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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

परिच्छेद १५

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परिच्छेद १५

सर्कस में श्रीरामकृष्ण –

गृहस्थ तथा अन्यान्य कर्मयोगियों की कठिन समस्या

श्रीरामकृष्ण गाड़ी से श्यामपुकुर विद्यासागर स्कूल के फाटक पर आ पहुँचे। दिन के तीन बजे का समय होगा। साथ में उन्होंने मास्टर को भी ले लिया। राखाल तथा अन्य दो एक भक्त गाड़ी में हैं। आज बुधवार, १५ नवम्बर १८८२ ई., कार्तिक शुक्ला पंचमी है। गाड़ी चितपुर रास्ते से, किले के मैदान की ओर जा रही है।

श्रीरामकृष्ण आनन्दमय हैं। मतवाले की तरह गाड़ी से कभी इस ओर तथा कभी उस ओर मुख करके बालक की तरह देख रहे हैं और पथिकों के सम्बन्ध में भक्तों से बातचीत कर रहे हैं। मास्टर से कह रहे हैं, "देखो सब लोगों को देखता हूँ, कैसे निम्न दृष्टि के हैं। पेट के लिए सब जा रहे हैं। ईश्वर की ओर दृष्टि नहीं है।"

श्रीरामकृष्ण आज किले के मैदान में विल्सन सर्कस देखने जा रहे हैं। मैदान में पहुँचकर टिकट खरीदी गयी। आठ आने की अर्थात् अन्तिम श्रेणी की टिकट। भक्तगण श्रीरामकृष्ण को लेकर ऊँचे स्थान पर जाकर एक बेंच पर बैठे। श्रीरामकृष्ण आनन्द से कह रहे हैं, "वाह! यहाँ से बहुत अच्छा दिखता है।"

सर्कस में तरह तरह के खेल काफी देर तक दिखाए गए। गोलाकार रास्ते पर घोड़ा दौड़ रहा है, घोड़े की पीठ पर एक पैर पर मेम खड़ी है। फिर बीच बीच में सामने बड़े बड़े लोहे के चक्र रखे हैं। चक्र के पास आकर घोड़ा जब उसके नीचे से दौड़ता है, तो मेम घोड़े की पीठ से कूदकर चक्र के बीच में से होकर फिर घोड़े की पीठ पर एक पैर पर खड़ी हो जाती है। घोड़ा बार बार तेजी के साथ उस गोलाकार पथ पर दौड़ने लगा, मेम भी फिर उसी प्रकार पीठ पर खड़ी है!

सर्कस समाप्त हुआ। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ उतरकर मैदान में गाड़ी के पास आए। ठण्ड पड़ रही थी। हरे रंग की शाल ओढ़कर मैदान में खड़े खड़े बातचीत कर रहे हैं। पास ही भक्तगण खड़े हैं। एक भक्त के साथ में आपके लिए मसाले (लौंग, इलायची आदि) का एक छोटासा बटुआ है। उसमें कुछ मसाला और विशेष रूप से कबाबचीनी है।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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११०श्रीरामकृष्णवचनामृत१५ नवम्बर १८८२

पहले साधना, बाद में संसार। अभ्यासयोग।

श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, “देखो, मेम कैसे एक पैर के सहारे घोड़े पर खड़ी है और घोड़ा तेजी से दौड़ रहा है। कितना कठिन काम है! अनेक दिनों तक अभ्यास किया है, तब तो ऐसा सीखा। जरा असावधान होते ही हाथ-पैर टूट जाएँगे और मृत्यु भी हो सकती है। संसार करना इसी प्रकार कठिन है। बहुत साधन-भजन करने के बाद ईश्वर की कृपा से कोई कोई इसमें सफल हुए हैं। अधिकांश लोग असफल हो जाते हैं। संसार करने जाकर और भी बद्ध हो जाते हैं, और भी डूब जाते हैं - मृत्यु-यन्त्रणा होती है! जनक आदि की तरह किसी किसी ने उग्र तपस्या के बल पर संसार किया था। इसलिए साधन-भजन की विशेष आवश्यकता है। नहीं तो संसार में ठीक नहीं रहा जा सकता।”

बलराम के मकान पर श्रीरामकृष्ण

श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठे। गाड़ी बागबाजार के बसुपाड़ा में बलराम के मकान के दरवाजे पर आ खड़ी हुई। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दुमंजले पर बैठकघर में जा बैठे। सायंकाल है - दिया जलाया गया है। श्रीरामकृष्ण सर्कस की बातें कर रहे हैं। अनेक भक्त एकत्रित हुए हैं। उनके साथ ईश्वर-सम्बन्धी चर्चा हो रही है। मुख में दूसरी कोई भी बात नहीं है, केवल ईश्वर की बात।

जातिभेद तथा अस्पृश्यों की समस्या

जातिभेद के सम्बन्ध में चर्चा चली।

श्रीरामकृष्ण बोले, “एक उपाय से जातिभेद उठ सकता है। वह उपाय है - भक्ति। भक्तों के जाति नहीं है। भक्ति होने से ही देह, मन, आत्मा सब शुद्ध हो जाते हैं। गौर, निताई हरिनाम देने लगे और चाण्डाल तक सभी को गोद में लेने लगे। भक्ति न रहने पर ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है। भक्ति रहने पर चाण्डाल चाण्डाल नहीं है। अस्पृश्य जाति भक्ति के होने पर शुद्ध पवित्र हो जाती है।”

संसारबद्ध जीव

श्रीरामकृष्ण संसारबद्ध जीवों की बात कर रहे हैं। वे मानो रेशम के कीड़े हैं। चाहें तो कोश को काटकर निकल आ सकते हैं, परन्तु काफी कोशिश से कोश बनाते हैं, छोड़कर आ नहीं सकते। इसी से मरते हैं। फिर मानो जाल में फँसी हुई मछली। जिस रास्ते से गयी है, उसी रास्ते से निकल सकती है, परन्तु जल की मीठी आवाज और दूसरी मछलियों के साथ खेलकूद, - इसी में भूलकर रह जाती है। बाहर निकलने की चेष्टा नहीं करती। बच्चों की अस्फुट बातें मानो जलकल्लोल का मीठा शब्द है। मछली अर्थात् जीव और परिवारवर्ग। परन्तु एक दौड़ से जो भाग जाते हैं उन्हें कहते हैं मुक्त पुरुष।

श्रीरामकृष्ण गाना गा रहे हैं -

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

१५ नवम्बर १८८२ | परिच्छेद १५ | १११

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१५ नवम्बर १८८२ | परिच्छेद १५ | १११

(भावार्थ) – “महामाया की विचित्र माया है, कैसा मोहजाल फैला रखा है! जिसके प्रभाव से ब्रह्मा विष्णु भी अचेतन्य हैं, फिर जीव की क्या बात? बिछे हुए जाल में मछली प्रवेश करती है, पर आने-जाने का रास्ता रहते हुए भी फिर उसमें से भाग नहीं सकती।”

श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं, “जीव मानो दाल है। चक्की में पड़े हैं, पिस जाएँगे। परन्तु जो थोड़ेसे दाल के दाने खूँटी को पकड़कर रहते हैं वे नहीं पिसते। इसलिए खूँटी अर्थात् ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। उन्हें पुकारो, उनका नाम लो, तब मुक्ति होगी। नहीं तो कालरूपी चक्की में पिस जाओगे।”

श्रीरामकृष्ण फिर गाना गा रहे हैं -

(भावार्थ) – “माँ, भवसागर में पड़कर शरीर-रूपी यह नौका डूब रही है। हे शंकरि, माया की आँधी और मोह का तूफान अधिकाधिक तेज हो रहा है। एक तो मनरूपी माझी अनाड़ी है, उस पर छः खेवैये गँवार हैं। आँधी में मँझधार में आकर डूबा जा रहा हूँ। भक्ति का डाँड़ टूट गया, श्रद्धा का पाल फट गया, नाव काबू से बाहर हो गयी, अब मैं उपाय क्या करूँ? और तो कोई उपाय नहीं दीखता, सोचकर लाचार हो रहा हूँ। तरंग में तैरकर श्रीदुर्गानामरूपी ‘भेले’ को पकड़ता हूँ।”

