भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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सुदामा-चरित / २६ विषयानुसार प्रश्रय दिया है किन्तु प्रसादगुण अपनी स्वच्छता एवं द्रवणशीलता में सभी से आगे बढ़ गया है और वह अन्य गुणों को आत्मसात् करता प्रतीत होता है। वे शब्दों का चयन करते समय देशकाल को दृष्टि में रखते हैं। सुदामा के दारिद्रय का वर्णन करने के लिए वे ग्रामीण शब्दावली – 'जुरतो', 'हठौती', 'टूटो तयौ', 'फूटी कठौती' आदि का और द्वारिकापुरी के अपार वैभव का वर्णन करने के लिए सुसंस्कृत भाषा की शब्दावली—'वसुधा', 'अभिराम', 'सुषमा', 'सन्ताप', 'कनक', 'सुरभी', 'घृत', 'दुति' आदि का प्रयोग करते हैं। अपनी भाषा को सहज तथा बोधगम्य बनाने के लिए वे लोक-प्रचलित विदेशी शब्दों का प्रयोग भी करते हैं। 'अफ़सोस, 'गरीबनवाज' 'सामा', 'लायक' आदि शब्दों का प्रयोग इसी तथ्य की पुष्टि करता है। इसी प्रकार भाषा के सौष्ठव को बढ़ाने वाले अवधी के प्रयोग—'कठौती', 'पंडाइन', 'कोदी सवाँ' आदि भी कम महत्त्व- पूर्ण नहीं हैं। आंचलिक प्रयोगों में 'छूछी छाम' 'पेलि पठौती', लदाय लड़ा' आदि का प्रयोग अत्यन्त प्रभावोत्पादक बन गया है। 'सुदामा-चरित' में प्रयुक्त मुहावरों एवं लोकोक्तियों ने उसकी भाषा की व्यंजना-शक्ति को बढ़ाने में अत्यधिक सहयोग दिया है। इससे वह जन- भाषा के अति निकट पहुँच गई है और संवेद्य अपेक्षाकृत अधिक मार्मिक बन गया है। कवि ने लोक प्रसिद्ध लोकोक्तियों, सूक्तियों तथा मुहावरों का बड़ी निपुणता के साथ प्रयोग किया है। यथा—'जेंइए जो मित्र के तो आपहु जेंवाइए', 'विपति परे पै द्वार मित्र के न जाइए' आदि लोकोक्तियों या सूक्तियों और 'सुख दुख करि दिन काटे ही बनेंगे', 'भेंटे लपटाय हिय' आदि मुहावरों का जैसा सफल एवं सार्थक प्रयोग 'सुदामा-चरित' में मिलता है, वैसा अन्यत्र सरलता से नहीं मिल सकता है। इस कला में कवि की दक्षता सराहनीय है। वह लोकोक्तियों आदि के प्रयोग से अपनी भाषा को टकसाली बनाने में पर्याप्त सफल रहा है। उससे काव्य-सौष्ठव में निखार आया है और भावों की प्रभाव-शक्ति बढ़ी है— “कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती। या घर ते कबहूं न गयौ पिय टूटौ तयौ अरु फूटी कठौती॥” 'सुदामा-चरित' में परिस्थितियों के अनुरूप अनुकरणात्मक, लाक्षणिक तथा