श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४
पहने हुए हैं। श्रीमूर्त्ति के दर्शन कर भूधर के बड़े भाई ने कहा, 'मैं वह कुछ नहीं जानता। इतना ही जानता हूँ कि यह तो चिन्मयी है।'
ईश्वरलाभ और कर्मत्याग। नयी हण्डी
श्रीरामकृष्ण अब लौट रहे हैं। बाबूराम को उन्होंने बुलाया। मास्टर भी साथ हो लिये।
शाम हो गयी है। घर के पश्चिमवाले गोल बरामदे में आकर श्रीरामकृष्ण बैठ गये। भावस्थ हैं, अवस्था अर्ध-बाह्य है। पास ही बाबूराम और मास्टर हैं।
आजकल श्रीरामकृष्ण की सेवा ठीक से नहीं होती। उन्हें तकलीफ रहती है। आजकल राखाल नहीं रहते। कोई कोई हैं, परन्तु वे, श्रीरामकृष्ण को उनकी सभी अवस्थाओं में छू नहीं सकते। श्रीरामकृष्ण भावावस्था में कह रहे हैं – 'छू - ना-रा-छू-' अर्थात् 'इस अवस्था में और किसी को छूने नहीं दे सकता। तू रहे तो अच्छा हो।'
पण्डितजी देवताओं के दर्शन करके श्रीरामकृष्ण के कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण पश्चिम के गोल बरामदे से कह रहे हैं, तुम कुछ जलपान कर लो। पण्डितजी ने कहा, अभी मुझे सन्ध्या करनी है। श्रीरामकृष्ण भावावेश में मस्त होकर गाने लगे और उठकर खड़े हो गये।
“गया, गंगा, प्रभास, काशी, कांची, यह सब कौन चाहता है – अगर काली का स्मरण करता हुआ वह अपनी देह त्याग सके? त्रिसन्ध्या की बात लोग कहते हैं, परन्तु वह यह कुछ नहीं चाहता। सन्ध्या खुद उसकी खोज में फिरती रहती है, परन्तु सन्धि कभी नहीं पाती। पूजा, होम, जप और यज्ञ, किसी पर उसका मन लगता ही नहीं।”
श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त होकर कह रहे हैं, सन्ध्या कितने दिन के लिए है? – जब तक ॐ कहते हुए मन लीन न हो जाय।
पण्डितजी – तो जलपान कर लेता हूँ, उसके बाद सन्ध्या करूँगा।
श्रीरामकृष्ण – मैं तुम्हारे बहाव को न रोकूँगा। समय के बिना आये त्याग अच्छा नहीं है। फल बड़ा हो जाता है, तब फूल आप झर जाता है। कच्ची अवस्था में नारियल का पत्ता खींचना न चाहिए। इस तरह तोड़ने से पेड़ खराब हो जाता है।
सुरेन्द्र घर जाने के लिए तैयार हैं। मित्रों को अपनी गाड़ी पर ले जाने के लिए बुला रहे हैं।
सुरेन्द्र – महेन्द्र बाबू चलियेगा?
श्रीरामकृष्ण की अब भी भावावस्था है। अभी तक पूरी प्राकृत अवस्था नहीं आयी। वे उसी अवस्था में सुरेन्द्र से कह रहे हैं – 'तुम्हारा घोड़ा जितना खींच सकें, उससे अधिक लोगों को न बैठाना।' सुरेन्द्र प्रणाम करके चले गये।