सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ३१ निहित है। वहा भावुक कहा जा सकता है जो मार्मिक स्थलों को शब्द चित्रों द्वारा अंकित कर सजीव दृश्य उपस्थित कर दे, जिसे पढ़कर पाठक आत्म-विभोर हो जायँ और उसी भाव में डूबने-उतरने लगें।" कविवर नरोत्तमदास ने मार्मिक स्थलों की पहचान और उन्हें शब्द-चित्रों द्वारा सजीव दृश्यों में उपस्थित करने में अपनी गहन अनुभूति तथा भाव प्रवणता को व्यक्त किया है। उसी से इन मार्मिक स्थलों को पढ़ते समय पाठक आत्म-विभोर हो जाते हैं और उन्हीं भावों में डूबने-उतरने लगते हैं। सुदामा की निर्धनता का वे इतना कारुणिक हृदय- विदारक तथा यथार्थ दृश्य प्रस्तुत करते हैं कि पाठकों का हृदय द्रवित हो उठता है - "कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती। सीत वितीत भयौ सिसियातहि, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती॥ जो जनती न हितू हरि-सौँ, तो काहे को द्वारिका पेलि पठौती। या घर ते कबहूँ न गयौ पिय, टूट्यो तयो अरु फूटी कठौती॥" 'सुदामा-चरित' का दूसरा प्रमुख मार्मिक स्थल श्रीकृष्ण और सुदामा का मार्मिक मिलन है। सुदामा की दयनीय दशा पाठकों के हृदय को जहाँ अत्यधिक द्रवित करती है वहाँ श्रीकृष्ण की उदात्त मैत्री-भावना का दृश्य पाठकों को अलौ- किक आनन्द से आत्मविभोर कर देता है— "ऐसे बेहाल विवाइन सों पग कंटक जाल लगे पुनि जोये। हाय महा दुख पायौ सखा, तुम आये इतै न कितै दिन खोये॥ देखि सुदामा की दीन दसा करुणा करिकै करुणानिधि रोये। पानी परात को हाथ छुऔ नहिं नैनन के जल सों पग धोये॥" कविवर नरोत्तमदास जिस तीसरे मार्मिक स्थल का चयन करते हैं, वह है सुदामा की उस मनः स्थिति का वर्णन जिसमें वह कभी अपनी पत्नी पर और कभी अपने मित्र श्रीकृष्ण की कृपणता पर झुँझलाते हैं— "घर-घर ओढ़त फिरे तनक दही के काज, कहा भयौ जो अब भयौ, हरि को राज समाज।