स्त्री-पुत्रों के प्रति कर्तव्य

विश्वास बाबू बहुत देर से बैठे थे, अब उठकर चले गए। उनके पास काफी धन था, परन्तु चरित्र भ्रष्ट हो जाने से सारा धन उड़ गया। अब स्त्री, कन्या आदि किसी को नहीं देखते हैं। बलराम के उनकी बात उठाने पर श्रीरामकृष्ण बोले, “वह अभागा दरिद्री है। गृहस्थ के कर्तव्य है, ऋण है; देवऋण, पितृऋण, ऋषिऋण – फिर परिवार का ऋण है। सती स्त्री होने पर उसका पालन-पोषण, सन्तान जब तक योग्य नहीं बन जाते हैं, तब तक उनका पालन-पोषण करना पड़ता है।

“साधु ही केवल संचय नहीं करेगा। ‘पंछी और दरवेश’ संचय नहीं करते हैं। परन्तु मादा पक्षी के बच्चा होने पर वह संचय करती है। बच्चे के लिए मुख से उठाकर खाना ले जाती है।”

बलराम – अब विश्वास बाबू की साधुसंग करने की इच्छा है।

श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – साधु का कमण्डलु चार धाम घूमकर आता है, परन्तु वैसा ही कड़ुआ का कड़ुआ रहता है। मलय की हवा जिन पेड़ों को लगती है वे सब चन्दन हो जाते हैं, परन्तु सेमल, बड़ आदि चन्दन नहीं बनते! कोई कोई साधुसंग करते हैं गाँजा पीने के लिए! (हँसी) साधु लोग गाँजा पीते हैं, इसीलिए उनके पास आकर बैठते हैं, गाँजा तैयार कर देते हैं और प्रसाद पाते हैं! (सभी हँस पड़े।)

परिच्छेद १६

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परिच्छेद १६

षड्भुजदर्शन! राजमोहन के मकान पर शुभागमन – नरेन्द्र

श्रीरामकृष्ण ने जिस दिन किलेवाले मैदान में सर्कस देखा उसके दूसरे दिन फिर कलकत्ते में शुभागमन किया था। बृहस्पतिवार, १६ नवम्बर, १८८२ ई., कार्तिक शुक्ला षष्ठी। आते ही पहले-पहल गरानहट्टा में षड्भुज महाप्रभु का दर्शन किया। वैष्णव साधुओं का अखाड़ा है, महन्त हैं श्री गिरिधारीदास। षड्भुज महाप्रभु की सेवा बहुत दिनों से चल रही है। श्रीरामकृष्ण ने तीसरे प्रहर दर्शन किया।

सायंकाल के कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण शिमुलिया-निवासी श्री राजमोहन के मकान पर गाड़ी से आ पहुँचे। श्रीरामकृष्ण ने सुना है कि यहाँ पर नरेन्द्र आदि युवक मिलकर ब्राह्मसमाज की उपासना करते हैं। इसीलिए वे देखने आए हैं। मास्टर तथा और भी दो-एक भक्त साथ हैं। श्री राजमोहन पुराने ब्राह्मभक्त हैं।

ब्राह्मभक्त और सर्वत्याग या संन्यास

श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र को देख आनन्दित हुए और बोले, “तुम लोगों की उपासना देखूँगा।” नरेन्द्र गाना गाने लगे। युवकों में से श्री प्रिय आदि कोई कोई उपस्थित थे।

अब उपासना हो रही है। नवयुवकों में से एक व्यक्ति उपासना कर रहे हैं। वे प्रार्थना कर रहे हैं – ‘भगवान्, सब कुछ छोड़ तुममें मग्न हो जाऊँ।’ – श्रीरामकृष्ण को देख सम्भवतः उनका उद्दीपन हुआ है। इसीलिए सर्वत्याग की बात कह रहे हैं! मास्टर, श्रीरामकृष्ण के बहुत ही निकट बैठे थे। उन्होंने ही केवल सुना, श्रीरामकृष्ण मृदु स्वर में कह रहे हैं, “सो तो हो चुका!”

श्री राजमोहन श्रीरामकृष्ण को जलपान के लिए मकान के भीतर ले जा रहे हैं।


* वर्तमान निमतल्ला स्ट्रीट

परिच्छेद १७

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परिच्छेद १७

मनोमोहन तथा सुरेन्द्र के मकान पर श्रीरामकृष्ण

रविवार, १९ नवम्बर १८८२ ई.। आज श्रीजगद्धात्री-पूजा है। सुरेन्द्र ने निमन्त्रण दिया है। वे भीतर बाहर हो रहे हैं - कब श्रीरामकृष्ण आते हैं। मास्टर को देख वे कह रहे हैं, “तुम आए हो, और वे कहाँ हैं?” इतने में श्रीरामकृष्ण की गाड़ी आ खड़ी हुई। पास ही श्रीमनोमोहन का मकान है। श्रीरामकृष्ण पहले वहीं पर उतरे, वहाँ पर जरा विश्राम करके सुरेन्द्र के मकान पर जाएँगे।

मनोमोहन के बैठकखाने में श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “जो असहाय, दीन, दरिद्र है उसकी भक्ति ईश्वर को प्यारी है, जिस प्रकार खली मिला हुआ चारा गाय को प्यारा है। दुर्योधन उतना धन, उतना ऐश्वर्य दिखाने लगा पर उसके घर पर भगवान् न गए। वे विदुर के घर गए। वे भक्तवत्सल हैं। जिस प्रकार गाय अपने बच्चे के पीछे पीछे दौड़ती है, उसी प्रकार वे भी भक्तों के पीछे पीछे दौड़ते हैं।”

श्रीरामकृष्ण गाने लगे। भावार्थ यह है -

“‘उस भाव के लिए परम योगी युगयुगान्तर तक योग करते हैं। भाव का उदय होने पर वे ऐसे ही खींच लेते हैं जैसे लोहे को चुम्बक।’

“चैतन्यदेव की आँखों से कृष्णनाम से आँसू गिरने लगते थे। ईश्वर ही वस्तु है, शेष सब अवस्तु। मनुष्य चाहे तो ईश्वर को प्राप्त कर सकता है; परन्तु वह कामिनी-कांचन का भोग करने में ही मस्त रहता है। सिर पर मणि रहते भी साँप मेंढ़क खाता रहता है।

“भक्ति ही सार है। ईश्वर का विचार करके भी उन्हें कौन जान सकेगा? मुझे भक्ति चाहिए। उनका अनन्त ऐश्वर्य है। उतना जानने की मुझे क्या आवश्यकता है? एक बोतल शराब से यदि नशा आ जाए तो फिर यह जानने की क्या आवश्यकता है कि कलार की दूकान में कितने मन शराब है। एक लोटा जल से मेरी तृष्णा शान्त हो सकती है; पृथ्वी में कितना जल है यह जानने की मुझे कोई आवश्यकता नहीं।”

सुरेन्द्र के भाई और जज - का पद। जातिभेद

श्रीरामकृष्ण अब सुरेन्द्र के मकान पर आये हैं। आकर दुमँजले के बैठकघर में बैठे हैं। सुरेन्द्र के मंझले भाई जज हैं। वे भी बैठे हैं। अनेक भक्त कमरे में इकट्ठे हुए हैं।

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११४श्रीरामकृष्णवचनामृत१९ नवम्बर, १८८२

श्रीरामकृष्ण सुरेन्द्र के भाई से कह रहे हैं, “आप जज हैं, बहुत अच्छी बात है। इतना जानिएगा, सभी कुछ ईश्वर की शक्ति है। बड़ा पद उन्होंने ही दिया है तभी बना है। लोग समझते हैं, 'हम बड़े आदमी हैं।' छत पर का जल शेर के मुँहवाले परनाले से गिरता है। ऐसा लगता है, मानो शेर मुँह से पानी उगल रहा है। परन्तु देखो, कहाँ का जल है। कहाँ आकाश में बादल बना, उसका जल छत पर गिरा और उसके बाद लुढ़ककर परनाले में जा रहा है और फिर शेर के मुँह से होकर निकल रहा है।”

सुरेन्द्र के भाई – महाराज, ब्राह्मसमाजवाले स्त्री-स्वाधीनता की बात कहते हैं, और कहते हैं जातिभेद उठा दो। यह सब आपको कैसा लगता है?

