श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
परिच्छेद ६०
परिच्छेद ६०
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ
(१)
भक्तियोग, समाधितत्त्व, और महाप्रभु की अवस्थाएँ।
हठयोग और राजयोग
९ दिसम्बर १८८३, रविवार अगहन शुक्ला दशमी, दिन के दो बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे के उसी छोटे तख्त पर बैठे हुए भक्तों के साथ भगवच्चर्चा कर रहे हैं। अधर, मनोमोहन, ठनठनिया के शिवचन्द्र, राखाल, मास्टर, हरीश आदि कितने ही भक्त बैठे हुए हैं। हाजरा भी उस समय वहीं रहते थे। श्रीरामकृष्ण महाप्रभु की अवस्था का वर्णन कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) – चैतन्यदेव को तीन अवस्थाएँ होती थीं। बाह्यदशा, – तब, स्थूल और सूक्ष्म में उनका मन रहता था। अर्धबाह्यदशा, – तब कारण-शरीर में, कारणानन्द में चला जाता था। अन्तर्दशा, – तब महाकारण में मन लीन हो जाता था।
“वेदान्त के पंचकोष के साथ इसका यथार्थ मेल है। स्थूल-शरीर अर्थात् अन्नमय और प्राणमय कोष। सूक्ष्म-शरीर अर्थात् मनोमय और विज्ञानमय कोष। कारण – शरीर अर्थात् आनन्दमय कोष। महाकारण पंचकोषों से परे है। महाकारण में जब मन लीन होता था तब वे समाधि-मग्न हो जाते थे। इसी का नाम निर्विकल्प अथवा जड़-समाधि है।
“चैतन्यदेव को जब बाह्यदशा होती थी तब वे नामसंकीर्तन करते थे। अर्धबाह्यदशा में भक्तों के साथ नृत्य करते थे। अन्तर्दशा में समाधिस्थ हो जाते थे।
मास्टर (स्वगत) – क्या श्रीरामकृष्ण इस प्रकार अपनी स्वयं की अवस्थाओं की ओर ही संकेत कर रहे हैं? चैतन्यदेव की भी ऐसी ही अवस्थाएँ होती थीं!
श्रीरामकृष्ण – श्रीचैतन्य भक्ति के अवतार थे। वे जीवों को भक्ति की शिक्षा देने के लिए आए थे। उन पर भक्ति हुई तो सब कुछ हो गया। फिर हठयोग की कोई आवश्यकता नहीं।
एक भक्त – जी, हठयोग कैसा है?
श्रीरामकृष्ण – हठयोग में शरीर की ओर मन ज्यादा देना पड़ता है। अन्तर-प्रक्षालन
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के लिए हठयोगी बाँस की नली पर गुदा-स्थापन करता है। लिंग के द्वारा दूध-घी खींचता रहता है। जिह्वा-सिद्धि का अभ्यास करता है। आसन साधकर कभी कभी शून्य पर चढ़ जाता है। ये सब कार्य वायु के हैं। तमाशा दिखाते हुए किसी ने तालु के अन्दर जीभ घुसेड़ दी थी। बस, उसका शरीर स्थिर हो गया। लोगों ने सोचा, यह मर गया। कितने ही वर्ष वह कब्र में मिट्टी के नीचे पड़ा रहा। कालान्तर में वह कब्र धँस गयी। तब एकाएक उसे चेत हुआ। चेतना के होते ही वह चिल्ला उठा – यह देखो कलाबाजी! यह देखो गिरहबाजी! (सब हँसते हैं।) यह सब साँस की करामात है।
“वेदान्तवादी हठयोग नहीं मानते।
“हठयोग और राजयोग। राजयोग में मन के द्वारा योग होता है। भक्ति के द्वारा, विचार के द्वारा भी योग होता है। यही योग अच्छा है। हठयोग अच्छा नहीं, क्योंकि कलि में प्राण अन्न के अधीन हैं।”
(२)
श्रीरामकृष्ण की तपस्या। श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्त और भविष्यत् महातीर्थ। मूर्तिदर्शन
श्रीरामकृष्ण नौबतखाने की बगलवाली राह पर खड़े हुए देख रहे हैं – मणि नौबतखाने के बरामदे में एक ओर बैठे हुए घेरे की आड़ में किसी गहन चिन्ता में डूबे हुए हैं। क्या वे ईश्वर का चिन्तन कर रहे हैं? श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले की और गए थे। मुँह धोकर वहीं जाकर खड़े हुए।
श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, यहाँ बैठे हुए हो! तुम्हारा काम जल्दी होगा। कुछ ही दिन करने से कोई कहेगा – 'यह, यह करो।'
चौंककर वे श्रीरामकृष्ण की ओर ताकते रह गये। अभी तक आसन भी नहीं छोड़ा।
श्रीरामकृष्ण – तुम्हारा समय हो आया है। जब तक अण्डों के फोड़ने का समय नहीं होता, तब तक चिड़िया अण्डे नहीं फोड़ती। जो मार्ग तुम्हें बतलाया गया है, वही तुम्हारे लिए ठीक है।
यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने फिर से मार्ग बतला दिया।
श्रीरामकृष्ण – यह नहीं कि सभी को तपस्या अधिक करनी पड़े। परन्तु मुझे तो बड़ा ही कष्ट उठाना पड़ा था। मिट्टी के टीले पर सिर रखकर पड़ा रहता था। न जाने कहाँ दिन पार हो जाता था। केवल 'माँ, माँ' कहकर पुकारता था और रोता था।
मणि श्रीरामकृष्ण के पास लगभग दो साल से आ रहे हैं। वे अंग्रेजी पढ़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण कभी कभी उन्हें इंग्लिश-मैन कहकर पुकारते थे। उन्होंने कालेज में अध्ययन किया है। विवाह भी किया है।
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केशव और दूसरे पण्डितों के व्याख्यान सुनने और अंग्रेजी दर्शन और विज्ञान पढ़ने में उनका खूब जी लगता है। परन्तु जब से वे श्रीरामकृष्ण के पास आए, तब से यूरोपीय पण्डितों के ग्रन्थ और अंग्रेजी अथवा दूसरी भाषाओं के व्याख्यान उन्हें अलोने जान पड़ने लगे। अब दिनरात केवल श्रीरामकृष्ण को देखना और उन्हीं की बातें सुनना चाहते हैं।
आजकल श्रीरामकृष्ण की एक बात वे सदा सोचते रहते हैं। श्रीरामकृष्ण ने कहा हैं, ‘साधना करने से मनुष्य ईश्वर को देख सकता है।’ उन्होंने यह भी कहा है, ‘ईश्वरदर्शन ही मनुष्यजीवन का उद्देश्य है।’
श्रीरामकृष्ण – कुछ दिन करने से ही कोई कहेगा – ‘यह, यह करो।’ तुम एकादशी का व्रत करना। तुम लोग अपने आदमी हो, आत्मीय हो। नहीं तो तुम इतना क्यों आओगे? कीर्तन सुनते सुनते राखाल को मैंने देखा था, वह व्रजमण्डल के भीतर था। नरेन्द्र का स्थान बहुत ऊँचा है। और हीरानन्द। उसका कैसा बालकों का – सा भाव है! उसका भाव कैसा मधुर है! उसे भी देखने को जी चाहता है।
“मैंने श्रीगौरांग के सांगोपांगों को देखा था; भाव में नहीं, इन्हीं आँखों से! पहले ऐसी अवस्था थी कि सादी दृष्टि से सब दर्शन होते थे! अब तो भाव में होते हैं।
“सादी दृष्टि से श्रीगौरांग के सब सांगोपांगों को देखा था। उसमें शायद तुम्हें भी देखा था। और शायद बलराम को भी।
“किसी को देखकर झट उठकर क्यों खड़ा हो जाता हूँ, जानते हो? आत्मीयों को दीर्घकाल के बाद देखने से ऐसा ही होता है।
“माँ से रो-रोकर कहता था, माँ, भक्तों के लिए मेरा जी निकल रहा है; उन्हें शीघ्र मेरे पास ला दे। जो कुछ मैं सोचता था, वही होता था।
“पंचवटी में मैंने तुलसीकानन बनाया था, जप-ध्यान करने के लिए। बड़ी इच्छा हुई कि चारों ओर से बाँस की कमानियों का घेरा लगा दूँ। इसके बाद ही देखा, ज्वार में बहकर कुछ कमानियों का गट्ठा और कुछ रस्सी ठीक पंचवटी के सामने आकर लग गयी है। ठाकुरबाड़ी में एक कहार रहता था। आनन्द से नाचते हुए उसने आकर यह खबर सुनायी।
“जब यह अवस्था हुई तब और पूजा न कर सका। कहा माँ, मुझे कौन देखेगा? माँ, मुझमें ऐसी शक्ति नहीं है कि अपना भार खुद ले सकूँ। और तुम्हारी बात सुनने को जी चाहता है; भक्तों को खिलाने की इच्छा होती है; सामने पड़ जाने पर किसी को कुछ देने को भी इच्छा होती है। माँ, यह सब किस तरह होगा? माँ, तुम एक बड़ा आदमी मेरी सहायता के लिए दो। इसीलिए तो मथुरबाबू ने इतनी सेवा की!
