सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ / सुदामा-चरित वरन् अपने पति को घोर आर्थिक संकटों से छुटकारा दिलाने के लिए द्वारिका- पति श्रीकृष्ण के पास भेजना चाहती है। वह पति-अनुरागिनी है, उसका पारि- वारिक जीवन-स्तर ऊँचा उठाना चाहती है। सुगृहिणी-धर्म का पालन करने के लिए ही वह घर की यथार्थ स्थिति से पति को अवगत कराती है— "कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती, सीत वितीत भयौ सिसियातहि, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती।" सुबुद्धि व्यवहार कुशल नारी है, वह मिथ्या आदर्शों पर न तो स्वयं बलि होना चाहती है और न अपने पति सुदामा को बलि होते देखना चाहती है। उसमें जीवन जीने की साध है, यह यथार्थ को अपनी आँखों से ओझल नहीं करना चाहती। यही कारण है कि वह धन-वैभव को भी जीवन के लिए आवश्यक मानती है। उसमें अपार तर्क-शक्ति है, वह जिसे ठीक समझती है, उसे पूरा करा लेना चाहती है। उसे जैसे ही पता चलता है कि द्वारिकापति श्रीकृष्ण उसके पति सुदामा के सहपाठी एवं मित्र हैं, वह अनेक प्रकार के तर्कों से समझा-बुझा कर उसे द्वारिका भेजने का निश्चय कर लेती है। वह अपनी सिद्धि के लिए एक के बाद एक तर्क-बाण छोड़ती है, पति के आक्रोश से भी वह हतोत्साहित नहीं होती है। वह पति की निर्धनता को दूर कराने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहती है। वह एक ओर श्रीकृष्ण की भक्त-वत्सलता का बखान करती है और दूसरी ओर पति की कृष्ण-मैत्री को चुनौती देती है— "जो पै सारो जन्म दरिद्र ही सतायो, तो पै कौन काज आई कृपानिधि की मित्रई।" सुबुद्धि की व्यवहार-कुशलता उस समय अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो जाती है जब सुदामा द्वारिकापुरी जाने को तत्पर हो जाते हैं किन्तु मित्र को भेंट स्वरूप क्या दें ? यह एक नई समस्या खड़ी कर देते हैं। सुबुद्धि इस सुअवसर को हाथ से निकलने नहीं देती, वह तुरन्त पड़ौसिन के घर जाकर पाव सेर चावल ले आती है। उन्हें पोटरी में बाँधकर पति को सौंप देती है, जिससे वह कोई अन्य बहाना न खोज सके। सुदामा-पत्नी की यह व्यवहार कुशलता मानव के सहज स्वभाव से सम्बद्ध है, चतुर मनुष्य अपने सम्बन्धों से लाभान्वित होना भली-