श्रीरामकृष्ण – ईश्वर से नया नया प्रेम होने पर वैसा हो सकता है। आँधी आने पर धूल उड़ती है, समझ में नहीं आता कि कौन आम का पेड़ है और कौन इमली का। आँधी शान्त होने पर फिर समझ में आता है। नये प्रेम की आँधी शान्त होने पर धीरे धीरे समझ में आ जाता है कि ईश्वर ही श्रेयः नित्य पदार्थ है और सभी कुछ अनित्य है। साधुसंग और तपस्या न करने पर ठीक ठीक धारणा नहीं होती! पखावज का बोल मुँह से बोलने से क्या होगा? हाथ पर आना बहुत कठिन है। केवल लेक्चर देने से क्या होगा? तपस्या चाहिए, तब धारणा होगी।

“जातिभेद? केवल एक उपाय से जातिभेद उठ सकता है। वह है भक्ति। भक्ति के जाति नहीं हैं। भक्ति से अछूत भी शुद्ध हो जाता है – भक्ति होने पर चाण्डाल फिर चाण्डाल नहीं रहता। चैतन्यदेव ने चाण्डाल से लेकर ब्राह्मण तक सभी को शरण दी थी।

“ब्राह्मण हरिनाम करते हैं, बहुत अच्छी बात है। व्याकुल होकर पुकारने पर उनकी कृपा होगी, ईश्वरलाभ होगा।

“सभी पथों से उन्हें प्राप्त किया जा सकता है। एक ईश्वर को अनेक नामों से पुकारते हैं। जिस प्रकार एक घाट का जल हिन्दू लोग पीते हैं, कहते हैं जल; दूसरे घाट में ईसाई लोग पीते हैं, कहते हैं वाटर; और तीसरे घाट में मुसलमान पीते हैं, कहते हैं पानी।”

सुरेन्द्र के भाई – महाराज, थिओसफी कैसी लगती है?

श्रीरामकृष्ण – सुना है लोग कहते हैं कि उससे अलौकिक शक्ति प्राप्त होती है। देव मोड़ोल नामक व्यक्ति के मकान पर देखा था कि एक आदमी पिशाचसिद्ध है। पिशाच कितनी ही चीजें ला देता था। अलौकिक शक्ति लेकर क्या करूँगा? क्या उससे ईश्वरप्राप्ति होती है? यदि ईश्वर-प्राप्ति न हुई तो सभी मिथ्या है!


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परिच्छेद १८

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परिच्छेद १८

मणि मल्लिक के ब्राह्मोत्सव में श्रीरामकृष्ण

श्रीरामकृष्ण ने कलकत्ते में श्री मणिलाल मल्लिक के सिन्दुरियापट्टीवाले मकान पर भक्तों के साथ शुभागमन किया है। वहाँ पर ब्राह्मसमाज का प्रतिवर्ष उत्सव होता है। दिन के चार बजे का समय होगा। यहाँ पर आज ब्राह्मसमाज का वार्षिकोत्सव है। २६ नवम्बर १८८२ ई.। श्री विजयकृष्ण गोस्वामी तथा अनेक ब्राह्मभक्त और श्री प्रेमचन्द्र बड़ाल तथा गृहस्वामी के अन्य मित्रगण आए हैं। मास्टर आदि साथ हैं।

श्री मणिलाल ने भक्तों की सेवा के लिए अनेक प्रकार का आयोजन किया है। प्रह्लाद-चरित्र की कथा होगी, उसके बाद ब्राह्मसमाज की उपासना होगी, अन्त में भक्तगण प्रसाद पायेंगे।

श्री विजय अभी तक ब्राह्मसमाज में ही हैं। वे आज की उपासना करेंगे। उन्होंने अभी तक गैरिक वस्त्र धारण नहीं किया है।

कथक महाशय प्रह्लाद-चरित्र की कथा कह रहे हैं। पिता हिरण्यकशिपु हरि की निन्दा करते हुए पुत्र प्रह्लाद को बार बार क्लेशित कर रहे हैं। प्रह्लाद हाथ जोड़कर हरि से प्रार्थना कर रहे हैं और कह रहे हैं, “हे हरि, पिता को सद्बुद्धि दो।” श्रीरामकृष्ण इस बात को सुनकर रो रहे हैं। श्री विजय आदि भक्तगण श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण को भावावस्था हो गयी है।

श्री विजय गोस्वामी प्रभृति ब्राह्मभक्तों को उपदेश। ईश्वर दर्शन और आदेश प्राप्ति, तब लोकशिक्षा।।

कुछ देर बाद विजय आदि भक्तों से कह रहे हैं, “भक्ति ही सार है। उनके नामगुण का कीर्तन सदा करते करते भक्ति प्राप्त होती है। अहा, शिवनाथ की कैसी भक्ति है! मानो, रस में पड़ा हुआ रसगुल्ला।

“ऐसा समझना ठीक नहीं कि मेरा धर्म ही ठीक है तथा दूसरे सभी का धर्म असत्य है। सभी पथों से उन्हें प्राप्त किया जा सकता है। हृदय में व्याकुलता रहनी चाहिए। अनन्त पथ, अनन्त मत।

“देखो, ईश्वर को देखा जा सकता है। वेद में कहा है, ‘अवाङ्मानसगोचरम्।’


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११६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ नवम्बर १८८२

इसका अर्थ यह है कि वे विषयासक्त मन के अगोचर हैं। वैष्णवचरण कहा करता था, 'वे शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि द्वारा प्राप्त करने योग्य हैं।'* इसीलिए साधुसंग, प्रार्थना, गुरु का उपदेश – यह सब आवश्यक है। तभी चित्तशुद्धि होती है, तब उनका दर्शन होता है। मैले जल में निर्मली डालने से वह साफ होता है, तब मुँह देखा जाता है। मैले आईने में भी मुँह नहीं देखा जा सकता।

“चित्तशुद्धि के बाद भक्ति प्राप्त करने पर, उनकी कृपा से उनका दर्शन होता है। दर्शन के बाद 'आदेश' पाने पर तब लोकशिक्षा दी जा सकती है। पहले से ही लेक्चर देना ठीक नहीं है। एक गाने में कहा है – 'मन अकेले बैठे क्या सोच रहे हो? क्या कभी प्रेम के बिना ईश्वर मिल सकता है?'

“फिर कहा है, 'तेरे मन्दिर में माधव नहीं हैं। शंख बजाकर तूने हल्ला मचा दिया। उसमें तो ग्यारह चमगीदड़ रातदिन मँडराते रहते हैं।'

“पहले हृदय-मन्दिर को साफ करना होता है। ठाकुरजी की प्रतिमा को लाना होता है। पूजा की तैयारी करनी होती है। कोई तैयारी नहीं, भों भों करके शंख बजाने से क्या होगा?”

अब श्री विजय गोस्वामी वेदी पर बैठे ब्राह्मसमाज की पद्धति के अनुसार उपासना कर रहे हैं। उपासना के बाद वे श्रीरामकृष्ण के पास आकर बैठे।

श्रीरामकृष्ण (विजय के प्रति) – अच्छा, तुम लोगों ने उतना पाप, पाप क्यों कहा? सौ बार 'मैं पापी हूँ, मैं पापी हूँ', ऐसा कहने से वैसा ही हो जाता है। ऐसा विश्वास करना चाहिए कि उनका नाम लिया – है, मेरा फिर पाप कैसा? वे हमारे माँ-बाप हैं; उनसे कहो कि पाप किया है, अब कभी नहीं करूँगा। और उनका नाम लो। सब मिलकर उनके नाम से देहमन को पवित्र करो – जिह्वा को पवित्र करो।


* मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासंगि मोक्षे निर्विषयं स्मृतम्॥- मैत्रायणी उपनिषद

परिच्छेद १९

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परिच्छेद १९

विजयकृष्ण गोस्वामी आदि के प्रति उपदेश

(१)

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ (गीता, २।२०)

मुक्त पुरुष का शरीर त्याग क्या आत्महत्या है?

दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में श्रीयुत विजयकृष्ण गोस्वामी भगवान् श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आए हैं। उनके साथ तीन-चार ब्राह्मभक्त भी हैं। बृहस्पतिवार, १४ दिसम्बर १८८२ ई.। श्रीरामकृष्णदेव के परम भक्त बलराम बाबू के साथ ये लोग कलकत्ते से नाव पर चढ़कर आये हैं। श्रीरामकृष्ण दोपहर को जरा विश्राम कर रहे हैं। उनके पास रविवार को भीड़ ज्यादा होती है। इसीलिए जो भक्त उनसे एकान्त में बातचीत करना चाहते हैं, वे प्रायः दूसरे ही समय में आते हैं।

श्रीरामकृष्ण अपने तखत पर बैठे हुए हैं। विजय, बलराम, मास्टर और दूसरे भक्त उनकी ओर मुँह करके पश्चिमास्य बैठे हैं। कोई चटाई पर तो कोई फर्श ही पर बैठा है। कमरे के पश्चिम ओर के दरवाजे से गंगाजी दिखायी दे रही हैं। शीत ऋतु के कारण भागीरथी शान्त तथा स्वच्छ जल से पूर्ण है। दरवाजे के उस ओर पश्चिम का अर्धगोलाकार बरामदा है। बरामदे के नीचे फूलों का बगीचा और फिर गंगा का पुश्ता है। पुश्ते के पश्चिम अंग से सटकर पुण्यसलीला कलुषहारिणी गंगा मानो ईश्वरमन्दिर के पादमूल को आनन्द के साथ धोते हुए बहती जा रही है।

ठण्डकाल है, इसलिए सभी गरम कपड़े चढ़ाए हुए हैं। विजय को शूल की बहुत पीड़ा होती है, इसलिए वे अपने साथ दवा की शीशी ले आए हैं - दवा लेने का समय होने पर दवा लेंगे। इस समय विजय साधारण ब्राह्मसमाज में आचार्य की नौकरी करते हैं। उन्हें समाज की वेदी पर बैठकर उपदेश देना पड़ता है। परन्तु आजकल समाज के साथ अनेक विषयों पर उनका मतभेद हो रहा है। क्या किया जाय - नौकरी करते हैं, इसलिए अपनी इच्छा के अनुसार न तो कुछ कह सकते हैं, और न कर ही सकते हैं। विजय का जन्म एक अत्यन्त पवित्र और उच्च कुल में हुआ है। भगवान् श्रीचैतन्यदेव के एक प्रधान

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११८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ दिसम्बर १८८२

पार्षद अद्वैत गोस्वामी विजय के पूर्वपुरुष हैं। अद्वैत गोस्वामी ज्ञानी थे, निराकार परब्रह्म के चिन्तन में लीन रहते थे; पर साथ ही उन्होंने भक्ति की भी पराकाष्ठा दिखायी है। वे हरिप्रेम में मतवाले होकर नृत्य करते थे – इतने आत्मविस्मृत हो जाते थे कि नाचते नाचते अंग से वस्त्र तक खिसक जाते थे। विजय भी ब्रह्मसमाज में आए हैं, निराकार परब्रह्म का चिन्तन करते हैं; परन्तु अपने पूर्वज अद्वैत गोस्वामी के पवित्र रक्त की धारा उनकी देह में प्रवाहित हो रही है। हृदय में भगवत्प्रेम का अंकुर प्रकाशोन्मुख है, केवल समय की प्रतीक्षा कर रहा है। इसीलिए वे भगवान् श्रीरामकृष्ण की अपूर्व भगवत्प्रेमोन्मत्त अवस्था को देखकर मुग्ध हुए हैं। मन्त्रमुग्ध सर्प जिस प्रकार सँपेरे के सामने फन निकाले बैठा रहता है, उसी प्रकार विजय भी श्रीरामकृष्ण के श्रीमुख से निकलने वाले भगवत्प्रसंग को सुनते हुए मुग्ध होकर उनके पास बैठे रहते हैं। फिर वे जब भगवत्प्रेम में बालकों की भाँति नृत्य करने लगते हैं तब विजय भी उनके साथ नाचने लग जाते हैं।

विष्णु 'एंड़ेदह' में रहता था। उसने गले में छुरा लगाकर आत्महत्या कर ली। आज उसी की चर्चा हो रही है।

श्रीरामकृष्ण – देखो, उस लड़के ने आत्महत्या कर ली, जब से यह सुना, मन दुखी हो रहा है। यहाँ आता था, स्कूल में पढ़ता था, पर कहता था – संसार अच्छा नहीं लगता। पश्चिम चला गया था, किसी आत्मीय के यहाँ कुछ दिन ठहरा था। वहाँ निर्जन वन में, मैदान में, पहाड़ पर बैठा हुआ सदा ध्यान करता था। उसने मुझसे कहा था, न जाने ईश्वर के कितने रूपों के दर्शन करता हूँ।

“जान पड़ता है, यह अन्तिम जन्म था। पूर्वजन्म में बहुत-कुछ काम उसने कर डाला था। कुछ बाकी रह गया था, वह भी जान पड़ता है इस जन्म में पूरा हो गया।

‘पूर्वजन्म का संस्कार मानना चाहिए। मैंने सुना है, एक मनुष्य शवसाधना कर रहा था। घने जंगल में भगवती की आराधना कर रहा था। परन्तु वह अनेक प्रकार की विभीषिकाएँ देखने लगा। अन्त को उसे बाघ पकड़ ले गया। वहीं एक और आदमी बाघ के भय से पास के एक पेड़ पर चढ़कर बैठा हुआ था। शव तथा पूजा की अन्य सामग्रियाँ इकट्ठी देखकर वह उतर पड़ा। और आचमन करके शव के ऊपर बैठ गया। कुछ जप करते ही माँ प्रकट होकर बोलीं, ‘मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ – तू वर माँग।’ माता के पादपंकजों में प्रणत होकर वह बोला, ‘माँ, एक बात पूछता हूँ। तुम्हारा कार्य देखकर बड़ा आश्चर्य होता है। उस मनुष्य ने इतनी मेहनत की, इतना आयोजन किया, इतने दिनों से तुम्हारी साधना कर रहा था, उस पर तो तुम्हारी कृपा न हुई; प्रसन्न तुम मुझ पर हुई जो भजन-साधन-ज्ञान-भक्ति आदि कुछ नहीं जानता।’ हँसकर भगवती बोलीं, ‘बेटा, तुम्हें जन्मान्तर की बात याद नहीं है। तुम जन्म जन्म से मेरे लिए तपस्या कर रहे हो। उसी साधनबल से इस प्रकार सब कुछ तैयार पाया और तुम्हें मेरे दर्शन भी मिले। अब कहो,

१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | ११९

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१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | ११९

क्या वर चाहते हो?’’

मुक्त पुरुष का शरीरत्याग

एक भक्त बोल उठे, “आत्महत्या की बात सुनकर भय लगता है।”

श्रीरामकृष्ण – आत्महत्या करना महापाप है, घूम-फिरकर संसार में आना पड़ता है, और वही संसार-दुःख भोगना पड़ता है।

“परन्तु यदि कोई ईश्वर-दर्शन के बाद शरीर त्याग दे, तो उसे आत्महत्या नहीं कहते। उस प्रकार के शरीरत्याग में दोष नहीं है। ज्ञानलाभ के बाद कोई कोई शरीर छोड़ देते हैं। जब मिट्टी के साँचे में सोने की मूर्ति ढल जाती है, तब मिट्टी का साँचा चाहे कोई रखे, चाहे तोड़ दे।

“कई वर्ष हो गये, वराहनगर से एक लड़का आता था, उम्र कोई बीस साल की होगी। नाम गोपाल सेन था। जब यहाँ आता था तब उसको इतना भाव हो जाता था कि हृदय को उसे पकड़ रखना पड़ता था कि कहीं गिरकर उसके हाथ-पैर न टूट जाएँ।

“उस लड़के ने एक दिन एकाएक मेरे पैरों पर हाथ रखकर कहा, 'मैं और न आ सकूँगा – अब मैं चला!' कुछ दिन बाद सुना कि उसने देह छोड़ दी।”

(२)

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।। (गीता, ९।३३)