“और भी कहा था, माँ, मेरे तो सब सन्तान होगी नहीं, परन्तु इच्छा होती है कि एक शुद्ध भक्त बालक सदा मेरे साथ रहे। इसी तरह का एक बालक मुझे दो। इसीलिए तो
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राखाल आया। जो जो आत्मीय हैं, उनमें कोई अंश है और कोई कला।”
श्रीरामकृष्ण फिर पंचवटी की ओर जा रहे हैं। केवल मास्टर साथ हैं, और कोई नहीं। श्रीरामकृष्ण प्रसन्नतापूर्वक उनसे विविध वार्तालाप कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – देखो, मैंने एक दिन कालीमन्दिर से पंचवटी तक एक अद्भुत मूर्ति देखी! इस पर तुम्हारा विश्वास होता है?
मास्टर आश्चर्य में आकर निर्वाक् हो रहे।
वे पंचवटी की शाखा से दो-चार पत्ते तोड़कर अपनी जेब में रख रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – यह डाल गिर गयी है, देखते हो? मैं इसके नीचे बैठता था।
मास्टर – मैं इसकी एक छोटीसी डाल तोड़ ले गया हूँ। उसे घर में रख दिया है।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – क्यों?
मास्टर – देखने से आनन्द होता है। सब समाप्त हो जाने पर यही जगह महातीर्थ होगी।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – किस तरह का तीर्थ? क्या पानीहाटी की तरह का?
पानीहाटी में बड़े समारोह के साथ राघव पण्डित का महोत्सव होता है। श्रीरामकृष्ण प्रायः हर साल यह महोत्सव देखने जाया करते हैं और संकीर्तन के बीच में प्रेम और आनन्द से नृत्य किया करते हैं, मानो भक्तों की पुकार सुनकर श्रीगौरांग स्थिर नहीं रह सकते – संकीर्तन में स्वयं जाकर अपनी प्रेममूर्ति के दर्शन कराते हैं।
(३)
हरिकथा-प्रसंग
सन्ध्या हो गयी। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में छोटे तख्त पर बैठे हुए जगन्माता का चिन्तन कर रहे हैं। क्रमशः मन्दिर में देवताओं की आरती होने लगी। शंख और घण्टे बजने लगे। मास्टर आज रात को यही रहेंगे।
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से 'भक्तमाल' पढ़कर सुनाने के लिए कहा। मास्टर पढ़ रहे हैं।*
“जयमल नाम के एक शुद्धचित्त राजा थे। भगवान् श्रीकृष्ण पर उनकी अचल प्रीति थी। नवधा भक्ति के यजन में वे इतने दृढ़निष्ठ थे कि पत्थर पर खिंची हुई रेखा की तरह उसका ह्रास न हो पाता था। वे जिस विग्रह का पूजन करते थे उसका नाम श्यामलसुन्दर था। श्यामलसुन्दर को छोड़ वे और अन्य किसी देवी-देवता को मानो जानते ही न थे उन्हीं पर उनका चित्त लगा रहता था। सदा दृढ़ नियमों से वे दस दण्ड दिन चढ़ते तक उस
* यह बंगला का भक्तमाल है। छन्दोबद्ध है। यहाँ इसका हिन्दी अनुवाद दिया गया है।
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मूर्ति की पूजा किया करते थे। अपने पूजन में वे इतने दृढ़निश्चय थे कि चाहे राज्य और धन का नाश हो जाए, चाहे वज्रपात हो, तथापि पूजा के समय किसी दूसरी ओर ध्यान न देते थे।
“इस बात की खबर उनके एक दूसरे प्रतिस्पर्धी राजा के पास पहुँची। उसने सोचा, यह तो शत्रु को पराजित करने का एक उत्तम उपाय हाथ आया। जिस समय राजा जयमल पूजन के लिए बैठे थे उसी समय उसने उनके राज्य पर आक्रमण कर युद्ध की घोषणा कर दी। राजा की आज्ञा बिना सेना युद्ध नहीं कर सकती। अतः राजा जयमल की सेना उनकी आज्ञा की राह देखती रही। तब तक शत्रुओं ने उनका किला घेर लिया। तथापि इन्होंने उस समय युद्ध की ओर ध्यान ही नहीं दिया, निरुद्वेग होकर पूजन करते रहे। इनकी माता सिर पटकती हुई पास आकर उच्च स्वर से रोदन करने लगी। विलाप करते हुए उसने कहा कि अब जल्दी उठो, नहीं तो सब कुछ चला जाएगा; तुम तो ऐसे हो कि तुम्हारा इधर ध्यान ही नहीं है - शत्रु चढ़ आया - अब किला तोड़ना ही चाहता है। महाराज जयमल ने कहा, ‘माता! तुम क्यों दुःख कर रही हो? जिसने यह राज-पाट दिया है, वह अगर छीन ले तो हमारा इसमें क्या! और अगर वह हमारी रक्षा करे, तो वह शक्ति किसमें है जो हमसे ले सके? अतएव हम लोगों का उद्यम तो व्यर्थ ही है।’
“इधर श्यामलसुन्दर ने घोड़े पर सवार हो अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्ध की तैयारी कर दी। अकेले ही भक्त के शत्रुओं का संहार करके घोड़े को अपने मन्दिर के पास बाँधकर श्यामलसुन्दर जहाँ के तहाँ हो रहे।
“पूजा-अर्चना समाप्त होने पर राजा जयमल बाहर आकर देखते हैं कि सामने उनका घोड़ा पसीने से तर हो हाँफता खड़ा हैं। वे पूछने लगे, ‘मेरे घोड़े पर कौन सवार हुआ और इसे यहाँ बाँध गया?’ सभी कहने लगे कि यह तो हम कुछ भी नहीं जानते। राजा के मन में सन्देह हुआ और यही सोचते हुए वे सेनासहित युद्धभूमि की ओर बढ़े। जाकर उन्होंने देखा कि सारी शत्रुसेना रणभूमि में लोट रही है - केवल शत्रुपक्ष का राजा भर बचा है। विस्मित होकर राजा जयमल इसका कारण पूछने लगे। इतने में वह प्रतिस्पर्धी राजा उनके समीप आया और हाथ जोड़कर विनती करने लगा। वह बोला, ‘आपके एक सिपाही ने अकेले ही इतना आश्चर्यजनक युद्ध किया कि उनके सामने कोई टिक न सका। वह अवश्य ही त्रिलोकविजयी है। महाराज, मैं आपका धन या राज्य नहीं चाहता। बल्कि आप चलकर मेरा भी राज्य ले लें। परन्तु मुझे आप इतना बताइये कि वह साँवला सिपाही कौन था? केवल एक बार दर्शन देकर उसने मेरा मन हर लिया है।’
“जयमल को समझने में देर न लगी कि यह सब श्यामलसुन्दरजी का ही खेल है। यह मर्म जानते ही प्रतिद्वन्द्वी राजा जयमल के चरण पकड़कर स्तव करने लगे और कहने लगे कि जिनके कारण मुझ पर कृष्ण की कृपा हुई उन आपके चरणों में मैं शरण लेता हूँ
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- कृपा कीजिए कि वह श्यामल सिपाही मेरा स्वीकार करे।”
पाठ समाप्त होने के बाद श्रीरामकृष्ण मास्टर के साथ बात कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – इन बातों पर तुम्हारा विश्वास होता है? – घोड़े पर सवार होकर उन्होंने सेनानाश किया था; इन सब बातों पर?
