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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 108 में से

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सुदामा-चरित / ११ विद्वानों ने की है। अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध इस अनमोल रचना के सम्बन्ध में कहते हैं कि यह एक अत्यन्त सरस रचना है और इसका रचियता एक सहृदय कवि है। डॉ० रामकुमार वर्मा के शब्दों में—"कथा संगठन, नाट- कीय विधान, भाव, भाषा, छन्द आदि सभी दृष्टियों से नरोत्तमदास कृत 'सुदामा- चरित' श्रेष्ठ रचना है।" आचार्य चतुरसेन शास्त्री भी नरोत्तमदास में उच्च- कोटि का कवित्व देखते हैं। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के अनुसार—"हिन्दी में कुछ कवियों ने बहुत कुछ थोड़े छन्दों के आधार पर जितनी अधिक ख्याति प्राप्त की है उनकी मण्डली में नरोत्तमदास का भी एक नाम है।" इस प्रकार 'सुदामा-चरित' कविवर नरोत्तमदास की अमर कीर्ति का मुख्य आधार और हिन्दी-जगत की अनमोल सम्पत्ति हैं। इसमें कवि का व्यक्तित्व एकाकार हो गया है, इसके हृदयग्राही चित्र, मानवीय मनोभावों की मर्मस्पर्शी व्यंजना, मित्र- वत्सलता का आदर्श, नाटकीय शैली का सौष्ठव यथार्थ का घना स्पर्श और अनुभूति की अद्भुत व्यंजना पाठकों एवं आलोचकों को अपनी ओर बरबस आकर्षित कर लेती है। सुदामा-चरित का प्रतिपाद्य विषय कविवर नरोत्तमदास विरचित 'सुदामा-चरित' का प्रतिपाद्य-विषय सुदामा का दारिद्रय वर्णन और श्रीकृष्ण की आदर्श मैत्री है। सुदामा एक भिक्षो- पजीवी ब्राह्मण है। वह सांसारिक सुखों से उदासीन, भाग्यवादी, स्वाभिमानी तथा कुंठाग्रस्त है। निर्धनता की निर्दय मार खाते-खाते उसकी धन-लालसा कुंठित हो जाती है। उसकी विभिन्न मनःस्थितियों का मार्मिक निरूपण और श्रीकृष्ण की मित्र-वत्सलता की उदात्त भावना की प्रतिष्ठा ही कवि को अभीष्ट है। श्रीकृष्ण अपने बालसखा सुदामा को जो अपार सम्मान, धन-वैभव तथा स्नेह-सम्पत्ति देते हैं, वह अत्यन्त गौरवमयी, अनुकरणीय तथा आदर्श-मैत्री का अपूर्ण उदाहरण है। कवि ने उसे हृदयस्पर्शी व्यंजना देकर अपनी रचना को अमरता प्रदान की है। सुदामा परम्परागत ब्राह्मण-धर्म के निर्वाह का संकल्प लिए धन-दौलत से

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