सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ / सुदामा-चरित होकर वे द्वारिकापुरी जैसी अति अभिराम सुदामापुरी का निर्माण कराते हैं। मित्र के स्वाभिमान को आघात न पहुँचे, इसलिए वे यह सभी कुछ गुप्त रूप से करना अधिक उपयुक्त समझते हैं। प्रत्यक्ष रूप से वे सुदामा को कुछ नहीं देते हैं किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से इतना अधिक वैभव दे देते हैं कि वह अपने घर पर जाकर आश्चर्य चकित रह जाता है। उसे अपने गाँव, घर, पत्नी आदि को पहचानने में बड़ी कठिनाई होती है। उसके इस अपार वैभव को देखकर देवराज इन्द्र भी लजा जाते हैं। कृष्ण भक्ति-काव्य-परम्परा में आदर्श-मैत्री की जैसी सजीव एवं मर्मस्पर्शी प्रतिष्ठा 'सुदामा-चरित' के निर्माता ने की है, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है। कृष्ण-काव्य में ही नहीं अपितु विश्व-काव्य में भी आदर्श-मैत्री के ऐसे उदाहरण इने-गिने ही मिल सकते हैं। कविवर नरोत्तमदास ने मैत्री के उदात्त आदर्श की दृष्टि से कृष्ण-काव्य के गौरव में वृद्धि की है। सूर, नन्ददास आदि महाकवियों ने श्रीकृष्ण के बाल-रूप एवं तरुण-रूप के रूप-माधुर्य तथा प्रेम-भावता को ही प्रमुखता दी थी; उनके मित्र-रूप को अधिक नहीं उभारा था। 'सुदामा-चरित' के निर्माता ने श्रीकृष्ण के इस महिमामय रूप को प्रतिष्ठित करके एक चिरस्मरणीय कार्य किया है।
सुदामा-चरित की कथावस्तु
कविवर नरोत्तमदास विरचित 'सुदामा-चरित' की कथा का आधार 'श्रीमद्भागवत' का दशम् स्कन्ध है। कवि ने श्रीमद्भागवत में वर्णित कथा को ही नाटकीय पद्धति में प्रस्तुत कर, उसमें कौतूहल, रोचकता नवीनता तथा प्रभावोत्पादकता का संचार किया है। श्रीमद्भागवत के अनुसार सुदामा एक निर्धन ब्राह्मण थे, वे अपने भाग्य से सन्तुष्ट थे किन्तु उनकी पत्नी यह नहीं चाहती थी कि वे निर्धन बने रहें। उसे इस बात का ज्ञान था कि द्वारिकापति श्रीकृष्ण और उसके पति सुदामा दोनों सहपाठी रह चुके हैं। दोनों ने उज्जियनी में संदीपन ऋषि के आश्रम में एक साथ विद्याध्ययन किया था। एक दिन सुदामा की पत्नी ने अपनी निर्धनता से पीड़ित होकर अपने पति से कहा कि भगवान् श्रीकृष्ण