मास्टर – भक्त ने व्याकुल होकर उन्हें पुकारा था। इस पर विश्वास होता है। श्रीभगवान् को उसने ठीक ठीक सवार करते देखा था या नहीं, यह सब समझ में नहीं आता। वे सवार होकर आ सकते हैं, परन्तु उन लोगों ने उन्हें ठीक ठीक देखा था या नहीं, इस पर विश्वास नहीं जमता।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – पुस्तक में भक्तों की अच्छी कथाए लिखी हैं, परन्तु हैं सब एक ही ढर्रे की। जिनका दूसरा मत है, उनकी निन्दा लिखी है।
दूसरे दिन सुबह को बगीचे में खड़े हुए श्रीरामकृष्ण वार्तालाप कर रहे हैं। मणि कहते हैं, “तो मैं यहाँ आकर रहूँगा।”
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, तुम लोग जो इतना आया करते हो, इसके क्या मानी है? साधु को लोग ज्यादा से ज्यादा एक बार आकर देख जाते हैं। तुम इतना आते हो – इसके क्या मानी है?
मणि तो चकित हो गये। श्रीरामकृष्ण स्वयं ही इस प्रश्न का उत्तर देने लगे।
श्रीरामकृष्ण (मणि से) – अन्तरंग न होते तो क्या आते? अन्तरंग अर्थात् आत्मीय, अपना आदमी – जैसे पिता, पुत्र, भाई, बहन। सब बातें मैं नहीं कहता। नहीं तो फिर क्यों आओगे?
“शुकदेव ब्रह्मज्ञान पाने के लिए जनक के पास गए थे। जनक ने कहा, 'पहले दक्षिणा दो।' शुकदेव ने कहा, 'जब तक उपदेश नहीं मिल जाता, तब तक कैसे दक्षिणा दूँ?' जनक ने हँसते हुए कहा, 'तुम्हें ब्रह्मज्ञान हो जाने पर फिर गुरु और शिष्य का भेद थोड़े ही रह जाएगा? इसीलिए हमने पहले दक्षिणा की बात कही'।”
(४)
सेवक की विचारतरंगें
शुक्लपक्ष है। चाँद निकला है। मणि कालीमन्दिर के उद्यान के रास्ते पर टहल रहे हैं। रास्ते के एक ओर श्रीरामकृष्ण का कमरा, नौबतखाना, बकुलतला और पंचवटी है – दूसरी ओर ज्योत्स्नापूर्ण भागीरथी बह रही हैं।
मणि मन ही मन कह रहे हैं – “क्या सचमुच ही ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं? श्रीरामकृष्ण तो ऐसा कहते हैं। उन्होंने कहा कि थोड़ी साधना करते ही कोई आकर बता देगा, 'ऐसा ऐसा करो।' अर्थात् उन्होंने थोड़ी साधना करने के लिए कहा। अच्छा, मेरा
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तो विवाह हो चुका है, लड़के-बच्चे भी हुए हैं, क्या इतने पर भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है? (थोड़ा सोचकर) अवश्य ही किया जा सकता है, नहीं तो ये वैसा क्यों कहते? उनकी कृपा होने से क्यों न होगा?
“सामने यह जगत् दिखायी दे रहा है – ये सूर्य, चन्द्र, तारे, जीव, चौबीस तत्त्व – ये सब कैसे उत्पन्न हुए, इनका करतार कौन है, मैं, उनका कौन हूँ, यह न जानने पर जीवन ही व्यर्थ है।
“श्रीरामकृष्ण पुरुषश्रेष्ठ हैं। ऐसे महापुरुष मैंने जीवन में आज तक नहीं देखे। इन्होंने अवश्य ही ईश्वर को देखा है। अन्यथा, ये 'माँ माँ' कहते हुए दिनरात किसके साथ बातचीत करते रहते हैं! अन्यथा, ईश्वर पर इनका इतना प्रेम कैसे हो सकता है! इतना प्रेम कि एकदम बाह्यज्ञानरहित हो जाते हैं! समाधिमग्न जड़वत् हो जाते हैं! फिर कभी प्रेम में मतवाले होकर हँसते, रोते नाचते और गाते हैं।”
$$\square\quad\square\quad\square$$
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ
(१)
अध्यात्मरामायण
आज अगहन की पूर्णिमा और संक्रान्ति हैं। दिन शुक्रवार १४ दिसम्बर १८८३। दिन के नौ बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे के दरवाजे के पास दक्षिण-पूर्व के बरामदे में खड़े हैं। पास ही रामलाल खड़े हैं। राखाल और लाटू भी कहीं इधर-उधर पास ही थे। मणि ने आकर भूमिष्ठ हो प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण ने कहा “आ गए, अच्छा हुआ। आज दिन भी अच्छा है।” मणि कुछ दिन श्रीरामकृष्ण के पास रहेंगे। साधना करेंगे। श्रीरामकृष्ण ने कहा है, “थोड़ी साधना करते ही कोई आकर तुम्हें बता देगा, ऐसा ऐसा करो।”
श्रीरामकृष्ण ने इनसे कहा है, “यहाँ अतिथिशाला का अन्न तुम्हारे लिए रोज खाना उचित नहीं। यह साधुओं और कंगालों के लिए है। तुम अपना भोजन पकाने के लिए एक आदमी ले आना।” इसीलिए उनके साथ एक आदमी भी आया है।
उनका भोजन कहाँ पकाया जाएगा, इसकी व्यवस्था कर दी गयी। वे दूध पीएँगे, इसके लिए श्रीरामकृष्ण ने रामलाल को अहीर से कह देने को कहा।
रामलाल ‘अध्यात्मरामायण’ पढ़ रहे हैं और श्रीरामकृष्ण सुन रहे हैं। मणि भी बैठे हुए सुन रहे हैं -
‘श्रीरामचन्द्रजी सीताजी से विवाह करके अयोध्या लौट रहे हैं। रास्ते में परशुराम से भेंट हुई। श्रीरामचन्द्र ने शिव का धनुष्य तोड़ डाला है, यह सुनकर परशुराम रास्ते में बड़ा गुलगपाड़ा मचाने लगे। मारे भय के दशरथ के होश ही उड़ गए। परशुराम ने एक दूसरा धनुष राम को देकर उस पर उन्हें गुण चढ़ा देने के लिए कहा। राम ने कुछ मुसकराकर बायें हाथ से धनुष्य लेकर गुण चढ़ाकर उसमें टंकार किया। शरासन में शरयोजना करके परशुराम से उन्होंने कहा, अब यह बाण कहाँ छोड़ूँ - कहो। परशुराम का दर्प चूर्ण हो गया। वे श्रीरामचन्द्र को परब्रह्म कहकर उनकी स्तुति करने लगे।”
परशुराम की स्तुति सुनते ही सुनते श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया। रह-रहकर,
३६८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ दिसम्बर, १८८३
'राम राम' नाम का मधुर स्वर में उच्चारण कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (रामलाल से) – जरा गुह-निषाद की कथा तो सुनाओ। रामलाल 'भक्तमाल' से सुनाते रहे –
"श्रीरामचन्द्र जब पिता की सत्यरक्षा के लिए वन गए थे, तब उन्हें देखकर निषादराज को बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके नेत्रों से अश्रु की धारा बहने लगी; गला रुँध आया और वे काठ की बनी पुतली की तरह निःस्पन्द होकर अनिमेष दृष्टि से एकटक देखते रहे। धीरे धीरे उन्होंने श्रीरामचन्द्र के पास जाकर कहा, 'आप हमारे घर चलें।' श्रीरामचन्द्र उन्हें मित्र कहकर भर बाँह भेंटे। निषाद ने आत्मसमर्पण करते हुए कहा, 'आप मेरे मित्र हुए तो मैं भी आपको अपने प्राणों के साथ अपनी देह समर्पित करता हूँ। आप ही मेरे प्राण, धन, राज्य हैं, आप ही मेरी भक्ति, मुक्ति हैं, आप मेरे सर्वस्व हैं। आपके चरणों में मैं देहसमर्पण करता हूँ।'
