सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० / सुदामा-चरित कविवर नरोत्तमदास के जीवन-वृत्तान्त से सम्बद्ध बहुत कम जानकारी मिलती है । इस दृष्टि से वे हिन्दी के एक अविज्ञापित कवि हैं। उन्होंने आत्म- विज्ञापन की भावना को निरर्थक समझते हुए अपनी रचनाओं में अपना जीवन चरित्र देना आवश्यक समझा है। वे उन भारतीय साहित्यकारों की श्रेणी में आते हैं, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को अपनी कृतियों में घुला-मिला देने में अधिक गौरव अनुभव किया; जो भौतिक प्रतिष्ठा के आकांक्षी न थे। फलतः जनश्रुतियों या बाह्य साक्ष्य के आधार पर ही हमें उनका अधूरा जीवन-वृत्तान्त मिलता है । शिवसिंह सेंगर अपनी रचना 'शिवसिंह सरोज' में नरोत्तमदास के विषय में केवल इतना ही लिखते हैं कि वे सं० १६०२ तक जीवित थे । वे कान्य-कुब्ज ब्राह्मण थे । जार्ज ग्रियर्सन उनका जन्मकाल सं० १६१० मानते हैं । मिश्रबन्धुओं ने उनकी अमर रचना 'सुदामा-चरित' का रचनाकाल सं० १५८२ माना है, जो असंगत प्रतीत होता है। शिवसिंह सेंगर और जार्ज ग्रियर्सन के मत अपेक्षा- कृत अधिक समीचीन कहे जा सकते हैं और उनके आधार पर 'सुदामा-चरित' का रचनाकाल सं० १५८२ के स्थान पर सन् १५८२ (सं० १६३६) मान सकते हैं। उससे उनकी यह रचना उनके जीवन के मध्याह्न में निर्मित हो सकती है । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अपनी रचना 'हिन्दी-साहित्य' के अन्तर्गत 'सुदामा- चरित' के लोकप्रिय कवि नरोत्तमदास का जन्म सन् १५४५ मानते हैं । एक किंवदन्ती के अनुसार उनका जन्म सीतापुर जिले के बाड़ी नामक स्थान पर हुआ था । इस दिशा में अनुसंधान अपेक्षित है, उनके जन्म, जीवन-घटनाओं, शिक्षा-दीक्षा, आजीविका, रचनाकाल तथा देहावसान के सम्बन्ध में अभी अन्तिम रूप से कुछ कहना कठिन है। इस समय हम उनके व्यक्तित्व की जो जानकारी उनकी अमर निधि 'सुदामा-चरित' से प्राप्त कर सकते हैं वही हमारे आत्म- सन्तोष का मुख्य आधार है । सत्य तो यह है किसी भी व्यक्ति की अमर कीर्ति उसकी काव्य-रचना में व्यंजित भाव-सम्पत्ति में निहित होती है न कि आत्म- विज्ञापन में । इस कसौटी पर कविवर नरोत्तमदास की अमरता में सन्देह नहीं किया जा सकता है। 'सुदामा-चरित' की भाव-व्यंजना और कला-सौष्ठव की प्रशंसा अनेक