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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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५ अप्रैल, १८८४ परिच्छेद ७९ ४८३

किसी के हाथ में पत्तल है, किसी के हाथ में थाली लोटा। सब ने प्रसाद पाया। आज मास्टर ने भी भवतारिणी का प्रसाद पाया।

(३)

केशवचन्द्र सेन और 'नवविधान'। 'नवविधान में सार है'

श्रीरामकृष्ण प्रसाद ग्रहण करके जरा विश्राम कर रहे हैं। इतने में राम, गिरिन्द्र तथा और भी कई भक्त आ पहुँचे। भक्तों ने माथा टेककर प्रणाम किया और आसन ग्रहण किया।

श्रीयुत केशवचन्द्र सेन के नवविधान की चर्चा चली।

राम – (श्रीरामकृष्ण से) – महाराज, मुझे तो ऐसा नहीं जान पड़ता कि नवविधान से कोई उपकार हुआ हो। केशव बाबू अगर सच्चे होते, तो फिर उनके शिष्यों की यह दशा क्यों होती? मेरे मत से उनके भीतर कुछ भी नहीं है। जैसे खपरे बजाकर दरवाजे में ताला लगाना। लोग सोचते हैं, इसके खूब रुपये हैं – झनकार हो रही है, परन्तु भीतर बस खपरे ही खपरे हैं! बाहर के लोग भीतर की खबर क्या जानें!

श्रीरामकृष्ण – कुछ सार जरूर है। नहीं तो इतने आदमी केशव को क्यों मानते हैं? शिवनाथ को लोग क्यों नहीं पहचानते? ईश्वर की इच्छा के बिना ऐसा कभी होता नहीं।

"परन्तु संसार का त्याग किये बिना आचार्य का काम नहीं होता। लोग कहते हैं, यह संसारी आदमी है, यह खुद तो कामिनी और कांचन का छिपकर भोग करता है और हमसे कहता है, 'ईश्वर ही सत्य हैं – संसार स्वप्नवत् अनित्य है।' सर्वत्यागी हुए बिना उसकी बात सब लोग नहीं मानते। जो लोग संसार में पड़े हैं उन्ही में कोई कोई मान सकते हैं। केशव के घर-द्वार, कुटुम्ब-परिवार था, अतएव मन भी संसार में था। संसार की रक्षा भी तो करनी होगी? इसीलिए इतना लेक्चर उसने दिया, परन्तु अपने संसारे को बड़ी मजबूती में रख गया है। कैसा दामाद है! मैं उसके घर के भीतर गया, देखा बड़े बड़े पलंग हैं। सांसारिक काम करने लगे तो धीरे धीरे ये सब आ जाते हैं। भोग की ही भूमि संसार कहलाती है।"

राम – वे पलंग और मकान केशव को हिस्से में मिले थे। महाराज, आप कुछ भी कहें, परन्तु विजय बाबू ने कहा है – 'केशव सेन ने मुझसे कहा था, मैं ईसा और गौरांग का अंश हूँ और तुम अपने को अद्वैत का अंश बतलाया करो।' और उसने क्या कहा था – आप जानते हैं? आपको कहा था – वे भी नवविधान के हैं! (श्रीरामकृष्ण और सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – परमात्मा जाने, मैं तो यह भी नहीं जानता कि नवविधान का अर्थ क्या है। (सब हँसते हैं।)

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