भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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१२ / सुदामा-चरित कोसों दूर रहता है। वह भिक्षा माँगकर उसीसे अपने जीवन का निर्वाह करना चाहता है; हरिभजन की प्रबल लालसा उसके मन में बसी हुई है। किन्तु उसकी पत्नी सुबुद्धि इस दयनीय अवस्था में न तो स्वयं रहना चाहती है और न अपने पति को ही रहने देना चाहती है। उसे जैसे ही पता चलता है कि द्वारिकापति श्रीकृष्ण उसके पति के सहपाठी तथा मित्र हैं, वह उस स्वर्णावसर का लाभ उठा लेना चाहती है। कवि उसी के माध्यम से सुदामा के दारिद्रय का हृदय- विदारक चित्रण करके उसे श्रीकृष्ण के पास भेजना चाहता है। सुदामा-पत्नी के शब्दों में— “कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती। सीत बितीत गई सिसियातहि, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती ॥ जो जनती न हितू हरि-सों, तो काहे को द्वारिका पेलि पठौती। या घर से कबहूँ न गयौ पिय, टूटौ तयौ अरु फूटी कठौती ॥” ‘सुदाम-चरित’ का रचयिता अपने आपको सुदामा के साथ एकाकार करता प्रतीत होता है। उसकी हार्दिक इच्छा है कि इस निर्धन ब्राह्मण का आर्थिक संकट समाप्त हो, वह कुंठाग्रस्त न रहे। इसीसे उसने सुबुद्धि की तर्क-शक्ति का पूरा-पूरा उपयोग किया है। वह उसके कुंठित मन में धन-लालसा को जगा- कर, उसे सुखी, सम्पन्न तथा आशावादी बनाना चाहती है। सुदामा कुपित होते हैं, फिर भी सुबुद्धि की तर्क-शक्ति कुंठित नहीं होती है और वह व्यंग-बाण चलाने में भी नहीं चूकती— “जो पै सारो जन्म दरिद्र ही सतायो, तो पै कौन काज आई कृपानिधि कर मित्रई।” दरिद्र सुदामा पत्नी के सबल तर्कों से परास्त होकर द्वारिकापुरी की ओर प्रस्थान करता है। उस समय कैसी दीन-हीन स्थिति थी, इसका एक कारुणिक चित्र द्रष्टव्य है— “सीस पगा न झगा तन में प्रभु जानै को आहि, बसै केहि ग्रामा। धोती फटी औ लटी दुपटी अरु पांय उपानह की नहिं सामा ॥