"श्रीरामचन्द्र चौदह साल वन में रहेंगे और जटा-वल्कल धारण करेंगे, यह सुनकर निषादराज ने भी जटा-वल्कल धारण कर लिया। फल-मूल छोड़कर अन्य कोई भोजन उन्होंने नहीं किया। चौदह साल के बाद भी श्रीरामचन्द्र नहीं आ रहे हैं यह देखकर गुह अग्निप्रवेश करने जा रहे थे। इसी समय हनुमानजी ने आकर संवाद दिया। संवाद पाकर गुह आनन्दसागर में मग्न हो गए। श्रीरामचन्द्र और सीतामाई पुष्पक विमान पर आकर उपस्थित हो गए।
तीव्र वैराग्य तथा संसारत्याग
"भक्तवत्सल रामचन्द्र ने प्रिय भक्त गुह को देखते ही दृढ़ आलिंगन में बाँध हृदय से लगा लिया। दोनों की देह आँसुओ से तर हो गयी। निषादराज गुह धन्य हो गए। चारों ओर उनका जयजयकार होने लगा।"
भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण थोड़ा आराम कर रहे हैं। मास्टर पास बैठे हुए हैं। इसी समय श्याम डाक्टर तथा और भी कुछ आदमी आए। श्रीरामकृष्ण उठकर बैठ गए और बातचीत करने लगे।
श्रीरामकृष्ण – बात यह नहीं कि कर्म बराबर करते ही जाना पड़े। ईश्वरलाभ हो जाने पर कर्म फिर नहीं रह जाते। फल होने पर फूल आप ही झड़ जाते हैं।
"जिसे ईश्वरप्राप्ति हो जाती है उसके लिए सन्ध्यादि कर्म नहीं रह जाते। सन्ध्या गायत्री में लीन हो जाती है; तब गायत्री जपने से ही काम हो जाता है। और गायत्री का लय ओंकार में हो जाता है; तब गायत्री जपने की भी आवश्यकता नहीं रह जाती। तब केवल 'ॐ' कहने से ही हो जाता है। सन्ध्यादि कर्म कब तक है! – जब तक हरिनाम् या रामनाम में पुलक न हो, अश्रुधारा न बहे। धन के लिए या मुकदमा जीतने के लिए पूजा आदि कर्म
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करना अच्छा नहीं।”
एक भक्त – धन की चेष्टा तो, मैं देखता हूँ, सभी करते हैं। केशव सेन को ही देखिये, किस तरह महाराजा के साथ उन्होंने अपनी लड़की का विवाह किया।
श्रीरामकृष्ण – केशव की बात दूसरी है। जो यथार्थ भक्त है वह अगर चेष्टा न भी करे तो भी ईश्वर उसके लिए सब कुछ जुटा देते हैं। जो ठीक ठीक राजा का लड़का है वह मुशाहरा पाता है। वकील आदि की बात मैं नहीं कहता – जो मेहनत करके, दूसरों की दासता करके रुपया कमाते हैं। मैं कहता हूँ, ठीक राजा का लड़का। जिसे कोई कामना नहीं है वह रुपया-पैसा नहीं चाहता; रुपया उसके पास आप ही आता है। गीता में है –
यदृच्छालाभ।
“जो सद्ब्राह्मण है, जिसे कोई कामना नहीं है, वह चमार के यहाँ का भी सीधा ले सकता है। 'यदृच्छालाभ'। वह कामना नहीं करता, उसके पास प्राप्ति आप ही आती है।”
एक भक्त – अच्छा महाराज, संसार में किस तरह रहना चाहिए?
श्रीरामकृष्ण – पाँकाल मछली की तरह रहना चाहिए। संसार से दूर निर्जन में जाकर कभी कभी ईश्वरचिन्तन करने पर उनमें भक्ति होती है। तब निर्लिप्त होकर संसार में रह सकोगे। पाँकाल मछली कीच के भीतर रहती है, फिर भी कीच उसकी देह में नहीं लगता। इस तरह का आदमी अनासक्त होकर संसार में रहता है।
श्रीरामकृष्ण देख रहे हैं, मणि एकाग्र चित्त से उनकी सब बातें सुन रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मणि को देखकर) – तीव्र वैराग्य होने से लोग ईश्वर को पाते हैं। जिसे तीव्र वैराग्य होता है, उसे जान पड़ता है, संसार दावाग्नि की तरह है - जल रहा है! वह स्त्री और पुत्र को कुएँ के सदृश देखता है। इस तरह का वैराग्य जब होता है तब घर-द्वार आप ही छूट जाता है। केवल अनासक्त होकर संसार में रहना उसके लिए पर्याप्त नहीं है। कामिनी-कांचन यही माया है। माया को अगर पहचान सको तो वह आप लज्जा से भाग खड़ी होगी। एक आदमी बाघ की खाल ओढ़कर भय दिखा रहा है। जिसे भय दिखा रहा है उसने कहा, मैं तुझे पहचानता हूँ, तू तो 'हिरुआ' है। तब वह हँसकर चला गया – और किसी दूसरे को भय दिखाने लगा।
“जितनी स्त्रियाँ हैं सब शक्तिरूपिणी हैं। वही आदिशक्ति स्त्री का रूप धारण किए हुए है। अध्यात्मरामायण में है – नारदादि राम का स्तव करते हैं, 'हे राम, जितने पुरुष हैं सब आप हैं और प्रकृति के जितने रूप हैं सब सीता हैं। तुम इन्द्र हो, सीता इन्द्राणी; तुम शिव हो, सीता शिवानी; तुम नर हो, सीता नारी; अधिक और क्या कहूँ – जहाँ पुरुष है वहाँ तुम हो, जहाँ स्त्रियाँ हैं वहाँ सीता।'
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त्याग और प्रारब्ध। वामाचार-साधन का निषेध
(भक्तों से) “मन में लाने से ही त्याग नहीं किया जा सकता। प्रारब्ध, संस्कार ये सभी हैं। एक राजा से किसी योगी ने कहा, 'तुम मेरे पास बैठकर परमात्मा का चिन्तन करो।' राजा ने उत्तर दिया, 'यह मुझसे न होगा। मैं यहाँ रह सकता हूँ; परन्तु मुझे अब भी भोग करना है। इस वन में अगर रहूँगा तो आश्चर्य नहीं कि इस वन में भी एक राज्य हो जाए। मेरा भोग अभी बाकी है।'
“नटवर पाँजा जब बच्चा था, इस बगीचे में जानवर चराता था। परन्तु उसके भाग्य में बहुत बड़ा भोग था; इसीलिए तो इस समय अण्डी का कारखाना खोलकर इतना रुपया इकट्ठा किया है। आलमबाजार में अण्डी का रोजगार खूब चला रहा है।
“एक मत में है, स्त्री लेकर साधना करना। 'कर्ताभजा' सम्प्रदाय की स्त्रियों के बीच में एक बार एक आदमी मुझे ले गया था। वे सब मेरे पास आकर बैठ गयीं। मैं जब उन्हें 'माँ माँ' कहने लगा तब वे आपस में कहने लगीं, ये प्रवर्त्तक हैं, अभी 'घाट' की पहचान इनको नहीं हुई! उन लोगों के मत में कच्ची अवस्था को प्रवर्त्तक कहते हैं, उसके बाद साधक, उसके बाद सिद्ध और फिर सिद्ध का सिद्ध।
“एक स्त्री वैष्णवचरण के पास जाकर बैठी। वैष्णवचरण से पूछने पर उन्होंने कहा, इसका बालिका-भाव है।
“स्त्री-भाव से शीघ्र पतन होता है। मातृभाव शुद्ध भाव है।”
काँसारीपाड़ा के भक्तगण उठ पड़े। कहा, तो अब हम लोग चलें; कालीमाई तथा और देवों के दर्शन करेंगे।
(२)
श्रीरामकृष्ण और प्रतिमापूजा। व्याकुलता और ईश्वरलाभ
मणि पंचवटी और कालीमन्दिर के विभिन्न स्थानों में अकेले घूम रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने कहा है, 'थोड़ी साधना करने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं।' क्या मणि यही सोच रहे हैं?
