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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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सुदामा-चरित / १६ रहे हैं। उन्होंने अपने पात्रों का चरित्र-चित्रण करने के लिए नाटकीय-पद्धति को विशेष प्रश्रय दिया है। पात्रों के व्यक्तित्व को उभारने के लिए उनके संवादों, कार्य-कलापों, तर्क-वितर्कों आदि का पूरा-पूरा सदुपयोग करते हैं। उनकी चरित्र-चित्रण कला यथार्थ और आदर्श दोनों को समान महत्त्व देती है, उसमें जहाँ आदर्श को प्रतिष्ठित करने की ललक है वहाँ यथार्थ को भी समुचित महत्त्व देने की तत्परता उपलब्ध होती है। वे पात्रों का चरित्र-चित्रण करने में अपनी मौलिक काव्य-प्रतिभा का परिचय देते हैं। सुदामा—'सुदामा-चरित' का केन्द्रीय पात्र सुदामा, इस खण्ड-काव्य का नायक है। नरोत्तमदास ने उसी की निर्धनता, मनःस्थिति तथा फल-प्राप्ति का विस्तारपूर्वक निरूपण किया है। वह एक ओर आदर्श ब्राह्मण है, भाग्य में उसका अटूट विश्वास है, वह सांसारिक सुखों के प्रति उदासीन है और स्वाभिमान उसमें कूट-कूट कर भरा हुआ है। दूसरी ओर वह एक साधारण मानव है, उसमें धन-लालसा विद्यमान है और वह भी मानवीय दुर्बलताओं से ग्रस्त है। कवि उसके व्यक्तित्व के इन दोनों पहलुओं का बहुत ही स्वाभाविक तथा मनोवैज्ञानिक चित्रण करता है। सुदामा अपने प्रथम रूप में अत्यन्त निर्धन, सन्तोषी, तेजस्वी तथा हरि-भक्त है। वह भिक्षावृत्ति से अपना निर्वाह करता है। वर्षों निर्धनता में रहते-रहते वह उसी को अपना जीवन मान लेता है। उसके विचारानुसार ब्राह्मण का धन तो मात्र भिक्षा है। वह अपने ये विचार पत्नी के सम्मुख रखता है— “औरनि को धन चाहिए बावरि, ब्राह्मण को धन केवल भिक्षा।” भाग्यवादी सुदामा अपनी दीन-हीन दशा के लिए किसी को भी दोषी नहीं मानता है। उसकी धारणा है कि मनुष्य को सुख-दुःख, धन-वैभव आदि की प्राप्ति भाग्य से ही होती है। भाग्य का लेखा न कोई मिटा सका है और न कोई मिटा सकेगा। वह अपनी पत्नी को यह तथ्य समझाता हुआ कहता है— “पैहें कहाँ ते अटारी अटा जिनके विधि दीन्ही है टूटी-सी छानी। जो पै दरिद्र लिख्यौ है ललाट तौ काहू पै मेटि न जात अजानी॥” सुदामा एक अत्यन्त स्वाभिमानी ब्राह्मण है। 'सुदामा-चरित' में उसका यह