सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / १३ द्वार खड़ो द्विज दुर्बल देखि रह्यौ चकि सो वसुधा अभिरामा । पूछत दीनदयाल को धाम बतावत आपनो नाम सुदामा ॥" सुदामा के दारिद्र्य वर्णन के उपरान्त कविवर नरोत्तमदास श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री के भव्य रूप की प्रतिष्ठा करते हैं। दरिद्र सुदामा और द्वारिका-नरेश श्रीकृष्ण के जीवन-स्तर में धरती एवं आकाश का अन्तर विद्यमान था, जिसे श्रीकृष्ण की मित्र-वत्सलता समाप्त कर देती है। उन्हें जैसे ही अपने बाल-सखा के आगमन का समाचार मिलता है, वे समस्त कामकाज को छोड़कर बड़े आदर- सत्कार के साथ उससे मिलते हैं। उसकी दयनीय दशा देखकर उनका हृदय द्रवित हो जाता है, वे आँखों में प्रेम-अश्रु भर उसकी कुशलता का समाचार पूछते हैं। इसे देखकर सुदामा की प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं रहती है। वह उनकी आदर्श-मैत्री के सम्मुख नतमस्तक हो जाता है – "बोल्यौ द्वारपाल 'सुदामा नाम पांडे सुनि, छाँडै सबै राजकाज जी की गति जानै को ? द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाँय, भेंटे लपटाय हिय ऐसे दुख मानै को ? नैन दोऊ जल भरि पूछत कुसल हरि, बिप्र बोल्यौ विपदा में मोहि पहिचानै को ?" मैत्री का उदात्त आदर्श स्थापित करने के निमित्त श्रीकृष्ण अपने मित्र को अन्तःपुर में ले जाते हैं, सोने की चौकी पर बैठाकर अपने हाथों से उसके पाँव धोते हैं, जल के स्थान पर उनके नेत्र-अश्रु, पाँव धोने का कार्य कर एक अपूर्व उदा- हरण प्रस्तुत करते हैं— "देखि सुदामा की दीन दशा करुणा करिकै करुनानिधि रोये । पानी परात को हाथ छुऔ नहिं नैनन के जल सों पग धोये ।।" श्रीकृष्ण का यह मैत्री-आदर्श स्तुत्य है; उनकी यह उदारता अनुकरणीय है। वे अपने मित्र के दारिद्र्य को देखकर, उससे घृणा नहीं करते वरन् उसे भी अपने समान वैभवशाली बनाने का प्रण करते हैं। प्रत्युपकार की भावना से रहित