फिर श्रीरामकृष्ण ने तीव्र वैराग्य की बात कही और कहा कि माया को पहचान लेने पर वह भाग खड़ी होती है। मणि यही सब सोच रहे हैं।
पिछला पहर है, साढ़े तीन बजे का समय होगा। मणि फिर आकर श्रीरामकृष्ण के कमरे में बैठे हैं। ब्राउन इन्स्टिट्यूशन से एक शिक्षक कुछ छात्रों को साथ लेकर श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आए हुए हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे वार्तालाप कर रहे हैं। शिक्षक महाशय बीच बीच में एक एक प्रश्न कर रहे हैं। बातचीत मूर्तिपूजन के सम्बन्ध में हो रही है।
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श्रीरामकृष्ण (शिक्षक से) – मूर्तिपूजन में दोष क्या है? वेदान्त में हैं, जहाँ 'अस्ति, भाति और प्रिय' है, वहीं उनका प्रकाश है, इसलिए उनके सिवाय और किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है।
“और देखो, छोटी छोटी लड़कियाँ कितने दिन गुड़िया लेकर खेलती हैं? जितने दिन तक उनका विवाह नहीं होता और जितने दिन तक वे पति-सहवास नहीं करतीं। विवाह हो जाने पर गुड़ियाँ-गुड्डों को उठाकर सन्दूक में रख देती हैं। ईश्वरलाभ हो जाने पर फिर मूर्तिपूजन की क्या आवश्यकता है?”
मणि की ओर देखकर श्रीरामकृष्ण कहते हैं – “अनुराग होने पर ईश्वर मिलते हैं। खूब व्याकुलता होनी चाहिए। खूब व्याकुलता होने पर सम्पूर्ण मन उन्हें अर्पित हो जाता है।
“एक आदमी के एक लड़की थी। बहुत कम आयु में लड़की विधवा हो गयी थी। पति का मुख उसने कभी न देखा था। दूसरी स्त्रियों के पतियों को आते-जाते वह देखती थी। उसने एक दिन कहा, 'पिताजी, मेरा पति कहाँ है?' उसके पिता ने कहा, 'गोविन्दजी तेरे पति हैं। उन्हें पुकारने पर वे तुझे दर्शन देंगे।' यह सुनकर वह लड़की द्वार बन्द करके गोविन्द को पुकारती और रोती थी। वह कहती थी – 'गोविन्द! तुम आओ, मुझे दर्शन दो, तुम क्यों नहीं आते?' छोटी लड़की का यह रोना सुनकर गोविन्दजी स्थिर न रह सके। उसे उन्होंने दर्शन दिए।
“बालक जैसा विश्वास। बालक माँ को देखने के लिए जिस तरह व्याकुल होता है वैसी व्याकुलता चाहिए। इस व्याकुलता के होने पर समझना चाहिए कि अरुणोदय हुआ। इसके बाद सूर्योदय होगा ही। इस व्याकुलता के बाद ही ईश्वरदर्शन होता है।
“जटिल बालक की कथा आती है। वह पाठशाला जाता था। कुछ जंगल की राह से पाठशाला जाना पड़ता था; इसलिए वह डरता था। उसने अपनी माँ से यह कहा। माता ने कहा, 'डर क्या है? तू मधुसूदन को पुकारना।' बच्चे ने पूछा, 'मधुसूदन कौन है?' माता ने कहा, 'मधुसूदन तेरे दादा होते हैं।' जब अकेले में जाते समय वह डरा, तब एक आवाज लगायी – 'मधुसूदन दादा!' कहीं कोई न आया। तब वह, 'कहाँ हो मधुसूदन दादा! जल्दी आओ, मुझे बड़ा डर लग रहा है' कहकर जोर जोर से पुकारते हुए रोने लगा। मधुसूदन न रह सके। आकर कहा, 'यह हैं हम, तुझे भय क्या है?' यह कहकर उसे साथ लेकर वे पाठशाला के रास्ते तक छोड़ आए, और कहा, 'तू जब बुलाएगा तभी मैं दौड़ा जाऊँगा, भय क्या है?' यही बालक का विश्वास है! यही व्याकुलता है!
“एक ब्राह्मण के यहाँ भगवान् की सेवा होती थी। एक दिन किसी काम से उसे किसी दूसरी जगह जाना पड़ा। वह अपने छोटे बच्चे से कह गया, 'आज श्रीठाकुरजी का भोग लगाना, उन्हें खिलाना।' बच्चे ने ठाकुरजी का भोग लगाया, परन्तु ठाकुरजी चुपचाप
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बैठे ही रहे। न बोले और न कुछ खाया ही। बच्चे ने बड़ी देर तक बैठे बैठे देखा कि ठाकुरजी नहीं उठते। उसे दृढ़ विश्वास था कि ठाकुरजी आकर आसन पर बैठकर भोजन करेंगे। वह बार बार कहने लगा, 'ठाकुरजी, आओ, भोग पा लो, बड़ी देर हो गयी अब और मुझसे बैठा नहीं जाता।' ठाकुरजी क्यों उत्तर देने लगे? तब बच्चे ने रोना शुरू कर दिया; कहने लगा, 'ठाकुरजी, पिताजी तुम्हें खिलाने के लिए कह गए हैं, तुम क्यों नहीं आओगे? क्यों मेरे पास नहीं खाओगे?' व्याकुल होकर ज्यों ही कुछ देर तक वह रोया कि ठाकुरजी हँसते हँसते आकर हाजिर हो गए और आसन पर बैठकर भोग पाने लगे। ठाकुरजी को खिलाकर जब वह ठाकुरघर से निकला, तब घरवालों ने कहा, 'भोग हो गया तो वह सब उतार ले आ।' बच्चे ने कहा, 'हाँ, हो गया; ठाकुरजी ने सब भोग खा लिया।' उन लोगों ने कहा, 'अरे, यह तू क्या कहता है!' बच्चे ने सरलतापूर्वक कहा, क्यों खा तो गए हैं ठाकुरजी सब।' तब घरवालों ने ठाकुरघर में जाकर देखा तो छक्के छूट गए।"
सन्ध्या होने को अभी देर है। श्रीरामकृष्ण नौबतखाने के दक्षिण ओर खड़े हुए मणि के साथ बातचीत कर रहे हैं। सामने गंगा है। जाड़े का समय है। श्रीरामकृष्ण ऊनी कपड़ा पहने हुए हैं।
श्रीरामकृष्ण – पंचवटीवाले घर में सोओगे?
