सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
१४ / सुदामा-चरित होकर वे द्वारिकापुरी जैसी अति अभिराम सुदामापुरी का निर्माण कराते हैं। मित्र के स्वाभिमान को आघात न पहुँचे, इसलिए वे यह सभी कुछ गुप्त रूप से करना अधिक उपयुक्त समझते हैं। प्रत्यक्ष रूप से वे सुदामा को कुछ नहीं देते हैं किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से इतना अधिक वैभव दे देते हैं कि वह अपने घर पर जाकर आश्चर्य चकित रह जाता है। उसे अपने गाँव, घर, पत्नी आदि को पहचानने में बड़ी कठिनाई होती है। उसके इस अपार वैभव को देखकर देवराज इन्द्र भी लजा जाते हैं। कृष्ण भक्ति-काव्य-परम्परा में आदर्श-मैत्री की जैसी सजीव एवं मर्मस्पर्शी प्रतिष्ठा 'सुदामा-चरित' के निर्माता ने की है, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है। कृष्ण-काव्य में ही नहीं अपितु विश्व-काव्य में भी आदर्श-मैत्री के ऐसे उदाहरण इने-गिने ही मिल सकते हैं। कविवर नरोत्तमदास ने मैत्री के उदात्त आदर्श की दृष्टि से कृष्ण-काव्य के गौरव में वृद्धि की है। सूर, नन्ददास आदि महाकवियों ने श्रीकृष्ण के बाल-रूप एवं तरुण-रूप के रूप-माधुर्य तथा प्रेम-भावता को ही प्रमुखता दी थी; उनके मित्र-रूप को अधिक नहीं उभारा था। 'सुदामा-चरित' के निर्माता ने श्रीकृष्ण के इस महिमामय रूप को प्रतिष्ठित करके एक चिरस्मरणीय कार्य किया है।
सुदामा-चरित की कथावस्तु
कविवर नरोत्तमदास विरचित 'सुदामा-चरित' की कथा का आधार 'श्रीमद्भागवत' का दशम् स्कन्ध है। कवि ने श्रीमद्भागवत में वर्णित कथा को ही नाटकीय पद्धति में प्रस्तुत कर, उसमें कौतूहल, रोचकता नवीनता तथा प्रभावोत्पादकता का संचार किया है। श्रीमद्भागवत के अनुसार सुदामा एक निर्धन ब्राह्मण थे, वे अपने भाग्य से सन्तुष्ट थे किन्तु उनकी पत्नी यह नहीं चाहती थी कि वे निर्धन बने रहें। उसे इस बात का ज्ञान था कि द्वारिकापति श्रीकृष्ण और उसके पति सुदामा दोनों सहपाठी रह चुके हैं। दोनों ने उज्जियनी में संदीपन ऋषि के आश्रम में एक साथ विद्याध्ययन किया था। एक दिन सुदामा की पत्नी ने अपनी निर्धनता से पीड़ित होकर अपने पति से कहा कि भगवान् श्रीकृष्ण
सुदामा-चरित / १५ आपके मित्र हैं; वे महादानी हैं, आप उनके पास जाएँ और वहाँ जाने से आपकी निर्धनता समाप्त हो जाएगी। सुदामा ने न चाहने पर भी, पत्नी के बार-बार आग्रहपूर्वक कहने पर द्वारिकापुरी जाना स्वीकार कर लिया। उन्होंने सोचा कि और कोई लाभ हो न हो, इसी बहाने से भगवान् के दर्शन का परम लाभ तो उन्हें मिल ही जाएगा। सुदामा के कहने पर उनकी पत्नी ने पड़ोस से चार मुट्ठी चावल लाकर दिए, जिससे वे अपने मित्र को उन्हें उपहार स्वरूप दे सकें। सुदामा वह चार मुट्ठी चावल लेकर द्वारिका पहुँचे, वहाँ श्रीकृष्ण ने उनका बहुत आदर-सत्कार किया। उन्हें गले लगाकर मिले, पलंग पर बैठाया, पाँव धोये, उनकी आरती उतारी। उनसे मुस्कराते हुए वह उपहार माँगा जो उनकी पत्नी ने श्रीकृष्ण के लिए दिया था। सुदामा संकोचवश उसे देना नहीं चाहते