जीव के चार दर्जे। बद्ध जीव के लक्षण – कामिनी-कांचन।

श्रीरामकृष्ण – जीव चार दर्जे के कहे गए हैं – बद्ध, मुमुक्षु, मुक्त और नित्य। संसार मानो जाल है और जीव मछली। ईश्वर, यह संसार जिनकी माया है, मछुए हैं। जब मछुए के जाल में मछलियाँ पड़ती हैं, तब कुछ मछलियाँ जाल चीरकर भागने की अर्थात् मुक्त होने की कोशिश करती हैं। उन्हें मुमुक्षु जीव कहना चाहिए। जो भागने की चेष्टा करती हैं उनमें से सभी नहीं भाग सकतीं। दो-चार मछलियाँ ही धड़ाम से कूदकर भाग जाती हैं। तब लोग कहते हैं, वह बड़ी मछली निकल गयी। ऐसे ही दो-चार मनुष्य मुक्त जीव हैं। कुछ मछलियाँ स्वभावतः ऐसी सावधानी से रहती हैं कि कभी जाल में आती ही नहीं। नारदादि नित्य जीव कभी संसार-जाल में नहीं फँसते। परन्तु प्रायः अधिकतर मछलियाँ जाल में पड़ जाती हैं, फिर भी उन्हें होश नहीं कि जाल में पड़ी हैं, अब मरना होगा। जाल में पड़ते ही जाल-सहित इधर से उधर भागती हैं, और सीधे कीच में घुसकर देह छिपाना चाहती हैं। भागने की कोई चेष्टा नहीं, बल्कि कीच में और गड़ जाती हैं। ये ही बद्ध जीव हैं। बद्ध जीव संसार में अर्थात् कामिनी कांचन में फँसे हुए हैं, कलंकसागर में मग्न हैं, पर सोचते हैं कि बड़े आनन्द में हैं! जो मुमुक्षु या मुक्त हैं, संसार उन्हें कूप

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१२० श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ दिसम्बर १८८२

जान पड़ता है, अच्छा नहीं लगता। इसीलिए कोई कोई ज्ञानलाभ, ईश्वरलाभ हो जाने पर शरीर छोड़ देते हैं, परन्तु इस तरह का शरीरत्याग बड़ी दूर की बात है।

“बद्ध जीवों – संसारी जीवों को किसी तरह होश नहीं होता। कितना दुःख पाते हैं, कितना धोखा खाते हैं, कितनी विपदाएँ झेलते हैं, फिर भी बुद्धि ठिकाने नहीं आती।

“ऊँट कटीली घास को बहुत चाव से खाता है। परन्तु जितना ही खाता है उतना ही मुँह से धर धर खून गिरता है, फिर भी कटीली घास को खाना नहीं छोड़ता! संसारी मनुष्यों को इतना शोकताप मिलता है, किन्तु कुछ दिन बीते कि सब भूल गए। औरत गुजर गयी या बदचलन निकली, तो, फिर ब्याह कर लेता है। बच्चा मर गया, कितना दुःख पाया, पर कुछ ही दिनों में सब भूल जाता है। बच्चे की वही माँ जो मारे शोक के अधीर हो रही थी, कुछ दिन बीत जाने पर फिर बाल सँवारती, जूड़ा बाँधती और गहनों से सजती है। इसी तरह मनुष्य बेटी के ब्याह में कुल धन गँवा बैठता है, परन्तु हर साल बेटियों को पैदा करने में घाटा नहीं होने देता! मुकदमेबाजी से घर में एक कौड़ी नहीं रह जाती तो भी मुकदमे के लिए लोटा डोर टाँगे फिरते हैं! जितने लड़के पैदा हुए हैं, अच्छा भोजन, अच्छे कपड़े, अच्छा घर, उन्हीं को नहीं मिलता, ऊपर से हर साल एक और पैदा होता है!

“कभी कभी तो ‘साँप छछूँदर’ वाली गति होती है। न निगल सके, न उगल सके। बद्ध जीव कभी समझ भी गया कि संसार में कुछ है नहीं, सिर्फ गुठली चाटना है, तो भी वह उसे नहीं छोड़ सकता, ईश्वर की ओर मन नहीं ले जा सकता।

“केशव सेन के एक आत्मीय को देखा, उम्र कोई पचास साल की थी, पर ताश खेल रहा था। मानो ईश्वर का नाम लेने का समय नहीं आया!

“बद्ध जीव का एक और लक्षण है। यदि उसको संसार से हटाकर किसी अच्छी जगह पर ले जाओ, तो वह तड़प-तड़पकर मर जाएगा। विष्ठा के कीट को विष्ठा ही में आनन्द मिलता है। उसी से वह हृष्टपुष्ट होता है। उस कीट को अगर अन्न की हण्डी में रख दो तो वह मर जाएगा।” (सब स्तब्ध हैं।)

(३)

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।। (गीता, ६।३५)

तीव्र वैराग्य तथा बद्ध जीव

विजय – बद्ध जीवों के मन की कैसी अवस्था हो तो मुक्ति हो सकती है?

श्रीरामकृष्ण – ईश्वर की कृपा से तीव्र वैराग्य होने पर इस कामिनी-कांचन की आसक्ति से निस्तार हो सकता है। जानते हो तीव्र वैराग्य किसे कहते हैं? ‘बनत बनत बनि

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जाई', 'चलो राम भजो', यह सब मन्द वैराग्य है। जिसे तीव्र वैराग्य होता है उसके प्राण भगवान् के लिए व्याकुल रहते हैं, जैसे अपनी कोख के बच्चे के लिए माँ व्याकुल रहती है। जिसको तीव्र वैराग्य होता है वह भगवान् को छोड़ और कुछ नहीं चाहता। संसार को वह कुआँ समझता है; उसे जान पड़ता है कि अब डूबा। आत्मीयों को वह काला नाग देखता है, उनके पास से उसकी भागने की इच्छा होती है और भागता भी है। 'घर का काम पूरा कर लें तब ईश्वर की चिन्ता करेंगे', यह उसके मन में आता ही नहीं। भीतर बड़ी जिद रहती है।

“तीव्र वैराग्य किसे कहते हैं, इसकी एक कहानी सुनो। किसी देश में एक बार वर्षा कम हुई। किसान नालियाँ काट-काटकर दूर से पानी लाते थे। एक किसान बड़ा हठी था। उसने एक दिन शपथ ली कि जब तक पानी न आने लगे, नहर से नाली का योग न हो जाए, तब तक बराबर नाली खोदूँगा। इधर नहाने का समय हुआ। उसकी स्त्री ने लड़की को उसे बुलाने भेजा। लड़की बोली, 'पिताजी, दोपहर हो गयी, चलो तुमको माँ बुलाती है।' उसने कहा, 'तू चल, हमें अभी काम है।' दोपहर ढल गयी, पर वह काम पर डटा रहा। नहाने का नाम न लिया। तब उसकी स्त्री खेत में जाकर बोली, 'नहाओगे कि नहीं? रोटियाँ ठण्डी हो रही हैं। तुम तो हर काम में हठ करते हो। काम कल करना या भोजन के बाद करना।' गालियाँ देता हुआ कुदाल उठाकर किसना स्त्री को मारने दौड़ा बोला, 'तेरी बुद्धि मारी गयी है क्या? देखती नहीं कि पानी नहीं बरसता; खेती का काम सब पड़ा है; अब की बार लड़के-बच्चे क्या खाएँगे? सब को भूखों मरना होगा। हमने यही ठान लिया है कि खेत में पहले पानी लायेंगे, नहाने-खाने की बात पीछे होगी।' मामला टेढ़ा देखकर उसकी स्त्री वहाँ से लौट पड़ी। किसान ने दिनभर जी तोड़ मेहनत करके शाम के समय नहर के साथ नाली का योग कर दिया। फिर एक किनारे बैठकर देखने लगा, किस तरह नहर का पानी खेत में 'कलकल' स्वर से बहता हुआ आ रहा है, तब उसका मन शान्ति और आनन्द से भर गया। घर पहुँचकर उसने स्त्री को बुलाकर कहा, 'ले आ अब डोल और रस्सी।' स्नान भोजन करके निश्चिन्त होकर फिर वह सुख से खुर्राटे लेने लगा। जिद यह है और यही तीव्र वैराग्य की उपमा है।

“खेत में पानी लाने के लिए एक और किसान गया था। उसकी स्त्री जब गयी और बोली, 'धूप बहुत हो गयी, चलो अब, इतना काम नहीं करते', तब वह चुपचाप कुदाल एक ओर रखकर बोला, 'अच्छा, तू कहती है तो चलो।' (सब हँसते हैं।) वह किसान खेत में पानी न ला सका। यह मन्द वैराग्य की उपमा है।

“हठ बिना जैसे किसान खेत में पानी नहीं ला सकता, वैसे ही मनुष्य ईश्वरदर्शन नहीं कर सकता।”

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१२२श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ दिसम्बर १८८२

(४)

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।। (गीता २।७०)

कामिनी-कांचन के लिए दासत्व

श्रीरामकृष्ण – पहले तुम इतना आते थे पर अब क्यों नहीं आते?