मणि – क्या ये लोग नौबतखाने के ऊपर का कमरा न देंगे?
श्रीरामकृष्ण खजांची से मणि की बात कहेंगे। रहने के लिए एक कमरा ठीक कर देंगे। मणि को नौबतखाने के ऊपर का कमरा पसन्द आया है। वे हैं भी कविता प्रिय मनुष्य। नौबतखाने से आकाश, गंगा, चाँदनी, फूलों के पेड़ ये सब दीख पड़ते हैं।
श्रीरामकृष्ण – देंगे क्यों नहीं? मैं पंचवटीवाला घर इसलिए कह रहा हूँ कि वहाँ बहुत रामनाम और ईश्वरचिन्तन किया गया है।
(३)
जीवन का अन्तिम लक्ष्य - ईश्वर से प्रेम
श्रीरामकृष्ण के कमरे में धूप दिया गया है। उसी छोटे तख्त पर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण ईश्वरचिन्तन कर रहे हैं। मणि जमीन पर बैठे हुए हैं। राखाल, लाटू, रामलाल ये भी कमरे के अन्दर हैं।
श्रीरामकृष्ण मणि से कह रहे हैं, – “बात है उन पर भक्ति करना – उन्हें प्यार करना।” फिर उन्होंने रामलाल से गाने के लिए कहा। रामलाल मधुर कण्ठ से गाने लगे। श्रीरामकृष्ण हर गाने का पहला चरण कह दे रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण के कहने पर रामलाल पहले श्रीगौरांग का संन्यास गा रहे हैं।
(भावार्थ) – “केशवभारती के कुटीर में मैंने कैसी अपूर्वज्योति गौरांगमूर्ति देखी!
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उनके दोनों नेत्रों में शत धाराओं से होकर प्रेम बह रहा है। मत्त मातंग के सदृश श्रीगौरांग कभी तो प्रेमावेश में नाचते हुए गाते हैं, कभी धूल में लोटते हैं, कभी आँसुओं में बहते हैं। वे रोते हुए हरि को पुकार रहे हैं। उनका उच्च स्वर स्वर्ग और मत्यलोक को भी हिला रहा है। कभी वे दाँतों में तृण दबाकर, हाथ जोड़, बार बार दासता से मुक्त कर देने के लिए परमात्मा से प्रार्थना कर रहे हैं। अपने घुँघराले बालों को मुँड़ाकर उन्होंने योगी का वेश धारण किया है। उनकी भक्ति और प्रेमावेश को देखकर जी रो उठता है। जीवों के दुःख से दुःखी होकर, सर्वस्व त्यागकर वे प्रेम प्रदान करने के लिए आए हैं। 'प्रेमदास' की यही अभिलाषा है कि वह श्रीचैतन्यदेव के चरणों का दास होकर उनके साथ दर दर घूमे।”
रामलाल ने फिर एक गाना गाया। इसमें श्रीगौरांगदेव की माता शची का विलाप है।
इसके बाद श्रीरामकृष्ण के आदेशानुसार रामलाल ने कुछ और गाने गाए।
श्रीरामकृष्ण रामलाल से फिर 'गौरांग और नित्यानंद' वाला गाना गाने के लिए कह रहे हैं। इस बार रामलाल के साथ श्रीरामकृष्ण भी गा रहे हैं।
(भावार्थ) – “हे प्रभु श्रीगौरांग और नित्यानन्द, तुम दोनों भाई बड़े ही दयालु हो! यही सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। मैं काशी गया था। वहाँ विश्वेश्वरजी ने मुझसे कहा है, वे परब्रह्म इस समय शचीदेवी के घर में हैं। हे परब्रह्म! मैंने तुम्हें पहचान लिया है। मैं कितनी ही जगह गया, परन्तु इस तरह के दयासागर और कहीं मेरी दृष्टि में नहीं पड़े। तुम दोनों ब्रजमण्डल में कृष्ण बलराम थे। अब नदिया में आकर श्रीगौरांग और नित्यानन्द हुए हो! तुम्हारी ब्रज की क्रीड़ा थी दौड़धूप और अब यह नदिया में तुम्हारी क्रीड़ा है धूल में लोटपोट हो जाना। ब्रज में तुम्हारी क्रीड़ा जोर जोर की किलकारियाँ थीं और आज नदिया में तुम्हारी क्रीड़ा है, हरिनाम-कीर्तन। तुम्हारे सब और अंग तो छिप गए हैं, परन्तु दोनों बंकिम नेत्र अब भी हैं। तुम्हारा पतितपावन नाम सुनकर मेरे हृदय में बहुत बड़ा भरोसा हो गया है। मैं बड़ी आशा से यहाँ दौड़ा हुआ आया हूँ। तुम अपने चरणों की शीतल छाया में मुझे स्थान दो। जगाई और मधाई जैसे पाखण्डी भी तर गए हैं; प्रभो, यही भरोसा मुझे भी है। मैंने सुना है, तुम दोनों चाण्डालों को भी हृदय से लगा लेते हो, हृदय से लगाकर हरिनाम-कीर्तन करते हो।”
निर्जन में भक्तों की साधना
रात बहुत हो चुकी है। नौबतखाने के ऊपरवाले कमरे में मणि अकेले बैठे हुए हैं। आज अगहन की पूर्णिमा है। आकाश, गंगा, कालीमन्दिर, मन्दिरों के शिखर, उद्यानपथ, पंचवटी – सभी चन्द्रलोक से आलोकित हैं। मणि एकाकी श्रीरामकृष्ण का चिन्तन कर रहे हैं।
३७४ श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ दिसम्बर, १८८३
रात के करीब तीन बज गए। मणि उठे और उत्तराभिमुख हो पंचवटी की ओर जाने लगे। श्रीरामकृष्ण ने पंचवटी की बात कही है। नौबतखाना अब अच्छा नहीं लग रहा है। मणि ने पंचवटीवाले घर में रहने का निश्चय किया।
चारों ओर नीरवता है। रात के ग्यारह बजे गंगा में ज्वार आया था। बीच बीच में पानी की आवाज सुनायी दे रही है। मणि पंचवटी की ओर बढ़ने लगे। इतने में उन्हें दूर से एक आवाज सुनायी पड़ी। मानो कोई पंचवटी के वृक्षमण्डप के भीतर से आर्त स्वर से पुकार रहा है – 'कहाँ हो दादा मधुसूदन!'
