४८८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ५ अप्रैल, १८८४ |
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चैतन्यदेव और माँ। मनुष्य के ऋण
“माँ-बाप क्या कुछ साधारण मनुष्य हैं? बिना उनके प्रसन्न हुए धर्म-कर्म कुछ भी नहीं होता। चैतन्यदेव प्रेम से पागल थे, परन्तु फिर भी संन्यास से पहले कुछ दिन लगातार उन्होंने अपने माता को समझाया था। कहा था - 'माँ! मैं कभी कभी आकर तुम्हें देख-दिखा जाया करूँगा।' (मास्टर से तिरस्कार करते हुए) और तुम्हारे लिए कहता हूँ, माँ-बाप ने तुम्हें आदमी बना दिया, अब कई लड़के-बच्चे भी हो गये हैं, इस पर बीबी को साथ लेकर निकल आना! माता-पिता को धोखा देकर बीबी-बच्चों को लेकर, वैष्णव-वैष्णवी बनकर निकलता है! तुम्हारे बाप को कोई कमी नहीं है, नहीं तो मैं कहता, धिक्कार है तुमको! (सब के सब स्तब्ध हैं।)
“कुछ ऋण हैं। देवऋण, ऋषिऋण; उधर मातृऋण, पितृऋण, स्त्री-ऋण। माता-पिता के ऋण का शोध किये बिना कोई काम नहीं होता। फिर पत्नी का भी ऋण है। हरीश पत्नी का त्याग करके यहाँ आकर रहता है। यदि उसकी स्त्री के भोजन की सुविधा न होती तो मैं कहता, साला बेईमान है।
“ज्ञान के पश्चात् उसी पत्नी को तुम साक्षात् भगवती देखोगे! सप्तशती में है, 'या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।' वे ही माँ हुई हैं।
“जितनी स्त्रियाँ देखते हो, सब वे ही हैं; इसीलिए मैं वृन्दा (नौकरानी) को कुछ कह नहीं सकता। कोई-कोई लोग श्लोक झाड़ते हैं - लम्बी-लम्बी बातें बघारते हैं, परन्तु उनका व्यवहार कुछ और ही होता है। इस हठयोगी के लिए किसी तरह अफीम और दूध इकट्ठा हो, रामप्रसन्न बस इसी चिन्ता में मारामारा घूमता है। और वह यह भी कहता है कि मनु में साधु-सेवा का उल्लेख है। इधर बूढ़ी माँ खाने को नहीं पाती, सौदा खरीदने के लिए हाट-बाजार खुद जाया करती है। क्या कहूँ ऐसा क्रोध आता है!
“परन्तु एक बात और है। अगर प्रेमोन्मत्त अवस्था हो तो फिर कौन है बाप, कौन है माँ और कौन है स्त्री? ईश्वर पर इतना प्यार हो कि पागल हो जाय। फिर उसके लिए कुछ भी कर्तव्य नहीं रह जाता। सब ऋणों से वह मुक्त हो जाता है। प्रेमोन्माद कैसा है, जानते हो? उस अवस्था के आने पर संसार भूल जाता है। अपनी देह जो इतनी प्यारी चीज है, वह भी भूल जाता है। यह अवस्था चैतन्यदेव की हुई थी। समुद्र में कूद पड़े, समुद्र का बोध ही नहीं। मिट्टी में बार-बार पछाड़ खा-खाकर गिरते हैं, न भूख है, न नींद; शरीर का बोध भी नहीं!”
श्रीरामकृष्ण 'हा चैतन्य' कह उठे।
(भक्तों के प्रति) “चैतन्य के माने अखण्ड चैतन्य। वैष्णवचरण कहता था, गौरांग अखण्ड चैतन्य की ही एक छटा हैं।
५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४८९
| ५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४८९ |
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“तुम्हारी क्या इस समय तीर्थ जाने की इच्छा है?”
बूढ़े गोपाल – जी हाँ, जरा देखभाल आयें।
राम – (बूढ़े गोपाल से) – ये कहते हैं, बहूदक के बाद कुटीचक की अवस्था होती है। जो साधु अनेक तीर्थों का भ्रमण करते हैं, उनका नाम है बहूदक, और जो एक जगह डटकर आसन जमा देते हैं उन्हें कुटीचक कहते हैं।
“एक बात और ये कहते हैं। एक पक्षी जहाज के मस्तूल पर बैठा था। जहाज गंगा से होकर काले पानी में (समुद्र में) चला गया। पक्षी को इसका होश न था। जब वह होश में आया, तब किनारे का पता लगाने के लिए उत्तर की ओर उड़ गया। परन्तु उसने किनारा कहीं न देखा, तब लौट आया। फिर जरा देर विश्राम करके दक्षिण की ओर गया। उधर भी किनारा न दीख पड़ा। इसी तरह कुछ-कुछ विश्राम करके पूर्व और पश्चिम में भी गया। जब उसने देखा, कहीं किनारा नहीं है, तब मस्तूल पर आकर चुपचाप बैठ गया।”
श्रीरामकृष्ण – (बूढ़े गोपाल और भक्तों से) – जब तक यह बोध है कि ईश्वर वहाँ है – वहाँ है, तब तक अज्ञान है। जब यहाँ है, यह बोध हो जाता है, तब ज्ञान।
“एक आदमी तम्बाकू पीना चाहता था। वह अपने पड़ोसी के घर गया – टिकिया सुलगाने के लिए। घर के सब लोग सो गये थे। बड़ी देर तक दरवाजा खटखटाने पर एक आदमी खोलने के लिए नीचे उतर आया। उस आदमी को देखकर घरवाले ने पूछा, कहो, कैसे आये? उसने कहा, क्या कहूँ कैसे आया। जानते तो हो कि तम्बाकू पीने का चस्का है, टिकिया सुलगाने आया था। तब घरवाले ने कहा अजी वाह, तुम तो बड़े भले मानस निकले, इतनी मेहनत करके आये और दरवाजा खटखटाया, तुम्हारे हाथ में लालटेन जो है! (सब हँसते हैं।)
“जो कुछ चाहता है, वही उसके पास है, फिर भी आदमी अनेक स्थानों में चक्कर लगाया करता है।”
राम – महाराज, अब इसका मतलब समझ में आ गया। समझा कि गुरु क्यों कहते हैं कि चारों धाम करके आ जाओ। जब एक बार चक्कर मारकर देखता है कि जो कुछ यहाँ है, वही सब वहाँ भी है, तब फिर वह गुरु के पास लौटकर आता है। यह सब केवल गुरु की बात पर विश्वास होने के लिए है।
बात कुछ रुक गयी। श्रीरामकृष्ण राम की तारीफ कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – अहा! राम में कितने गुण हैं। कितने भक्तों की सेवा और उनका पालन-पोषण करता है। (राम से) अधर कहता था, तुमने उसकी बड़ी खातिरदारी की – क्यों, ठीक है न?
अधर शोभाबाजार में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण के परमभक्त हैं। उनके यहाँ चण्डी के गीत हुए थे। श्रीरामकृष्ण और भक्तों में से कितने ही वहाँ गये थे। परन्तु अधर राम को