विजय – यहाँ आने की बड़ी इच्छा रहती है, परन्तु अब मैं स्वाधीन नहीं हूँ, ब्राह्मसमाज में नौकरी करता हूँ।

श्रीरामकृष्ण – कामिनी-कांचन जीव को बाँध लेते हैं। जीव की स्वाधीनता चली जाती है। कामिनी ही से कांचन की आवश्यकता होती है, जिसके लिए दूसरों की गुलामी की जाती है; फिर स्वाधीनता नहीं रहती, फिर तुम अपने मन का काम नहीं कर सकते।

“जयपुर में गोविन्दजी के पुजारी पहले-पहल अपना विवाह नहीं करते थे। तब वे बड़े तेजस्वी थे। एक बार राजा के बुलाने पर भी वे नहीं गए और कहा – ‘राजा ही को आने को कहो।’ फिर राजा और पंचों ने मिलकर उनका विवाह करा दिया। तब राजा से साक्षात् करने के लिए किसी को बुलाना नहीं पड़ा! वे खुद हाजिर होते थे। कहते ‘महाराज, आशीर्वाद देने आए हैं, यह निर्माल्य लाए हैं, धारण कीजिये।’ आज घर बनवाना है, आज लड़के का ‘अन्नप्राशन’ है, आज लड़के का पाठशाला जाने का शुभ मुहूर्त है इन्हीं कारणों से आना पड़ता है।

“‘बारह सौ ‘भगत’ और तेरह सौ ‘भगतिन’वाली कहावत तो जानते हो न! नित्यानन्द गोस्वामी के पुत्र वीरभद्र के तेरह सौ ‘भगत’ शिष्य थे। जब वे सिद्ध हो गए तब वीरभद्र डरे। वे सोचने लगे कि ये सब के सब सिद्ध हो गए, लोगों को जो कह देंगे वही होगा; जिधर से निकलेंगे वहीं भय है, क्योंकि मनुष्य बिना जाने यदि कोई अपराध कर डालेंगे तो उनका अहित होगा। यह सोचकर वीरभद्र ने उन्हें बुलाकर कहा, ‘तुम गंगातट से सन्ध्या-उपासना करके हमारे पास आओ।’ ‘भगत’ तब ऐसे तेजस्वी थे कि ध्यान करते ही करते समाधिमग्न हो गए। कब ज्वार का पानी सिर से बह गया, इसकी उन्हें खबर ही नहीं। भाटा हो गया, तथापि ध्यानभंग न हुआ। तेरह सौ भगतों में से एक सौ समझ गये थे कि वीरभद्र क्या कहेंगे। आचार्य की बात को टालना नहीं चाहिए, अतएव वे तो खिसक गए, वीरभद्र से साक्षात् नहीं किया। रहे बारह सौ भगत, वे वीरभद्र के पास लौटकर आए। वीरभद्र बोले, ‘ये तेरह सौ भगतिनें तुम्हारी सेवा करेंगी, तुम लोग इनसे विवाह करो।’ शिष्यों ने कहा, ‘जैसी आपकी आज्ञा; परन्तु हममें से एक सौ न जाने कहाँ चले गए।’ उन बारह सौ भगतों के साथ एक एक सेवादासी रहने लगी। फिर उनका वह तेज, तपस्याबल न रह गया। स्त्री के साथ रहने के कारण वह बल जाता रहा, क्योंकि

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उसके साथ स्वाधीनता नहीं रह जाती। (विजय से) तुम लोग स्वयं यह देखते हो; दूसरों का काम करते हुए क्या हो रहे हो। और देखो, इतनी परीक्षाएँ पास करनेवाले, इतनी अंग्रेजी जाननेवाले पण्डित नौकरी करते हुए सुबह-शाम मालिकों के बूट की ठोकरें खाते हैं। इसका कारण केवल ‘कामिनी’ है। विवाह करके यह हरी-भरी दुनिया उजाड़ने की इच्छा नहीं होती। इसीलिए यह अपमान, दासता की यह इतनी मार!

ईश्वरलाभ के उपरान्त कामिनी की मातृभाव से पूजा

“यदि एक बार उस प्रकार के तीव्र वैराग्य से भगवान् मिल जाएँ तो फिर स्त्रियों के प्रति आसक्ति नहीं रह जाती। घर में रहने से भी स्त्री की लालसा नहीं होती, फिर उससे कोई भय नहीं रहता। यदि एक चुम्बक-पत्थर बड़ा हो और एक छोटा, तो लोहे को कौन खींच सकता है? बड़ा ही खींच सकता है। ईश्वर बड़ा चुम्बक-पत्थर है और कामिनी छोटा चुम्बक-पत्थर है। तो भला कामिनी क्या कर सकेगी?”

एक भक्त – महाराज, स्त्रियों से घृणा करें?

श्रीरामकृष्ण – जिन्होंने ईश्वरलाभ कर लिया है, वे स्त्रियों को ऐसी दृष्टि से नहीं देखते, जिससे भय हो। वे यथार्थ देखते हैं कि स्त्रियों में ब्रह्ममयी माता का अंश है; और उन्हें माता जानकर उनकी पूजा करते हैं। (विजय से) तुम कभी कभी आया करो, तुम्हें देखने की बड़ी इच्छा होती है।

(५)

ईश्वरादेश प्राप्त होने के बाद आचार्य-पद

विजय – ब्राह्म समाज का काम करना पड़ता है, इसलिए हर समय नहीं आ सकता। अवकाश मिलने पर आऊँगा।

श्रीरामकृष्ण – देखो, आचार्य का काम बड़ा कठिन है। ईश्वर का प्रत्यक्ष आदेश पाए बिना लोकशिक्षा नहीं दी जा सकती।

“यदि आदेश पाए बिना ही उपदेश दिया जाय तो लोग उस ओर ध्यान नहीं देते, उस उपदेश में कोई शक्ति नहीं रहती। पहले साधना करके या जिस तरह हो, ईश्वर को प्राप्त करना चाहिए। उनकी आज्ञा मिलने पर फिर लेक्चर दिया जा सकता है! उस देश में ‘हालदारपुकुर’ नाम का एक तालाब है। उसके बाँध पर लोग पाखाना किया करते थे। जो लोग घाट पर आते थे, वे उन्हें खूब गालियाँ देते थे, खूब गुल-गपाड़ा मचाते थे, परन्तु गालियों से कोई काम न होता था। दूसरे दिन फिर वही हालत होती थी। अन्त को कम्पनी के चपरासी नोटिस लटका गए कि यहाँ शौच के लिए जाने की सख्त मनाही है; न माननेवाले को सजा दी जाएगी। इस नोटिस के बाद फिर वहाँ कोई शौच के लिए नहीं


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१२४श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ दिसम्बर १८८२

जाता था।

“उनके आदेश के बाद कहीं भी आचार्य हुआ जा सकता है और लेक्चर भी दिया जा सकता है। जिसको उनका आदेश मिलता है, उसे उनकी शक्ति भी मिलती है; तब वह आचार्य का कठिन काम कर सकता है।

“एक बड़े जमींदार से उसकी एक प्रजा मुकदमा लड़ रही थी। तब लोग समझ गए कि उस प्रजा के पीछे कोई जोरदार आदमी है; सम्भव है कि कोई बड़ा जमींदार ही उसकी ओर से मुकदमा चला रहा हो। मनुष्य साधारण जीव है, ईश्वर की शक्ति के बिना आचार्य जैसा कठिन काम वह नहीं कर सकता।”

सच्चिदानन्द ही गुरु और मुक्तिदाता है

विजय – महाराज, ब्राह्मसमाज में जो उपदेश दिए जाते हैं, क्या उनसे लोगों का उद्धार नहीं होता?

श्रीरामकृष्ण – मनुष्य में वह शक्ति कहाँ कि वह दूसरे को संसारबन्धन से मुक्त कर सके? यह भुवनमोहिनी माया जिनकी है, वे ही इस माया से मुक्त कर सकते हैं। सच्चिदानन्द गुरु को छोड़ और दूसरी गति नहीं है। जिसको ईश्वर-दर्शन नहीं हुआ, उनका आदेश नहीं मिला, जो ईश्वर की शक्ति से शक्तिशाली नहीं है, उसकी क्या मजाल कि जीवों का भवबन्धन-मोचन कर सके?

