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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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२८ / सुदामा-चरित 'सुदामा-चरित' में करुण, शांत, अद्भुत, भक्ति आदि अनेक रसों का परिपाक हुआ है, किन्तु सारे खण्डकाव्य पर मित्र-वत्सलता छाई हुई है, जिसे शास्त्रीय दृष्टि से किसी रस का नाम नहीं दिया जा सकता। ऐसी स्थिति में एक रस की प्रधानता के स्थान पर एक केन्द्रीय भाव के प्राधान्य का रसास्वादन किया जा सकता है। सारांशतः 'सुदामा-चरित' में खण्डकाव्य की प्रायः सभी विशेषताएँ मिलती हैं और इसे हिन्दी-साहित्य का एक सफल खण्डकाव्य कहा जा सकता है। सुदामा-चरित का कला-सौष्ठव भाव-पक्ष यदि काव्य की आत्मा है तो कलापक्ष उसका शरीर है। काव्य- पुरुष की आत्मा को सुरक्षित रखने वाले शरीर अर्थात् कलापक्ष के महत्त्व को प्रायः सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है। कलापक्ष से सम्बद्ध उपकरणों में मुख्य हैं---भाषा, वर्णन कुशलता, छन्द-योजना तथा अलंकार-योजना। 'सुदामा-चरित' में व्यंजित भावों की उदात्तता के साथ-साथ कलापक्ष का सौष्ठव भी द्रष्टव्य है— भाषा—भाषा मुख्यतः ब्रज है, उसमें अवधी, उर्दू, आंचलिक आदि शब्दों का प्रयोग भी यथास्थान हुआ है। इस रचना की ('सुदामा-चरित' की) लोकप्रियता के मूल में उसकी भाषा का वैशिष्ट्य एक प्रधान कारण है। वह सर्वत्र स्वाभा- विक, प्रसादगुण-सम्पन्न, देशकालानुरूप, मधुर-प्रांजल, लोकोक्तियों एवं मुहावरों से युक्त, संघात्मक तथा टकसालीपन के सौन्दर्य को लिए हुए है। उसमें लाक्ष- णिकता, अनुकरणात्मकता, चित्रात्मकता, प्रवाहमयता, व्यंग्यात्मकता आदि गुण भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। वह संवेद्य को अधिकाधिक मर्मस्पर्शी बनाने में अपनी सार्थकता समझती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में—"नरोत्तमदास की भाषा बहुत ही परिमार्जित और व्यवस्थित है। बहुतेरे कवियों के समान भरती के शब्द और वाक्य इसमें नहीं हैं।" 'सुदामा-चरित' की भाषा सरल, स्वाभाविक तथा प्रसादगुण-सम्पन्न है। कविवर नरोत्तमदास ने बोलचाल की भाषा को ही साहित्यिक भाषा का सौष्ठव प्रदान कर दिया है। उन्होंने वैसे तो ओज, माधुर्य एवं प्रसाद तीनों गुणों को