सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
पृष्ठ 25, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें३० / सुदामा-चरित व्यंग्यात्मक प्रयोग देखे जा सकते हैं। अनुकरणात्मक शब्दों में 'जगर-मगर' 'सिसि- यात', 'मिठौती' आदि का प्रयोग अत्यन्त सार्थक है। लाक्षणिक प्रयोगों में कवि- कौशल चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो गया है, उससे भावों की मार्मिकता को बल मिला है। वे अत्यन्त प्रभावशाली बन गए हैं— “पानी परात को हाथ छुयौ नहीं, नैनन के जल सों पग धोये ।” कवि हास्य-व्यंग्य संचार करने के लिए व्यंग्योक्तियों का प्रयोग करने में भी सिद्धहस्त है। सुदामा अपने फटे-पुराने कपड़े में बँधे चावल, श्रीकृष्ण को भेंट करने में अति संकोच अनुभव करता है, जिसे वे भाँप लेते हैं और मीठी चुटकियों एवं व्यंग्योक्तियों के प्रयोग का सुअवसर समझकर कह उठते हैं— “आगे चना गुरु मातु दए ते तुम खाए हमें नहीं दीने। स्याम कही मुस्काय सुदामा सों चोरी की बानि में हू जे प्रवीने॥” श्रीकृष्ण सुदामा का अत्यधिक आदर-सत्कार करते हैं, किन्तु जाते समय उसे प्रत्यक्ष रूप में कुछ नहीं देते हैं। इसकी सुदामा पर तीव्र प्रतिक्रिया हुई, उसी को वह व्यंग्यात्मक रूप में व्यंजित करता हुआ कहता है – “हौं आवत नाहीं हुतौ, वाहि पठयो ठेलि। कहिहौं धन सौं जाइके, अब धन धरौ सकेलि॥” ‘सुदामा-चरित’ की भाषा में संगीतात्मकता, चित्रात्मकता, प्रवाहमयता आदि का वैशिष्ट्य भी यत्र-तत्र देखा जा सकता है। इस दिशा में उसका शब्द- चयन सर्वाधिक सहायक रहा है। कवि मधुर-प्रांजल शब्दों; बिम्ब प्रस्तुत करने में समर्थ शब्दावली का प्रयोग करने में बड़ी निपुणता दिखाता है। उससे भाषा वेगमयी, बिम्बात्मक तथा हृदयस्पर्शी बन गई है। वर्णन-कौशल—‘सुदामा-चरित’ का रचयिता वस्तु एवं भाव दोनों के वर्णन में असाधारण सफलता प्राप्त करता है। उसका वर्णन कौशल सुदामा के दारिद्रय चित्रण, श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री के प्रतिष्ठापन और सुदामा के अन्तर्द्वन्द्व को व्यंजित करने में जिस निपुणता का परिचय देता है, वह निःसन्देह सराहनीय है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का यह कथन ‘सुदामा-चरित’ पर पूर्णतः चारितार्थ होता है—‘‘कवि की भावुकता कथा प्रसंगों के मार्मिक स्थलों की पहचान में