“मैं एक दिन पंचवटी के निकट झाऊतल्ले की ओर जा रहा था। एक मेढ़क की आवाज सुनायी दी – जान पड़ा कि साँप ने पकड़ा है। काफी देर बाद जब लौटने लगा तब भी उस मेढ़क की पुकार शुरू ही थी। बढ़कर देखा तो दिखायी दिया की एक कौड़ियाला साँप उस मेढ़क को पकड़े हुए है – न छोड़ सकता है, न निगल सकता है उस मेढ़क की भी भवव्यथा दूर नहीं हो रही है। तब मैंने सोचा कि यदि कोई असल साँप पकड़ता तो तीन ही पुकार में इसको चुप हो जाना पड़ता। इस कौड़ियाले ने पकड़ा है, इसीलिए साँप की भी दुर्दशा है और मेढ़क की भी!

“यदि सद्गुरु हो तो जीव का अहंकार तीन ही पुकार में दूर होता है। गुरु कच्चा हुआ तो गुरु की भी दुर्दशा है और शिष्य की भी। शिष्य का अहंकार दूर नहीं होता, न उसके भवबन्धन की फाँस ही कटती है। कच्चे गुरु के पल्ले पड़ा तो शिष्य मुक्त नहीं होता।”

(६)

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते। (गीता, ३।२७)

माया या अहंबुद्धि का नाश और ईश्वर-दर्शन

विजय – महाराज, हम लोग इस तरह बद्ध क्यों हो रहे हैं? ईश्वर को क्यों नहीं देख पाते?

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१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | १२५

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१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | १२५

श्रीरामकृष्ण – जीव का अहंकार ही माया है। यही अहंकार कुल आवरणों का कारण है। ‘मैं’ मरा कि बला टली। यदि ईश्वर की कृपा से ‘मैं अकर्ता हूँ’ यह ज्ञान हो गया तो वह मनुष्य तो जीवन्मुक्त हो गया। फिर उसे कोई भय नहीं।

“यह माया या ‘अहं’ मेघ की तरह है। मेघ का एक छोटासा ही टुकड़ा क्यों न हो, पर उसके कारण सूर्य नहीं दीख पड़ते। उसके हट जाने से ही सूर्य दीख पड़ते हैं। यदि श्रीगुरु की कृपा से एक बार अहंबुद्धि दूर हो जाय तो फिर ईश्वर के दर्शन होते हैं।

“सिर्फ ढाई हाथ की दूरी पर श्रीरामचन्द्र हैं, जो साक्षात् ईश्वर हैं; पर बीच में सीतारूपिणी माया का पर्दा पड़ा हुआ है, इसी कारण लक्ष्मणरूपी जीव को ईश्वर के दर्शन नहीं होते। यह देखो तुम्हारे मुँह के आगे मैं इस अँगोछे की ओट करता हूँ। अब तुम मुझे नहीं देख सकते। पर हूँ मैं तुम्हारे बिलकुल निकट। इसी तरह औरों की अपेक्षा भगवान् निकट हैं, परन्तु इस माया-आवरण के कारण तुम उनके दर्शन नहीं पाते।

“जीव तो स्वयं सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, परन्तु इसी माया या अहंकार से वे नाना उपाधियों में पड़े हुए अपने स्वरूप को भूल गए हैं।

“एक एक उपाधि होती है, और जीवों का स्वभाव बदल जाता है। किसी ने काली धारीदार धोती पहनी कि देखना, प्रेमगीतों की तान मुँह से आप ही आप निकल पड़ती है, और ताश खेलना, सैरसपाटे के लिए निकलना तो हाथ में छड़ी लेकर – ये सब आप ही आप जुट जाते हैं! चाहे दुबला-पतला ही हो परन्तु बूट पहनते ही सीटी बजाना शुरू हो जाता है; सीढ़ियों पर चढ़ते समय साहबों की तरह उछलकर चढ़ता है! मनुष्य के हाथ में कलम रहे तो उसका यह गुण है कि कागज का जैसा-तैसा टुकड़ा पाते ही वह उस पर कलम घिसना शुरू कर देता है।

“रुपया भी एक विचित्र उपाधि है। रुपया होते ही मनुष्य एक दूसरी तरह का हो जाता है। वह पहले जैसा नहीं रह जाता। यहाँ एक ब्राह्मण आया जाया करता था। बाहर से वह बड़ा विनयी था। कुछ दिन बाद हम लोग कोन्नगर गए, हृदय साथ था। हम लोग नाव पर से उतरे कि देखा, वही ब्राह्मण गंगा के किनारे बैठा हुआ है। शायद हवाखोरी के लिए आया था। हम लोगों को देखकर बोला, ‘क्यों महाराज, कहो कैसे हो?’ उसकी आवाज सुनकर मैंने हृदय से कहा, ‘हृदय, सुना, इसके धन हो गया है, इसी से आवाज किरकिराने लगी’ हृदय हँसने लगा।

“किसी मेढ़क के पास एक रुपया था। वह एक बिल में रखा रहता था। एक हाथी उस बिल को लाँघ गया। तब मेढ़क बिल से निकलकर बड़े गुस्से में आकर लगा हाथी को लात दिखाने! और बोला, तुझे इतनी हिम्मत कि मुझे लाँघ जाय!’ रुपये का इतना अहंकार होता है!

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अहंकार कब जाता है? – ब्रह्मज्ञान की अवस्था सप्तभूमि

“ज्ञानलाभ होने से अहंकार दूर हो सकता है। ज्ञानलाभ होने से समाधि होती है। जब समाधि होती है, तभी अहंकार जाता है। ऐसा ज्ञानलाभ बड़ा कठिन है।

“वेदों में कहा है कि मन सप्तम भूमि पर जाने से समाधि होती है। समाधि होने से ही अहंकार दूर हो सकता है। मन प्रायः प्रथम तीन भूमियों में रहता है। लिंग, गुदा और नाभि ये ही वे तीन भूमियाँ हैं। तब मन संसार की ओर – कामिनी-कांचन की ओर खिंचा रहता है। जब मन हृदय में रहता है तब ईश्वरी ज्योति के दर्शन होते हैं। वह मनुष्य ज्योति देखकर कह उठता है – ‘यह क्या, यह क्या है!’ इसके बाद मन कण्ठ में आता है। तब केवल ईश्वर की ही चर्चा करने और सुनने की इच्छा होती है। कपाल या भौंहों के बीच में जब मन आता है तब सच्चिदानन्द-रूप दीख पड़ता है। उस रूप को गले लगाने और उसे छूने की इच्छा होती है, परन्तु छुआ नहीं जाता। लालटेन के भीतर की बत्ती को कोई चाहे देख ले पर उसे छू नहीं सकता, जान पड़ता है कि छू लिया, परन्तु छू नहीं पाता। जब सप्तम भूमि पर मन जाता है तब अहं नहीं रह जाता, समाधि होती है।”

विजय – वहाँ पहुँचने पर जब ब्रह्मज्ञान होता है, तब मनुष्य क्या देखता है?

श्रीरामकृष्ण – सप्तम भूमि में मन के जाने पर क्या होता है, मुँह से नहीं कहा जा सकता। नमक की गुड़िया समुंदर नापने गई। किन्तु जैसे पानी में उतरी वैसेही गल गई अब समुंदर के गहराई की खबर कौन देगी? जो देगी वही तो उसके साथ मिल गई। सप्तम भूमि में मन का नाश होता है, समाधि होती है। क्या अनुभव होता है वह मुँह से कहा नहीं जाता।

‘अहं’ जाता नहीं है। ‘बदमाश मैं।’ ‘दास मैं।’

“जो ‘मैं’ संसारी बनता है, कामिनी-कांचन में फँसता है, वह बदमाश ‘मैं’ है। जीव और आत्मा में भेद सिर्फ इसलिए है कि बीच में यह ‘मैं’ जुड़ा हुआ है। पानी पर अगर लाठी डाल दी जाए तो पानी दो हिस्सों में बँटा हुआ दीख पड़ता है। परन्तु वास्तव में है वह एक ही पानी; लाठी के कारण उसके दो हिस्से नजर आते हैं।

“यह लाठी ‘अहं’ ही है। लाठी उठा लो, वही एक जल रह जायगा।

“‘बदमाश मैं’ वह है जो कहता है, ‘मुझे नहीं जानते हो! मेरे इतने रुपये हैं, क्या मुझसे भी कोई बड़ा आदमी है?’ यदि किसी ने दस रुपये चुरा लिये तो पहले वह चोर से रुपये छीन लेता है, फिर चोर की ऐसी मरम्मत करता है कि पसली पसली ढीली कर देता है; इतने पर भी उसको नहीं छोड़ता, पहरेवाले के हाथ सौंपता है और सजा दिलवाता है! ‘बदमाश मैं’ कहता है, ‘अरे, इसने मेरे दस रुपये चुराये थे, उफ, इतनी हिम्मत!’”

