सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / १५ आपके मित्र हैं; वे महादानी हैं, आप उनके पास जाएँ और वहाँ जाने से आपकी निर्धनता समाप्त हो जाएगी। सुदामा ने न चाहने पर भी, पत्नी के बार-बार आग्रहपूर्वक कहने पर द्वारिकापुरी जाना स्वीकार कर लिया। उन्होंने सोचा कि और कोई लाभ हो न हो, इसी बहाने से भगवान् के दर्शन का परम लाभ तो उन्हें मिल ही जाएगा। सुदामा के कहने पर उनकी पत्नी ने पड़ोस से चार मुट्ठी चावल लाकर दिए, जिससे वे अपने मित्र को उन्हें उपहार स्वरूप दे सकें। सुदामा वह चार मुट्ठी चावल लेकर द्वारिका पहुँचे, वहाँ श्रीकृष्ण ने उनका बहुत आदर-सत्कार किया। उन्हें गले लगाकर मिले, पलंग पर बैठाया, पाँव धोये, उनकी आरती उतारी। उनसे मुस्कराते हुए वह उपहार माँगा जो उनकी पत्नी ने श्रीकृष्ण के लिए दिया था। सुदामा संकोचवश उसे देना नहीं चाहते थे, किन्तु अन्तर्यामी प्रभु अपने भक्त के हृदय की बात जान गये। उन्होंने सुदामा को देवदुर्लभ सम्पत्ति देने का निश्चय किया और उनके चिथड़े में बंधे चावलों को छीन लिया, दो मुट्ठी चावल मुँह में डाल लिए; तीसरी मुट्ठी चावल जब मुँह में डालने लगे तो उनकी पत्नी रुक्मिणी ने उनका हाथ पकड़ लिया। सुदामा यह सभी कुछ देखकर अत्यधिक प्रसन्न हुए, उस रात्रि उन्हीं के पास रहे। श्रीकृष्ण ने सुदामा को विदा करते समय प्रत्यक्ष रूप में कुछ भी न दिया, उससे वे तनिक भी दुःखी न हुए, वरन् उन्होंने सोचा कि श्रीकृष्ण ने उन्हें कुछ न देकर अच्छा ही किया है, धन माया है, वह मनुष्य को ईश्वर से दूर करती है। सुदामा प्रभु का गुणगान करते हुए अपने घर पहुँचे, वहाँ आने पर उन्हें सारी परिस्थिति परिवर्तित मिली, वे पहले तो चकित हुए किन्तु शीघ्र ही प्रभु की लीला को समझ गए। श्रीमद्भागवत और सुदामा-चरित की कथा में अन्तर—निस्सन्देह 'सुदामा-चरित' की कथा वस्तु का आधार 'श्रीमद्भागवत' है, किन्तु कविवर नरोत्तमदास ने उसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत न करके, उसे अपेक्षाकृत अधिक रोचक, नाटकीय तथा मनोवैज्ञानिक बनाया है। 'श्रीमद्भागवत' एवं 'सुदामा-चरित' की कथा में मिलने वाले अन्तर हैं— १. 'श्रीमद्भागवत' में सुदामा की पत्नी को पहले से ही इस बात का ज्ञान