आज पूर्णिमा होने के कारण वटवृक्ष की शाखा-प्रशाखाओं को भेदकर चन्द्र की किरणें प्रकाशित हो रहीं हैं।
कुछ और अग्रसर होकर मणि ने दूर से देखा कि पंचवटी में श्रीरामकृष्ण के एक भक्त बैठे हुए निर्जन में एकाकी पुकार रहे हैं – 'कहाँ हो दादा मधुसूदन!' मणि निःस्तब्ध हो देखते रहे।
परिच्छेद ६२
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परिच्छेद ६२
दक्षिणेश्वर में अंतरंग भक्तों के साथ
प्रह्लादचरित्र-श्रवण तथा भावावेश। स्त्रीसंग-निन्दा
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में उसी पूर्वपरिचित कमरे में फर्श पर बैठे हुए प्रह्लाद-चरित्र सुन रहे हैं। दिन के आठ बजे होंगे। रामलाल 'भक्तमाल' ग्रन्थ से प्रह्लाद-चरित्र पढ़ रहे हैं।
आज शनिवार, अगहन की कृष्णा प्रतिपदा है, १५ दिसम्बर १८८३ ई.। मणि दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण की पदच्छाया में ही रहते हैं। वे भी श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए प्रह्लाद-चरित्र सुन रहे हैं। कमरे में राखाल, लाटू, हरीश भी हैं, – कोई बैठे हुए सुन रहे हैं, कोई आना-जाना कर रहे हैं। हाजरा बरामदे में हैं।
श्रीरामकृष्ण प्रह्लाद-चरित्र की कथा सुनते सुनते भावावेश में आ रहे हैं। जब हिरण्यकशिपु का वध हुआ, तब नृसिंह की रुद्र मूर्ति देख और उनका सिंहनाद सुनकर ब्रह्मादि देवताओं ने प्रलय की आशंका से प्रह्लाद को ही उनके पास भेज दिया। प्रह्लाद बालक की तरह स्तव कर रहे हैं। भक्तवत्सल नृसिंह बड़े प्रेम से प्रह्लाद की देह पर जीभ फिरा रहे हैं। 'अहा! भक्त पर कैसा प्यार है!' कहते हुए श्रीरामकृष्ण भावसमाधि में लीन हो गए। देह निःस्पन्द हो गयी है, आँखों की कोरों में प्रेमाश्रु दिखायी पड़ रहे हैं। भाव का उपशम हो जाने पर श्रीरामकृष्ण उसी छोटे तख्त पर जा बैठे। मणि फर्श पर उनके चरणों के पास बैठे। श्रीरामकृष्ण उनसे बातचीत कर रहे हैं। ईश्वर के मार्ग पर रहकर जो लोग स्त्रीसंग करते हैं, उनके प्रति श्रीरामकृष्ण घृणा और क्रोध प्रकट कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – लाज भी नहीं आती – लड़के हो गए फिर भी स्त्रीसंग! घृणा भी नहीं होती, – पशुओं का-सा व्यवहार! लार, खून, मल, मूत्र – इन पर घृणा भी नहीं होती! जो ईश्वर के पादपद्मों की चिन्ता करता है, उसे परम सुन्दरी स्त्री भी चिताभस्म के समान जान पड़ती हैं। जो शरीर नहीं रहेगा, जिसके भीतर कृमि, क्लेद, श्लेष्मा – सब तरह की नापाक चीजें भरी हुई हैं, उसी को लेकर आनन्द! लज्जा भी नहीं आती!
मणि चुपचाप सिर झुकाए हुए हैं। श्रीरामकृष्ण फिर कहने लगे – “उनके प्रेम का एक बिन्दु भी यदि किसी को मिल गया तो कामिनी-कांचन अत्यन्त तुच्छ जान पड़ते हैं। जब मिश्री का शरबत मिल जाता है, तब गुड़ का शरबत नहीं सुहाता। व्याकुल होकर
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| ३७६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १५ दिसम्बर, १८८३ |
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उनसे प्रार्थना करने पर, उनके नामगुण का सदा कीर्तन करने पर, क्रमश: उन पर वैसा ही प्यार हो जाता है।”
यह कहकर श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त हो कमरे के भीतर नाचते हुए टहलने और गाने लगे –
(भावार्थ) – “सुरधुनी के तट पर कौन हरिनाम ले रहा है? शायद प्रेमदाता नित्यानन्द आए हैं। उनके बिना प्राण कैसे शीतल हों?”
करीब दस बजे होंगे। रामलाल ने कालीमन्दिर की नित्यपूजा समाप्त कर दी है। श्रीरामकृष्ण माता के दर्शन करने के लिए कालीमन्दिर जा रहे हैं। साथ मणि भी हैं। मन्दिर में प्रवेश कर श्रीरामकृष्ण आसन पर बैठ गए। माता के चरणों पर दो-एक फूल उन्होंने अर्पित किए। अपने मस्तक पर फूल रखकर ध्यान कर रहे हैं। अब गीत गाकर माता की स्तुति करने लगे –
“हे शंकरि, मैंने सुना है तुम्हारा नाम भवहरा भी है। इसीलिए माँ, मैंने तुम्हें अपना भार दे दिया है, – तुम तारो चाहे न तारो।” ...
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर से लौटकर अपने कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे में बैठे। दिन के दस बजे का समय होगा। अब भी देवताओं का भोग या भोग-आरती नहीं हुई। माता काली और श्रीराधाकान्त के प्रसादी फल-मूल आदि से कुछ लेकर श्रीरामकृष्ण ने थोड़ा जलपान किया। राखाल आदि भक्तों को भी थोड़ा थोड़ा प्रसाद मिल चुका है।
श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए राखाल स्माइल की ‘सेल्फ-हेल्प’? (Smile's Self-help) पढ़ रहे हैं – लार्ड अर्सिकन (Lord Erskine) के सम्बन्ध में।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – इसमें क्या लिखा है?
मास्टर – साहब फल की आकांक्षा न करके कर्तव्य-कर्म करते थे – यही लिखा है। निष्काम-कर्म।
श्रीरामकृष्ण – तब तो अच्छा है। परन्तु पूर्ण ज्ञान का लक्षण है कि एक भी पुस्तक साथ न रहेगी। जैसे शुकदेव – उनका सब कुछ जिह्वा पर।
“पुस्तकों और शास्त्रों में शक्कर के साथ बालू भी मिली हुई है। साधु शक्कर भर का हिस्सा ले लेता है, बालू छोड़ देता है। साधु सार पदार्थ लेता है।”
शुकदेवादि का नाम लेकर क्या ठाकुर अपनी अवस्था समझाना चाहते हैं?
वैष्णवचरण कीर्तनिया (कीर्तन गानेवाले) आये हुए हैं; उन्होंने ‘सुबोल-मिलन’ नाम का कीर्तन गाकर सुनाया।
कुछ देर बाद रामलाल ने थाली में श्रीरामकृष्ण के लिए प्रसाद ला दिया। प्रसाद पाकर श्रीरामकृष्ण थोड़ा विश्राम करने लगे।
रात में मणि नौबतखाने में सोये। श्रीमाताजी जब श्रीरामकृष्ण की सेवा के लिए आती थीं तब इसी नौबतखाने में रहती थीं। कुछ मास हुए वे कामारपुकुर गयी हैं।
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परिच्छेद ६३
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ईश्वरदर्शन के उपाय
(१)
श्रीरामकृष्ण मणि के साथ पश्चिमवाले गोल बरामदे में बैठे हैं। सामने दक्षिणवाहिनी भागीरथी है। पास ही कनेर, बेला, जूही, गुलाब, कृष्णचूड़ा आदि अनेक प्रकार के फूले हुए पेड़ हैं। दिन के दस बजे होंगे।
आज रविवार, अगहन की कृष्णा द्वितीया है – १६ दिसम्बर १८८३।
श्रीरामकृष्ण मणि को देख रहे हैं और गा रहे हैं –
(भावार्थ) – “माँ तारा, मुझे तारना होगा, मैं शरणागत हूँ। पिंजड़े के पक्षी जैसी मेरी दशा हो रही है। मैंने असंख्य अपराध किए हैं। मैं ज्ञानहीन हूँ। मैं माया में मोहित हुआ व्यर्थ भटकता फिर रहा हूँ। बछड़ा खो जाने पर गाय की जो दशा होती है, वही दशा मेरी भी है।”
सीता की तरह व्याकुलता
श्रीरामकृष्ण – क्यों? – पिंजड़े की चिड़िया की तरह क्यों होगे? छि:!”
कहते ही कहते भावावेश में आ गए। शरीर, मन, सब स्थिर है; आँखों से धारा बह चली है।
कुछ देर बाद कह रहे हैं, “माँ, सीता की तरह कर दो। बिलकुल सब भूल गयी हैं – देह का ख्याल नहीं; हाथ, पैर, स्तन, योनि – किसी का होश नहीं! एकमात्र चिन्ता – 'राम कहाँ!' ”
किस तरह व्याकुल होने पर ईश्वरलाभ होता है, मणि को इसकी शिक्षा देने के लिए ही मानो श्रीरामकृष्ण के मन में सीता का उद्दीपन हुआ था। सीता राममयजीविता थीं, – श्रीरामचन्द्र की चिन्ता में ही वे पागल हो रही थीं, – इतनी प्रिय वस्तु जो देह है उसे भी वे भूल गयी थीं!
