सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ / सुदामा-चरित अनुसार कवि ने अनुप्रास, यमक, स्वभावोक्ति, परिकरांकुर, उदात्त, सार, सन्देह, रूपक आदि अलंकारों का सहज प्रयोग किया है। लय और गेयता को दृष्टि में रखकर उसने अनुप्रास जैसे अलंकारों को विशेष महत्त्व दिया है। कथा-प्रसंगों तथा परिस्थितियों की प्रभावोत्पादक व्यंजना में परिकुरांकुर अलं- कार का मुख्य रूप से सहयोग लिया गया है। इस रचना में दस से भी अधिक बार यह अलंकार प्रयुक्त हुआ है। इसी प्रकार यमक, उदात्त, सन्देह आदि अलंकारों का सहज प्रयोग भी भावों की अभिव्यंजना में अत्यधिक सहायक रहा है। ये अलंकार कविता-कामिनी के लिए श्रृंगार ही बने हैं, भार नहीं। इनके प्रयोग से काव्य में कहीं भी जटिलता या नीरसता का संचार नहीं हुआ है। सच तो यह है कि 'सुदामा-चरित' स्फूर्त काव्य, है इसमें कहीं भी प्रयत्न पूर्वक अलं- कारों को भरने या लादने का यत्न नहीं किया गया है। कवि ने केवल उन अलंकारों ही का स्वागत किया है जो उसके रचना प्रवाह में आप-से-आप आकर घुल-मिल गए हैं। कतिपय प्रमुख अलंकारों का सौष्ठव द्रष्टव्य है— १. यमक—"हौं आवत नाहीं हुतौ, वाही पठयो ठेलि । कहिहौं धन सौं जाइकै, अब धन धरो सकेलि ॥" २. परिकर—"दीनदयाल को ऐसेई द्वार है दीनन की सुधि लेत सदाई ।" ३. सन्देह—"कहँ वह टूटी सी छानी हुती, कहँ कंचन के सब धाम सुहावत ।" ४. रूपक—"लोचन कमल दुख मोचन कमल भाल ।" ५. स्वभावोक्ति—"टूटी-सी मड़ैया मेरी परी हुती याही ठौर तामें परी दुःख काटैं, कहाँ हेम-धाम री ।" ६. उपमा—"देवता से बैठे सब साधि-साधि मौन हैं ।" सुदामा-चरित में रस-व्यंजना काव्य-शास्त्र की दृष्टि से हम 'सुदामा-चरित' में करुण, शांत, अद्भुत, भक्ति आदि विविध रसों की व्यंजना खोज सकते हैं और इनमें भक्ति रस को इसका