थे, किन्तु अन्तर्यामी प्रभु अपने भक्त के हृदय की बात जान गये। उन्होंने सुदामा को देवदुर्लभ सम्पत्ति देने का निश्चय किया और उनके चिथड़े में बंधे चावलों को छीन लिया, दो मुट्ठी चावल मुँह में डाल लिए; तीसरी मुट्ठी चावल जब मुँह में डालने लगे तो उनकी पत्नी रुक्मिणी ने उनका हाथ पकड़ लिया। सुदामा यह सभी कुछ देखकर अत्यधिक प्रसन्न हुए, उस रात्रि उन्हीं के पास रहे। श्रीकृष्ण ने सुदामा को विदा करते समय प्रत्यक्ष रूप में कुछ भी न दिया, उससे वे तनिक भी दुःखी न हुए, वरन् उन्होंने सोचा कि श्रीकृष्ण ने उन्हें कुछ न देकर अच्छा ही किया है, धन माया है, वह मनुष्य को ईश्वर से दूर करती है। सुदामा प्रभु का गुणगान करते हुए अपने घर पहुँचे, वहाँ आने पर उन्हें सारी परिस्थिति परिवर्तित मिली, वे पहले तो चकित हुए किन्तु शीघ्र ही प्रभु की लीला को समझ गए। श्रीमद्भागवत और सुदामा-चरित की कथा में अन्तर—निस्सन्देह 'सुदामा-चरित' की कथा वस्तु का आधार 'श्रीमद्भागवत' है, किन्तु कविवर नरोत्तमदास ने उसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत न करके, उसे अपेक्षाकृत अधिक रोचक, नाटकीय तथा मनोवैज्ञानिक बनाया है। 'श्रीमद्भागवत' एवं 'सुदामा-चरित' की कथा में मिलने वाले अन्तर हैं— १. 'श्रीमद्भागवत' में सुदामा की पत्नी को पहले से ही इस बात का ज्ञान
१६ / सुदामा-चरित था कि उसके पति और श्रीकृष्ण न एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी और वे पर- स्पर मित्र हैं। ‘सुदामा-चरित’ में स्वयं सुदामा अपनी पत्नी को यह सभी कुछ बताते हैं। इससे कवि को सुदामा की दीन-हीन दशा का वर्णन करने, सुदामा- पत्नी की मनोवैज्ञानिक स्थिति का उद्घाटन करने तथा सुदामा की त्यागमयी मनोवृत्ति का विश्लेषण करने का अच्छा अवसर मिलता है। वह नाटकीय-पद्धति में इन दोनों के चरित्र पर प्रकाश डालते हैं; दोनों के तर्क-वितर्क इस काव्य-रचना में सरसता तथा कौतूहल का संचार करते हैं। २. ‘श्रीमद्भागवत’ में सुदामा धन-प्राप्ति की इच्छा से नहीं, वरन् भगवान् के दर्शनार्थ द्वारिका जाते हैं। वे पत्नी की बात ही रखना चाहते हैं, उससे सह- मत नहीं होते हैं। ‘सुदामा-चरित’ सुदामा के ब्रह्मज्ञानी, विरक्त तथा त्यागी होते हुए भी पत्नी की इच्छा से सहमत होकर द्वारिका जाते हैं और वहाँ से धन लाना उनका उद्देश्य था। वे केवल दर्शनार्थ श्रीकृष्ण के पास नहीं जाते हैं। कवि ने इस अन्तर के द्वारा सुदामा को एक साधारण मानव के रूप में चित्रित किया है, जो अधिक स्वाभाविक है। ३. ‘श्रीमद्भागवत’ में सुदामा को जब श्रीकृष्ण प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं देते हैं तो वे उससे प्रसन्न होते हैं; मार्ग में जाते हुए यह सोचते हैं कि धन माया है, माया मनुष्य को प्रभु से दूर करती है। ‘सुदामा चरित’ के सुदामा-श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष रूप में कुछ न पाकर कभी श्रीकृष्ण पर और कभी अपनी पत्नी पर झुंझलाते हैं। वे श्रीकृष्ण को कोसते हैं। इस परिवर्तन से भी कवि