दिन के तीसरे प्रहर के चार बजे का समय है। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ उसी कमरे में बैठे हुए हैं। जनाई के मुखर्जीबाबू आए हुए हैं, – ये श्री प्राणकृष्ण के आत्मीय हैं। उनके
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| ३७८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १६ दिसम्बर, १८८३ |
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साथ एक शास्त्रज्ञ ब्राह्म मित्र हैं। मणि, राखाल, लाटू, हरीश, योगीन्द्रादि भक्त भी हैं।
योगीन्द्र दक्षिणेश्वर के सावर्ण चौधरियों के यहाँ के हैं। ये आजकल प्रायः रोज दिन ढलने पर श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आते हैं और रात को चले जाते हैं। योगीन्द्र ने अभी विवाह नहीं किया।
मुखर्जी (प्रणाम करके) – आपके दर्शन से बड़ा आनन्द हुआ।
श्रीरामकृष्ण – वे सभी के भीतर हैं, वही सोना सब के भीतर है, कहीं प्रकाश अधिक है। संसार में उस सोने पर बहुत मिट्टी पड़ी रहती है।
मुखर्जी (सहास्य) – महाराज, ऐहिक और पारमार्थिक में अन्तर क्या है?
श्रीरामकृष्ण – साधना के समय 'नेति' 'नेति' करके त्याग करना पड़ता है। उन्हें पा लेने पर समझ में आता है, सब कुछ वही हुए हैं।
“जब श्रीरामचन्द्र को वैराग्य हुआ, तब दशरथ को बड़ी चिन्ता हुई। वे वशिष्ठजी की शरण में गए, जिससे राम संसार का त्याग न करें। वशिष्ठजी ने श्रीरामचन्द्र के पास जाकर देखा, वे विमनस्क हुए बैठे हैं – अन्तर तीव्र वैराग्य से भरा हुआ है। वशिष्ठजी ने कहा, 'राम, तुम संसार का त्याग क्यों करोगे? संसार क्या कोई उनसे अलग वस्तु है? मेरे साथ विचार करो।' राम ने देखा, संसार भी उसी परब्रह्म से हुआ है, इसलिए चुपचाप बैठे रहे।
“जैसे जिस चीज से मट्ठा होता है, उसी से मक्खन भी होता है। अतएव मट्ठे का ही मक्खन और मक्खन का ही मट्ठा कहना चाहिए। बड़ी कठिनाइयों से मक्खन उठा लेने पर (अर्थात् ब्रह्मज्ञान होने पर) देखोगे, मक्खन रहने से मट्ठा भी है; जहाँ मक्खन है वहीं मट्ठा है। ब्रह्म है, इस ज्ञान के रहने से जीव, जगत्, चतुर्विंशति तत्त्व भी हैं।
“ब्रह्म क्या वस्तु है, यह कोई मुँह से नहीं कह सकता। सब वस्तुएँ जूठी हो गयी हैं, (अर्थात् मुँह से कही जा चुकी हैं) परन्तु ब्रह्म क्या है, यह कोई मुँह से नहीं कह सका, इसीलिए वह जूठा नहीं हुआ। यह बात मैंने विद्यासागर से कही थी। विद्यासागर सुनकर बड़े प्रसन्न हुए।
“विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते भी यह ब्रह्मज्ञान नहीं होता। कामिनी-कांचन का भाव जब मन में बिलकुल न रहेगा, तब होगा। पार्वतीजी ने पर्वतराज से कहा, 'पिताजी, अगर आप ब्रह्मज्ञान चाहते हैं तो साधुओं का संग कीजिए।'”
क्या श्रीरामकृष्ण के कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य चाहे संसारी हो या संन्यासी, कामिनी-कांचन में मग्न रहने पर उसे ब्रह्मज्ञान नहीं होता?
श्रीरामकृष्ण फिर मुखर्जी से कह रहे हैं –
“तुम्हारे धन-सम्पत्ति है फिर भी तुम ईश्वर को भी पुकारते हो, यह बहुत अच्छा है। गीता में है – जो लोग योगभ्रष्ट हो जाते हैं वही भक्त होकर धनी के घर जन्म लेते हैं।”
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१६ दिसम्बर, १८८३ परिच्छेद ६३ ३७९
मुखर्जी (अपने मित्र से सहास्य) – “शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।”
श्रीरामकृष्ण – वे चाहे तो ज्ञानी को संसार में भी रख सकते हैं। उन्हीं की इच्छा से यह जीव-प्रपंच हुआ है। वे इच्छामय हैं।
मुखर्जी (सहास्य) – उनकी फिर कैसी इच्छा? क्या उन्हें भी कोई अभाव है?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – इसमें दोष ही क्या है? पानी स्थिर रहे तो भी वह पानी है और जीव-जगत क्या मिथ्या है? तरंगें उठने पर भी वह पानी ही है।
“साँप चुपचाप कुण्डली बाँधकर बैठा रहे, तो भी वह साँप है और तिर्यग्-गति हो, टेढ़ा-मेढ़ा रेंगने से भी वह साँप ही है।
“बाबू जब चुपचाप बैठे रहते हैं, तब वे जो मनुष्य हैं, वही मनुष्य वे उस समय भी हैं जब वे काम करते हैं।
“जीव-प्रपंच को अलग कैसे कर सकते हो? इस तरह वजन तो घट जाएगा! बेल के बीज और खोपड़ा निकाल देने से पूरे बेल का वजन ठीक नहीं उतरता।
“ब्रह्म निर्लिप्त है। सुगन्ध और दुर्गन्ध वायु से मिलती है, परन्तु वायु निर्लिप्त है। ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं। उसी आद्याशक्ति से जीव-प्रपंच बना है।”
मुखर्जी – योगभ्रष्ट क्यों होते हैं?
श्रीरामकृष्ण – कहते हैं न ‘जब मैं गर्भ में था तब योग में था, पृथ्वी पर गिरते ही मिट्टी खायी। धाई ने तो मेरा नार काटा; पर यह माया की बेड़ी कैसे काटूँ?’
“कामिनी-कांचन ही माया है। मन से इन दोनों के जाते ही योग होता है। आत्मा – परमात्मा – चुम्बक पत्थर है, जीवात्मा एक सूई है – उनके खींच लेने ही से योग हो गया। परन्तु सूई में अगर मिट्टी लगी हुई हो, तो चुम्बक नहीं खींचता – मिट्टी साफ कर देने से फिर खींचता है। कामिनी-कांचन मिट्टी है, इसे साफ करना चाहिए।”
मुखर्जी – यह किस तरह साफ हो?
श्रीरामकृष्ण – उनके लिए व्याकुल होकर रोओ। वही जल मिट्टी पर गिरने से मिट्टी धुल जाएगी। जब खूब साफ हो जाएगी तब चुम्बक खींच लेगा। योग तभी होगा।
मुखर्जी – अहा! कैसी बात है!
श्रीरामकृष्ण – उनके लिए रो सकने पर उनके दर्शन होते हैं – समाधि होती है। योग में सिद्ध होने से ही समाधि होती है। रोने से कुम्भक आप ही आप होता है। – उसके बाद समाधि।
“एक उपाय और है – ध्यान। सहस्त्रार कमल (मस्तक) में विशेष रूप से शिव का अधिष्ठान है – उसका ध्यान। शरीर आधार है और मन-बुद्धि जल। इस पानी पर उस सच्चिदानन्द सूर्य का बिम्ब गिरता है! उसी बिम्बसूर्य का ध्यान करते करते उनकी कृपा से यथार्थ सूर्य के भी दर्शन होते हैं।