सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
पृष्ठ 16, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / २१ के समय श्रीकृष्ण से कुछ न पाकर वह सन्तोषी ब्राह्मण अपने घनिष्ठ मित्र को शाप तक देने को तत्पर हो जाता है। वापस घर लौटते हुए वह कभी अपनी पत्नी पर झुँझलाता है तो कभी श्रीकृष्ण पर। वह अपने मन ही मन में सोचता है कि आखिर द्वारिकापति हैं तो वही न जो अपने बाल्यकाल में दही माँग-माँग कर खाते थे। ऊँचा पद पा लेने से दिल बड़ा नहीं हो जाता। सुदामा के चरित्र का यह परिवर्तन और तीखी प्रतिक्रिया उसके मानवीय रूप को उभारती है। सुबुद्धि—'सुदामा चरित' का दूसरा महत्त्वपूर्ण पात्र सुदामा की पत्नी सुबुद्धि है, जिसे श्रीमद्भागवत में सुशीला नाम से अभिहित किया गया है। वह इस खण्ड-काव्य की नायिका है और उसी की सद्प्रेरणा से ही नायक सुदामा को फल- प्राप्ति होती है। वह एक पतिव्रता नारी है, उसमें व्यवहार कुशलता, मानव- स्वभाव को समझने की अद्भुत क्षमता, धन-वैभव के प्रति नारी सुलभ आसक्ति, अचूक तर्क-शक्ति तथा जीवन के यथार्थ को समझने की तीव्र प्रतिभा विद्यमान है। कविवर नरोत्तमदास ने उसका चरित्र-चित्रण वास्तविकता के धरातल पर, नारी मनोविज्ञान को दृष्टि में रखकर अत्यन्त निपुणता के साथ किया है। वे भक्ति-भाव को समुचित महत्त्व देते हुए, मानवीय मनोभावों को व्यंजित करने में पर्याप्त सफल रहे हैं। उनकी चरित्र-चित्रण कला का सौष्ठव सराहनीय है। कविवर नरोत्तमदास सुदामा की पत्नी के नाम-परिवर्तन में अपना चारि- त्रिक वैशिष्ट्य प्रदर्शित करते हैं। 'श्रीमद्भागवत' के सुशीला नाम से 'सुदामा- चरित' का सुबुद्धि नाम कहीं अधिक सार्थक तथा उपयुक्त है। सुदामा की पत्नी के चरित्र की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशिष्टता उसका बुद्धि-चातुर्य है। वह अपने पति सुदामा को घोर निर्धनता से मुक्ति दिलाने के लिए अपने बुद्धि-वैभव का पूरा-पूरा सदुपयोग करती है। भाग्यवादी सुदामा, उसके सबल तर्कों से परास्त होता है और अन्त में उसके प्रति आभार प्रकट करते हुए कहता है— “जो पै पतिब्रता तू न देती उपदेश मोहिं, एती कृपा द्वारिकेश मो पै कब करते।” सुबुद्धि पतिव्रता नारी है, उसका यह पातिव्रत्य घोर निर्धनता एवं अपार सम्पन्नता दोनों में समान रूप से बना रहता है। वह निजी सुख के निमित्त नहीं