ने सुदामा के चरित्र को अधिक स्वाभाविक तथा मनोवैज्ञानिक बनाया है। ४. ‘श्रीमद्भागवत’ में सुदामा द्वारिका से लौटकर अपनी पत्नी का धन्य- वाद नहीं करते हैं, वे सारे परिवर्तन के मूल में प्रभु की लीला को देखते हैं। ‘सुदामा-चरित’ में सुदामा घर लौटकर बड़ी कठिनाई से सारा परिवर्तन समझते हैं और अपनी पत्नी का धन्यवाद करते हैं, क्योंकि उसी की प्रेरणा से वे द्वारिका गए और उन्हें अपार धन-वैभव मिला। वस्तुतः कवि ने सुदामा को केवल भक्त रूप में न लेकर मानव-रूप में चित्रित किया है, जिससे वह मानवीय संवेदनाओं को जागृत कर सके।
सुदामा-चरित / १७ सुदामाचरित की कथावस्तु की समीक्षा आधार की दृष्टि से काव्याचार्यों ने कथावस्तु के तीन भेद माने हैं—प्रख्यात, उत्पाद्य और मिश्रित। 'सुदामा-चरित' की कथावस्तु मुख्यतः प्रख्यात है। प्रख्यात कथावस्तु का आधार इतिहास, पुराण या जनश्रुति होता है। 'सुदामा- चरित' की कथावस्तु का मुख्य आधार श्रीमद्भागवत पुराण है। कविवर नरोत्तमदास ने अपनी इस अमर कृति के लिए एक ओर श्रीमद्भागवत पुराण के दशम् स्कन्ध से कथानक का चयन किया और दूसरी ओर अनेक मौलिक उद्भावनाएँ करके अपनी काव्य-प्रतिभा का परिचय दिया है। वे मौलिक उद्भावनाएँ हैं— १. सुदामा की निर्धनता को मार्मिकता प्रदान करने के लिए हठात एक दिवस निर्धन सुदामा के मुख से यह कहलवाना कि वे द्वारिकापति श्रीकृष्ण के सहपाठी तथा मित्र हैं। २. सुदामा के भक्त-रूप के साथ-साथ, उनके मानव-रूप को भी चित्रित करना; उनके मन में दबी धन-लालसा को जगाना, धन न मिलने पर उनका श्रीकृष्ण को कोसना, शाप देने को तत्पर हो जाना, अपनी पत्नी पर झुँझलाना, जिसने उन्हें बार-बार आग्रह करके द्वारिकापुरी भेजा था। ३. घर लौटकर बड़ी कठिनाई से अपने घर, पत्नी आदि को पहचानना और पत्नी के प्रति आभार प्रदर्शित करना, जिसकी प्रेरणा के अभाव में उन्हें वह अपार-वैभव नहीं मिल सकता था। ४. सुदामा की पत्नी सुशीला के नाम को बदलना, उसे सुबुद्धि नाम देना। श्रीमद्भागवत में सुदामा की पत्नी का नाम सुशीला है, जिसे कविवर नरोत्तम- दास ने बदल दिया है। वे सुशीला के स्थान पर सुबुद्धि नाम का प्रयोग करते हैं। इस नाम परिवर्तन के पीछे सुदामा-पत्नी का महत्त्व निहित है। सुदामा की निर्धनता को दूर कराने में उनकी पत्नी का बुद्धि-वैभव अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होता है। वह अपने तर्कों द्वारा विरक्त एवं सन्तोषी ब्राह्मण सुदामा के मन में धन-लालसा को जागृत करती है। उसी की प्रेरणा से वे द्वारिकापुरी
१८ / सुदामा-चरित जाते हैं । ५. सुदामा जब तीन दिनों तक निरन्तर चलते-चलते थककर सो जाते हैं, तो भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें निद्रावस्था में ही गोमती के तट पर पहुँचा देते हैं । ‘सुदामा-चरित’ में वर्णित इस घटना का भी ‘श्रीमद्भागवत’ में स्वतन्त्र रूप से उल्लेख नहीं हुआ है । उपर्युक्त मौलिक उद्भावनाओं ने ‘सुदामा-चरित’ की कथावस्तु के महत्त्व को बढ़ाया है । इस काव्य-रचना को इतना अधिक मर्मस्पर्शी बनाने में इन मौलिक उद्भावनाओं का सहयोग स्तुत्य है । ‘सुदामा-चरित’ में कथा-विकास की पाँच अवस्थाओं—आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति और फलागम में से चार का निर्वाह बड़ी सफलता के साथ हुआ है । ‘नियताप्ति’ की अवस्था, जहाँ पाठकों को ज्ञात हो जाता है कि फल की प्राप्ति निश्चित है, उसे कविवर नरोत्तमदास ने छोड़ दिया है । उन्होंने इस अवस्था को छोड़कर अपनी रचना में कौतूहल का संचार किया है । वे प्राप्त्याशा के पश्चात् फलागम अवस्था का वर्णन करके पाठकों को चकित कर देते हैं । उससे भी काव्य-सौन्दर्य में वृद्धि हुई है और रचना का महत्त्व बढ़ा है । ‘सुदामा-चरित’ की कथावस्तु पूर्णतः सुगठित, रोचक, मार्मिक, प्रवाह- मयी तथा मौलिक उद्भावनाओं से युक्त है । वह मूल संवेद्य के सर्वथा अनु- रूप है । सुदामा-चरित की पात्र-योजना ‘सुदामा-चरित’ की पात्र-योजना अत्यन्त व्यवस्थित, स्वाभाविक तथा सार्थक है । कविवर नरोत्तमदास ने अपने इस खण्ड-काव्य में मुख्य रूप से तीन पात्रों की योजना की है । वे मुख्य पात्र हैं—सुदामा, सुबुद्धि और श्रीकृष्ण । इन पात्रों के चरित्र-चित्रण में नरोत्तमदास का कवि-कौशल द्रष्टव्य है । वे मानव- मनोविज्ञान के पारखी हैं, उन्होंने मानवीय दुर्बलताओं को निकटता से देखा और दिखाया है । वे अपने पात्रों के अन्तर्द्वन्द्व को कलात्मक वाणी देने में अत्यन्त सफल
सुदामा-चरित / १६ रहे हैं। उन्होंने अपने पात्रों का चरित्र-चित्रण करने के लिए नाटकीय-पद्धति को विशेष प्रश्रय दिया है। पात्रों के व्यक्तित्व को उभारने के लिए उनके संवादों, कार्य-कलापों, तर्क-वितर्कों आदि का पूरा-पूरा सदुपयोग करते हैं। उनकी चरित्र-चित्रण कला यथार्थ और आदर्श दोनों को समान महत्त्व देती है, उसमें जहाँ आदर्श को प्रतिष्ठित करने की ललक है वहाँ यथार्थ को भी समुचित महत्त्व देने की तत्परता उपलब्ध होती है। वे पात्रों का चरित्र-चित्रण करने में अपनी मौलिक काव्य-प्रतिभा का परिचय देते हैं। सुदामा—'सुदामा-चरित' का केन्द्रीय पात्र सुदामा, इस खण्ड-काव्य का नायक है। नरोत्तमदास ने उसी की निर्धनता, मनःस्थिति तथा फल-प्राप्ति का विस्तारपूर्वक निरूपण किया है। वह एक ओर आदर्श ब्राह्मण है, भाग्य में उसका अटूट विश्वास है, वह सांसारिक सुखों के प्रति उदासीन है और स्वाभिमान उसमें कूट-कूट कर भरा हुआ है। दूसरी ओर वह एक साधारण मानव है, उसमें धन-लालसा विद्यमान है और वह भी मानवीय दुर्बलताओं से ग्रस्त है। कवि उसके व्यक्तित्व के इन दोनों पहलुओं का बहुत ही स्वाभाविक तथा मनोवैज्ञानिक चित्रण करता है। सुदामा अपने प्रथम रूप में अत्यन्त निर्धन, सन्तोषी, तेजस्वी तथा हरि-भक्त है। वह भिक्षावृत्ति से अपना निर्वाह करता है। वर्षों निर्धनता में रहते-रहते वह उसी को अपना जीवन मान लेता है। उसके विचारानुसार ब्राह्मण का धन तो मात्र भिक्षा है। वह अपने ये विचार पत्नी के सम्मुख रखता है— “औरनि को धन चाहिए बावरि, ब्राह्मण को धन केवल भिक्षा।” भाग्यवादी सुदामा अपनी दीन-हीन दशा के लिए किसी को भी दोषी नहीं मानता है। उसकी धारणा है कि मनुष्य को सुख-दुःख, धन-वैभव आदि की प्राप्ति भाग्य से ही होती है। भाग्य का लेखा न कोई मिटा सका है और न कोई मिटा सकेगा। वह अपनी पत्नी को यह तथ्य समझाता हुआ कहता है— “पैहें कहाँ ते अटारी अटा जिनके विधि दीन्ही है टूटी-सी छानी। जो पै दरिद्र लिख्यौ है ललाट तौ काहू पै मेटि न जात अजानी॥” सुदामा एक अत्यन्त स्वाभिमानी ब्राह्मण है। 'सुदामा-चरित' में उसका यह
२० / सुदामा-चरित स्वाभिमानी व्यक्तित्व अनेक स्थलों पर व्यंजित हुआ है। उसकी पत्नी जब बार- बार उसे द्वारिकापुरी जाने के लिए कहती है तो उसका स्वाभिमानी ब्राह्मणत्व उसे यह कहने के लिए बाध्य करता है— “सिच्छक हौं सिगरे जग को तिय ! ताको कहा अब देति है सिच्छा ।” उसके विचार से दुःख सह लेना कहीं अच्छा है, किन्तु धन-लालसा को लेकर मित्र के द्वार पर कभी नहीं जाना चाहिए। मित्रता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि उसके यहाँ जाकर यदि कुछ खाओ तो उसे भी अपने घर बुला- कर खिलाओ— “मित्र के मिले में वित्त चाहिए परस्पर, मित्र के जो जेंइए तो आप हू जेंवाइए ।” सुदामा में भक्ति-भावना का चरमोत्कर्ष भी विद्यमान है। वह सांसारिक धन-वैभव के प्रति उदासीन है और प्रभु-भक्ति ही उसे अभीष्ट है। वह अपनी प्रभु- भक्ति को भी अपनी निधि मानता है— “मेरे हिय हरि के पद पंकज बार हजार लै देखु परिच्छा ।” सुदामा को उसके उच्च आदर्श करुणा की साक्षात् प्रतिमा बना देते हैं। वह यथार्थ के आगे झुकने के लिए विवश हो जाता है। उसकी करुणाजनक स्थिति का उद्घाटन करते हुए द्वारपाल कहता है— “सीस पगा न झगा तन में प्रभु, जानें को आहि, बसे केहि ग्रामा, धोती फटी सी लटी दुपटी अरु पायं उपानहु को नही सामां ।” सुदामा का चरित्र मानवीय दुर्बलताओं से युक्त एक साधारण मानव के रूप में भी अपना वैशिष्ट्य लिए हुए है। वर्षों निर्धनता के कोड़े सहते-सहते उसके अन्दर धन-लालसा दब-सी जाती है, किन्तु सुबुद्धि के बार-बार समझाने, उकसाने तथा प्रेरित करने पर वह कुंठित लालसा पुनः तीव्र हो जाती है। धन-वैभव से उदासीन रहने वाला सुदामा द्वारिकापुरी के वैभव को देखकर चकित होता है और मन ही मन में धन-सम्पदा पाने की प्रबल आकांक्षा रखने लगता है। विदाई
१. प्रथम भाग: सुदामा की दीन-दशा, सुशीला का आग्रह एवं द्वारका-प्रस्थान
सुदामा-चरित / २१ के समय श्रीकृष्ण से कुछ न पाकर वह सन्तोषी ब्राह्मण अपने घनिष्ठ मित्र को शाप तक देने को तत्पर हो जाता है। वापस घर लौटते हुए वह कभी अपनी पत्नी पर झुँझलाता है तो कभी श्रीकृष्ण पर। वह अपने मन ही मन में सोचता है कि आखिर द्वारिकापति हैं तो वही न जो अपने बाल्यकाल में दही माँग-माँग कर खाते थे। ऊँचा पद पा लेने से दिल बड़ा नहीं हो जाता। सुदामा के चरित्र का यह परिवर्तन और तीखी प्रतिक्रिया उसके मानवीय रूप को उभारती है। सुबुद्धि—'सुदामा चरित' का दूसरा महत्त्वपूर्ण पात्र सुदामा की पत्नी सुबुद्धि है, जिसे श्रीमद्भागवत में सुशीला नाम से अभिहित किया गया है। वह इस खण्ड-काव्य की नायिका है और उसी की सद्प्रेरणा से ही नायक सुदामा को फल- प्राप्ति होती है। वह एक पतिव्रता नारी है, उसमें व्यवहार कुशलता, मानव- स्वभाव को समझने की अद्भुत क्षमता, धन-वैभव के प्रति नारी सुलभ आसक्ति, अचूक तर्क-शक्ति तथा जीवन के यथार्थ को समझने की तीव्र प्रतिभा विद्यमान है। कविवर नरोत्तमदास ने उसका चरित्र-चित्रण वास्तविकता के धरातल पर, नारी मनोविज्ञान को दृष्टि में रखकर अत्यन्त निपुणता के साथ किया है। वे भक्ति-भाव को समुचित महत्त्व देते हुए, मानवीय मनोभावों को व्यंजित करने में पर्याप्त सफल रहे हैं। उनकी चरित्र-चित्रण कला का सौष्ठव सराहनीय है। कविवर नरोत्तमदास सुदामा की पत्नी के नाम-परिवर्तन में अपना चारि- त्रिक वैशिष्ट्य प्रदर्शित करते हैं। 'श्रीमद्भागवत' के सुशीला नाम से 'सुदामा- चरित' का सुबुद्धि नाम कहीं अधिक सार्थक तथा उपयुक्त है। सुदामा की पत्नी के चरित्र की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशिष्टता उसका बुद्धि-चातुर्य है। वह अपने पति सुदामा को घोर निर्धनता से मुक्ति दिलाने के लिए अपने बुद्धि-वैभव का पूरा-पूरा सदुपयोग करती है। भाग्यवादी सुदामा, उसके सबल तर्कों से परास्त होता है और अन्त में उसके प्रति आभार प्रकट करते हुए कहता है— “जो पै पतिब्रता तू न देती उपदेश मोहिं, एती कृपा द्वारिकेश मो पै कब करते।” सुबुद्धि पतिव्रता नारी है, उसका यह पातिव्रत्य घोर निर्धनता एवं अपार सम्पन्नता दोनों में समान रूप से बना रहता है। वह निजी सुख के निमित्त नहीं
२२ / सुदामा-चरित वरन् अपने पति को घोर आर्थिक संकटों से छुटकारा दिलाने के लिए द्वारिका- पति श्रीकृष्ण के पास भेजना चाहती है। वह पति-अनुरागिनी है, उसका पारि- वारिक जीवन-स्तर ऊँचा उठाना चाहती है। सुगृहिणी-धर्म का पालन करने के लिए ही वह घर की यथार्थ स्थिति से पति को अवगत कराती है— "कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती, सीत वितीत भयौ सिसियातहि, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती।" सुबुद्धि व्यवहार कुशल नारी है, वह मिथ्या आदर्शों पर न तो स्वयं बलि होना चाहती है और न अपने पति सुदामा को बलि होते देखना चाहती है। उसमें जीवन जीने की साध है, यह यथार्थ को अपनी आँखों से ओझल नहीं करना चाहती। यही कारण है कि वह धन-वैभव को भी जीवन के लिए आवश्यक मानती है। उसमें अपार तर्क-शक्ति है, वह जिसे ठीक समझती है, उसे पूरा करा लेना चाहती है। उसे जैसे ही पता चलता है कि द्वारिकापति श्रीकृष्ण उसके पति सुदामा के सहपाठी एवं मित्र हैं, वह अनेक प्रकार के तर्कों से समझा-बुझा कर उसे द्वारिका भेजने का निश्चय कर लेती है। वह अपनी सिद्धि के लिए एक के बाद एक तर्क-बाण छोड़ती है, पति के आक्रोश से भी वह हतोत्साहित नहीं होती है। वह पति की निर्धनता को दूर कराने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहती है। वह एक ओर श्रीकृष्ण की भक्त-वत्सलता का बखान करती है और दूसरी ओर पति की कृष्ण-मैत्री को चुनौती