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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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४८४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ अप्रैल, १८८४

राम – केशव की शिष्यमण्डली कहती है, ज्ञान और भक्ति का समन्वय सब से पहले केशव बाबू ने किया है।

श्रीरामकृष्ण – (आश्चर्य में आकर) – यह क्या! तो फिर अध्यात्म-रामायण है क्या? नारद श्रीरामचन्द्र की स्तुति करते हैं – 'हे राम! वेदों में जिस परब्रह्म की कथा है, वह तुम्हीं हो। तुम्हीं (ब्रह्म ही) मनुष्य के रूप में हमारे पास हो, तुम्हें (ब्रह्म को) ही हम मनुष्य देख रहे हैं; वस्तुतः तुम मनुष्य नहीं हो – वही परब्रह्म हो।' श्रीरामचन्द्र ने कहा, 'नारद, तुम पर मैं प्रसन्न हुआ हूँ; तुम वर माँगो।' नारद ने कहा, 'राम, और क्या वर माँगूँ; अपने पादपद्मों में मुझे शुद्धा भक्ति दो। और अपनी भुवनमोहिनी माया में कभी फँसा न देना।' इस तरह अध्यात्म-रामायण में केवल ज्ञान और भक्ति की ही बातें हैं।

फिर केशव के शिष्य अमृत की बात चली।

राम – अमृत बाबू कैसे हो गये हैं।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, उस दिन मैंने बड़ा दुबला देखा।

राम – महाराज, अब लेक्चर की भी बात सुन लीजिये। जब खोल में पहला धावा मारा गया तब साथ ही कहा गया – 'केशव की जया' आपने कहा था – बँधी तलैया में ही दल* होता है। इसी पर एक दिन लेक्चर में अमृत बाबू ने कहा, साधु ने कहा है सही कि बँधी तलैया में दल होता है, परन्तु भाइयो, दल चाहिए – संगठन चाहिए – सच कहता हूँ – सच कहता हूँ – दल चाहिये। (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण – यह क्या है! राम-राम यह भी लेक्चर है!

फिर यह बात उठी कि कोई कोई जरा अपनी तारीफ चाहते हैं।

श्रीरामकृष्ण – निमाई-संन्यास का नाटक हो रहा था। केशव के यहाँ मुझे ले गये थे। वहाँ सुना, न जाने किसने कहा, ये दोनों केशव और प्रताप गौरांग और नित्यानन्द हैं। प्रसन्न ने तब मुझसे पूछा, तो फिर आप कौन हैं? देखा, केशव एकटक मेरी ओर देख रहा था, मैं क्या कहता हूँ यह सुनने के लिए। मैंने कहा, मैं तुम्हारे दासों का दास, रेणु की रेणु हूँ। केशव ने हँसकर कहा ये पकड़ में नहीं आना चाहते।

राम – केशव कभी कभी आपको जान दि बैपटिस्ट बतलाते थे।

एक भक्त – और कभी कभी आपको उन्नीसवीं सदी के चैतन्य बतलाते थे।

श्रीरामकृष्ण – इसके क्या माने?

भक्त – अर्थात् अंग्रेजी की इस शताब्दी में चैतन्यदेव फिर आये हैं और वे आप हैं।

श्रीरामकृष्ण – (अन्यमनस्क होकर) – खैर, वह तो जैसे हुआ। अब यह


* यहाँ 'दल' शब्द पर श्लेष है। 'दल' शब्द के दो अर्थ हैं – काई तथा सम्प्रदाय।