विजय – यदि बिना ‘अहं’ के दूर हुए सांसारिक भोगों से पिण्ड नहीं छूटने का –

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समाधि नहीं होने की, तो ज्ञानमार्ग पर आना ही अच्छा है, क्योंकि उससे समाधि होगी। यदि भक्तियोग में 'अहं' रह जाता है तो ज्ञानयोग ही अच्छा ठहरा।

श्रीरामकृष्ण – समाधि प्राप्त होकर एक दो मनुष्यों का अहंकार जाता है अवश्य, परन्तु प्रायः नहीं जाता। लाख विचार करो, पर देखना कि 'अहं' घूम-घामकर फिर उपस्थित है। आज बरगद का पेड़ काट डालो, कल सुबह को उसमें अंकुर निकला हुआ ही देखोगे। ऐसी दशा में यदि 'मैं' नहीं दूर होने का तो रहने दो साले को 'दास मैं' बना हुआ। 'हे ईश्वर! तुम प्रभु हो, मैं दास हूँ' इसी भाव में रहो। 'मैं दास हूँ', 'मैं भक्त हूँ' ऐसे 'मैं' में दोष नहीं। मिठाई खाने से अम्लशूल होता है, पर मिश्री मिठाइयों में नहीं गिनी जाती।

“ज्ञानयोग बड़ा कठिन है। देहात्मबुद्धि का नाश हुए बिना ज्ञान नहीं होता। कलियुग में प्राण अन्नगत है, अतएव देहात्मबुद्धि, अहंबुद्धि नहीं मिटती। इसलिए कलियुग के लिए भक्तियोग है। भक्तिपथ सीधा पथ है। हृदय से व्याकुल होकर उनके नाम का स्मरण करो, उनसे प्रार्थना करो, भगवान् मिलेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।

“मानो जलराशि पर बिना बाँस रखे ही एक रेखा खींची गयी है, मानो जल के दो भाग हो गये हैं; परन्तु वह रेखा बड़ी देर तक नहीं रहती। 'दास मैं' या 'भक्त का मैं' अथवा 'बालक का मैं' ये सब 'मैं' की रेखाएँ मात्र हैं।”

(७)

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥ (गीता, १२।५)

भक्तियोग ही युगधर्म है। ज्ञानयोग की विशेष कठिनता

'दास मैं' – 'भक्त मैं' और 'बालक मैं'

विजय – महाराज, आप 'बदमाश मैं' को दूर करने के लिए कहते हैं, तो क्या 'दास मैं' में दोष नहीं?

श्रीरामकृष्ण – नहीं। 'दास मैं' अर्थात् 'मैं ईश्वर का दास हूँ', 'मैं उनका भक्त हूँ' इस अभिमान में दोष नहीं, बल्कि इससे भगवान् मिलते हैं।

विजय – अच्छा, तो 'दास मैं' वाले के काम-क्रोधादि कैसे होते हैं?

श्रीरामकृष्ण – अगर उसके भाव में पूरी सच्चाई आ जाय तो काम-क्रोधादि का आकार मात्र रह जाता है। यदि ईश्वरलाभ के बाद भी किसी का 'दास मैं' या 'भक्त मैं' बना रहा तो वह मनुष्य किसी का अनिष्ट नहीं कर सकता। पारस पत्थर छू जाने पर तलवार सोना हो जाती है; तलवार का स्वरूप तो रहता है, पर वह किसी की हिंसा नहीं करती।

“नारियल के पेड़ का पत्ता झड़ जाता है, उसकी जगह सिर्फ दाग बना रहता है,

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जिससे यह समझ लिया जाता है कि कभी यहाँ पत्ता लगा हुआ था। इसी तरह जिसको ईश्वर मिल गये हैं उसके अहंकार का चिह्न भर रह जाता है, काम-क्रोध का स्वरूप मात्र रह जाता है, उसकी बालक जैसी अवस्था हो जाती है। बालक सत्व, रज, तम में से किसी गुण के बंधन में नहीं आता। बालक जितनी जल्दी किसी वस्तु पर अड़ जाता है, उतनी ही जल्दी वह उसे छोड़ भी देता है। एक पाँच रुपये की कीमत का कपड़ा चाहे तुम धेले के खिलौने पर रिझाकर फुसला लो। पहले तो वह बहककर कहेगा, 'नहीं, मैं न दूँगा, मेरे बाबूजी ने मोल ले दिया है।' और लड़के के लिए सभी बराबर हैं। ये बड़े हैं, यह छोटा है, यह ज्ञान उसे नहीं; इसीलिए उसे जाति-पाँति का विचार भी नहीं है। माँ ने कह दिया है, 'वह तेरा दादा है', फिर चाहे वह कलार हो, वह उसी के साथ बैठकर रोटी खाता है। बालक को घृणा नहीं, शुचि और अशुचि पर ध्यान नहीं, शौच के लिए जाकर हाथ नहीं मटियाता।

“कोई कोई समाधि के बाद भी 'भक्त का मैं', 'दास का मैं' लेकर रहते हैं। 'मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो', 'मैं भक्त हूँ, तुम भगवान् हो।' यह अभिमान भक्तों का बना रहता है। ईश्वरलाभ के बाद भी रहता है। सम्पूर्ण 'मैं' नहीं दूर होता। और फिर इसी अभिमान का अभ्यास करते करते ईश्वर-प्राप्ति भी होती है। यही भक्तियोग है।

“भक्ति के मार्ग पर चलने से भी ब्रह्मज्ञान होता है। भगवान् सर्वशक्तिमान हैं। वे इच्छा करें तो ब्रह्मज्ञान भी दे सकते हैं। भक्त प्रायः ब्रह्मज्ञान नहीं चाहते। 'मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो', 'मैं बच्चा हूँ, तू माँ हैं' वे ऐसा अभिमान रखना चाहते हैं।”

विजय – जो लोग वेदान्त-विचार करते हैं, वे भी तो उन्हें पाते हैं?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, विचारमार्ग से भी वे मिलते हैं। इसी को ज्ञानयोग कहते हैं। विचारमार्ग बड़ा कठिन है। सप्तभूमि की बात तो तुम्हें बतलायी है। सप्तम भूमि पर मन के पहुँचने से समाधि होती है, 'ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या' यह बोध होने पर मन का लय होता है, समाधि होती है। परन्तु कलि में जीवों का प्राण अन्नगत है 'ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या' का बोध फिर कैसे हो सकता है? ऐसा बोध देहबुद्धि के बिना दूर हुए नहीं हो सकता। 'मैं न शरीर हूँ, न मन हूँ, न चौबीस तत्त्व हूँ, मैं सुख और दुःख से परे हूँ, मुझे फिर कैसा रोग, कैसा शोक, कैसी जरा, कैसी मृत्यु?' – ऐसा बोध कलिकाल में होना कठिन है। चाहे जितना विचार करो, देहात्मबुद्धि कहीं न कहीं से आ ही जाती है। बड़ के पेड़ को काट डालो, तुम तो सोचते हो कि जड़समेत उखाड़ फेंका, पर दूसरे दिन सबेरे उसमें कनखा निकला ही हुआ देखोगे! देहाभिमान नहीं दूर होता; इसीलिए कलिकाल में भक्तियोग अच्छा है, सीधा है।

“और 'मैं चीनी बन जाना नहीं चाहता, चीनी खाना ही मुझे अच्छा जान पड़ता है।' मेरी कभी यह इच्छा नहीं होती कि कहूँ 'मैं ही ब्रह्म हूँ।' मैं तो कहता हूँ 'तुम भगवान् हो,

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar