सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / २७ “श्रीगणेश सुमिरन करों, उपजे बुद्धि प्रकाश । सो चरित वरनन करों, जासे दारिद नास ॥” सुदामा के दारिद्रय का नाश हो, यही केन्द्रीय भाव है, जिसे सम्पूर्ण कथा- वृत्त में चित्रित किया गया है । सुदामा की निर्धनता को दूर कराने में उसकी पत्नी सुबुद्धि के योगदान भी अत्यन्त महत्त्व था, जिसकी प्रेरणा से वे द्वारिकापुरी गए । फलतः कवि सुबुद्धि के सबल तर्कों तथा बुद्धि-चातुर्य को समुचित महत्त्व देता हुआ, अन्त में श्रीकृष्ण की भव्य तथा स्तुत्य आदर्श-मैत्री को वाणी देता है । इस प्रकार उसने अपने संक्षिप्त, सुगठित तथा प्रवाहमयी कथा के माध्यम से एक निश्चित उद्देश्य को मुखरित किया है । उसने जीवन के जिस अंग को लिया है, उसकी सर्वांगीण व्याख्या की है । उसके वर्णन सजीव तथा मार्मिक हैं । मर्मस्पर्शी स्थलों पर उसकी भावप्रवणता चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो गई है । सुदामा के दारिद्रय का एक कारुणिक चित्र द्रष्टव्य है— “कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट न चाहति हों दधि दूध मिठौती । × × × या घरतें कबहुँ न गयो पिय, फटो तयौ और टूटी कठौती ॥” सुदामा की दयनीय दशा और श्रीकृष्ण की पावन मैत्री को एक ही छन्द में जिस भावमयता एवं आत्मानुभूति का घना स्पर्श देखकर कवि ने व्यक्त किया है, वह चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो हो गई है— “ऐसे बेहाल बिवाइन सों पग कंटक जाल लगे पुनि जोए । ‘हाय महादुख पायौ सखा ! तुम आए इतै न कितै दिन खोए ॥’ देखि सुदामा की दीन दशा, करुणा करके करुणानिधि रोए । पानी परात को हाथ छुयौ नहीं, नैनन के जल सों पग धोए ॥” कविवर नरोत्तमदास ने कथावस्तु को सर्गों में विभाजित नहीं किया है, उसके मूल में भी कथानक में एकात्मक अन्विति को बनाए रखना है । वे अपने संवेद्य को ही अपना सर्वस्व मानकर, उसी की अभिव्यंजना में अपनी सारी शक्ति व्यय करते हैं । उनकी प्रबन्ध-कल्पना, वस्तु एवं भाव-वर्णन मुख्यतः सुदामा की निर्धनता और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री से सम्बद्ध हैं ।