श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १५ जून, १८८४
(७)
श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – देखो, तुम्हारे ब्राह्मसमाज का लेक्चर सुनकर आदमी का भाव आसानी से ताड़ लिया जाता है। मुझे एक हरिसभा में ले गये थे। आचार्य थे एक पण्डित, नाम समाध्यायी था। कहा, ईश्वर नीरस हैं, हमें अपने प्रेम और भक्ति से उन्हें सरस कर लेना चाहिए। यह बात सुनकर मैं तो दंग रह गया। तब एक कहानी याद आ गयी। एक लड़के ने कहा था, मेरे मामा के यहाँ बहुत से घोड़े हैं – गोशाले भर। अब सोचो, अगर गोशाला है, तो वहाँ गौओं का रहना ही सम्भव है, घोड़ों का नहीं। इस तरह की असम्बद्ध बातें सुनकर आदमी क्या सोचता है? यही कि घोड़े-सोड़े कहीं कुछ नहीं हैं! (सब हँसते हैं।)
एक भक्त – घोड़े तो हैं ही नहीं, गौएँ भी नहीं हैं! (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण – देखो न, जो रस-स्वरूप हैं, उन्हें कहता है 'नीरस'; इससे यही समझ में आता है कि ईश्वर क्या चीज हैं, उसने कभी अनुभव भी नहीं किया।
'मैं कर्ता, मेरा घर' अज्ञान। जीवन का उद्देश्य 'डुबकी लगाना'
श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – देखो, तुमसे कहता हूँ। तुम पढ़े लिखे बुद्धिमान और गम्भीर हो। केशव और तुम मानो गौरांग और नित्यानन्द; दोनों भाई थे। लेक्चर देना, तर्क झाड़ना, वादविवाद यह सब तो खूब हुआ। क्या तुम्हें ये सब अब भी अच्छे लगते हैं? अब सब मन समेटकर ईश्वर पर लगाओ। अपने को अब ईश्वर में उत्सर्ग कर दो।
प्रताप – जी हाँ, इसमें क्या सन्देह है, यही करना चाहिए; परन्तु यह सब जो मैं कर रहा हूँ, उनके (केशव के) नाम की रक्षा के लिए ही कर रहा हूँ।
श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – तुमने कहा तो है कि उनके नाम की रक्षा के लिए सब कुछ कर रहे हो; परन्तु कुछ दिन बाद यह भाव भी न रह जायगा। एक कहानी सुनो। किसी आदमी का घर पहाड़ पर था, घर क्या, कुटिया थी। बड़ी मेहनत करके उसने बनाया था। कुछ दिन बाद एक बहुत बड़ा तूफान आया। कुटिया हिलने लगी। तब उसे बचाने के लिए उस आदमी को बड़ी चिन्ता हुई। उसने कहा, हे पवन देव, देखो महाराज, घर न तोड़ियेगा। पवन देव क्यों सुनने लगे? कुटिया चरचराने लगी। तब उस आदमी ने एक उपाय सोच निकाला। उसे याद आ गया कि हनुमानजी पवन देव के लड़के हैं। बस, घबराया हुआ वह कहने लगा – दोहाई है, घर न तोड़ियेगा, दोहाई है, हनुमानजी का घर है। कितनी ही बार उसने कहा, 'हनुमानजी का घर है', 'हनुमानजी का घर है,' पर इससे कोई लाभ न हुआ। तब कहने लगा, 'महाराज, लक्ष्मणजी का घर है – लक्ष्मणजी का।' इससे भी कुछ हल न हुआ तब कहा, 'सुनो, यह श्रीरामचन्द्रजी का घर है; देखो महाराज, इसे अब न तोड़िये। दोहाई है, जय रामजी की।' इससे भी कुछ न हुआ। घर चरचराता हुआ