श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९१ | ६२७
हाजरा महाशय कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण को फिर कुछ भावावेश हो गया है और उसी अवस्था में वे बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (हाजरा से) – तुम जो कुछ कर रहे हो, वह ठीक है। परन्तु पटरी ठीक नहीं बैठती।
“किसी की निन्दा न किया करो – एक कीड़े की भी नहीं। तुम खुद भी तो लोमस मुनि की बात कहते हो। जब भक्ति की प्रार्थना करोगे तब साथ ही यह भी कहा करो कि कभी मुझसे दूसरे की निन्दा न हो।”
हाजरा – (भक्ति की) – प्रार्थना करने पर वे सुनेंगे?
श्रीरामकृष्ण – एक सौ बार! – अगर प्रार्थना ठीक हो – आन्तरिक हो। विषयी आदमी जिस तरह बच्चे या स्त्री के लिए रोता है, उसी तरह ईश्वर के लिए कहाँ रोता है?
“उस देश में एक आदमी की स्त्री बीमार हो गयी। वह अच्छी न होगी, यह सोचकर वह आदमी थर थर काँपने लगा – बेहोश होने को आ गया था।
“इस तरह ईश्वर के लिए किसकी अवस्था होती है?”
हाजरा श्रीरामकृष्ण की पद-रेणु ले रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (संकुचित होकर) – यह सब क्या है?
हाजरा – जिनके पास मैं हूँ उनके श्रीचरणों की धूलि न लूँ?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर को तुष्ट करो, सब तुष्ट हो जायेंगे। ‘तस्मिन् तुष्टे जगत् तुष्टम्।’ ठाकुरजी ने जब द्रौपदी का शाक खाकर कहा, मैं तृप्त हो गया हूँ, तब संसार भर के जीव तृप्त हो गये थे – गले तक भर गये थे – डकार लेने लगे थे। मुनियों के खाने से क्या संसार तुष्ट हुआ था – डकारें ली थीं?
“ज्ञानलाभ के बाद भी लोक-शिक्षा के लिए पूजा आदि कर्मों को लोग किया करते हैं।
“मैं काली-मन्दिर जाता हूँ, और इस कमरे के सब चित्रों को भी प्रणाम करता हूँ – इस तरह दूसरे भी प्रणाम करते हैं। फिर तो अभ्यास हो जाने पर मनुष्य से वैसा किये बिना रहा ही नहीं जाता।
“बटतल्ले के संन्यासी को मैंने देखा; उसने जिस आसन पर गुरु की पादुका रखी थी उसी पर शालग्राम भी रखा था और पूजा कर रहा था! मैंने पूछा, ‘अगर इतना ज्ञान हो गया है, तो इस तरह क्यों करते हो?’ उसने कहा, ‘सब कुछ किया जाता है, यह भी एक किया। कभी एक फूल इस पैर पर (गुरु के) चढ़ाया और कभी एक फूल उस पैर (शालग्राम) पर।’
“देह के रहते कोई कर्म छोड़ नहीं सकता – पंक रहते उससे बुलबुले उठेंगे ही।
(हाजरा से) “एक ज्ञान है तो अनेक का भी ज्ञान है।