सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० / सुदामा-चरित स्वाभिमानी व्यक्तित्व अनेक स्थलों पर व्यंजित हुआ है। उसकी पत्नी जब बार- बार उसे द्वारिकापुरी जाने के लिए कहती है तो उसका स्वाभिमानी ब्राह्मणत्व उसे यह कहने के लिए बाध्य करता है— “सिच्छक हौं सिगरे जग को तिय ! ताको कहा अब देति है सिच्छा ।” उसके विचार से दुःख सह लेना कहीं अच्छा है, किन्तु धन-लालसा को लेकर मित्र के द्वार पर कभी नहीं जाना चाहिए। मित्रता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि उसके यहाँ जाकर यदि कुछ खाओ तो उसे भी अपने घर बुला- कर खिलाओ— “मित्र के मिले में वित्त चाहिए परस्पर, मित्र के जो जेंइए तो आप हू जेंवाइए ।” सुदामा में भक्ति-भावना का चरमोत्कर्ष भी विद्यमान है। वह सांसारिक धन-वैभव के प्रति उदासीन है और प्रभु-भक्ति ही उसे अभीष्ट है। वह अपनी प्रभु- भक्ति को भी अपनी निधि मानता है— “मेरे हिय हरि के पद पंकज बार हजार लै देखु परिच्छा ।” सुदामा को उसके उच्च आदर्श करुणा की साक्षात् प्रतिमा बना देते हैं। वह यथार्थ के आगे झुकने के लिए विवश हो जाता है। उसकी करुणाजनक स्थिति का उद्घाटन करते हुए द्वारपाल कहता है— “सीस पगा न झगा तन में प्रभु, जानें को आहि, बसे केहि ग्रामा, धोती फटी सी लटी दुपटी अरु पायं उपानहु को नही सामां ।” सुदामा का चरित्र मानवीय दुर्बलताओं से युक्त एक साधारण मानव के रूप में भी अपना वैशिष्ट्य लिए हुए है। वर्षों निर्धनता के कोड़े सहते-सहते उसके अन्दर धन-लालसा दब-सी जाती है, किन्तु सुबुद्धि के बार-बार समझाने, उकसाने तथा प्रेरित करने पर वह कुंठित लालसा पुनः तीव्र हो जाती है। धन-वैभव से उदासीन रहने वाला सुदामा द्वारिकापुरी के वैभव को देखकर चकित होता है और मन ही मन में धन-सम्पदा पाने की प्रबल आकांक्षा रखने लगता है। विदाई