देती है— "जो पै सारो जन्म दरिद्र ही सतायो, तो पै कौन काज आई कृपानिधि की मित्रई।" सुबुद्धि की व्यवहार-कुशलता उस समय अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो जाती है जब सुदामा द्वारिकापुरी जाने को तत्पर हो जाते हैं किन्तु मित्र को भेंट स्वरूप क्या दें ? यह एक नई समस्या खड़ी कर देते हैं। सुबुद्धि इस सुअवसर को हाथ से निकलने नहीं देती, वह तुरन्त पड़ौसिन के घर जाकर पाव सेर चावल ले आती है। उन्हें पोटरी में बाँधकर पति को सौंप देती है, जिससे वह कोई अन्य बहाना न खोज सके। सुदामा-पत्नी की यह व्यवहार कुशलता मानव के सहज स्वभाव से सम्बद्ध है, चतुर मनुष्य अपने सम्बन्धों से लाभान्वित होना भली-
सुदामा-चरित / २३
भाँति जानता है। इसी मानवीय मनोविज्ञान को दृष्टि में रखकर सुबुद्धि का चारित्रिक वैशिष्ट्य चरम निखार को प्राप्त करता है। इस प्रकार यथार्थ-दृष्टि और नारी मनोविज्ञान के घने स्पर्श से सुबुद्धि का चरित्र अत्यन्त स्वाभाविक एवं प्रभावोत्पादक बन गया है। श्रीकृष्ण—श्रीकृष्ण ‘सुदामा-चरित’ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पात्र हैं। कविवर नरोत्तमदास ने उनका चरित्र-चित्रण लौकिक एवं अलौकिक दोनों आधार भूमियों पर बड़ी कलात्मकता के साथ किया है। वे आदर्श-मैत्री के अपूर्व उदाहरण हैं। उनकी मित्र-वत्सलता असाधारण है, विपत्तिग्रस्त अपने मित्र को अपना सर्वस्व सौंप देना चाहते हैं। उनकी आदर्श-मत्री प्रत्युपकार की भावना से कोसों दूर, चिरस्तुत्य एवं चिरस्मरणीय है। वे द्वारिकापति हैं, उनका चारित्रिक वैशिष्ट्य उनके अलौकिक कृत्यों से अधिक विख्यात है किन्तु इस खण्ड-काव्य में वे मित्र- वत्सलता की दृष्टि से एक अमर चरित्र बन गए हैं। इस रचना के निर्माता ने उनके इस उदात्त रूप को अत्यन्त सफलता के साथ उभारा है। श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण करते समय कविवर नरोत्तमदास ने उनके लौकिक एवं अलौकिक दोनों रूपों को जहाँ बड़ी निपुणता से अंकित किया है, वहाँ सुदामा के चारित्रिक वैशिष्ट्य को दबने नहीं दिया है। उन्हें मानवीय आधार भूमि पर लाकर, अपनी काव्य-कला का उत्कर्ष दिखाया है। वस्तुतः आदर्श-मैत्री की प्रतिष्ठा ही कवि का अभीष्ट है और वह लौकिक धरातल पर अधिक स्वाभाविक निखार पा सकती थी। अपने इस संवेद्य की व्यंजना में वे पूर्णतः सफल रहे हैं। कृष्ण-काव्य-परम्परा में मुख्यतः श्रीकृष्ण को एक मनमोहक बालक तथा रसिक तरुण के रूप में ही चित्रित किया गया है। उनके आदर्श-मैत्री के उदात्त रूप को सर्वाधिक कुशलता के साथ निरूपित करने का श्रेय ‘सुदामा-चरित’ के निर्माता को देना समीचीन है। इस रचना में वे मित्र-वत्सलता की साक्षात् प्रतिमा बनकर प्रस्तुत हुए हैं। उन्हें जैसे ही द्वारपाल से बाल्यकाल के मित्र सुदामा के आगमन की सूचना मिलती है, वे मित्र-मिलन की आकांक्षा लिए दौड़ पड़ते हैं। उन्हें अपनी भी सुध-बुध नहीं रहती है। वे नेत्रों में प्रेम के आँसू भर-
२४ / सुदामा-चरित कर, मित्र का कुशल समाचार पूछते हैं। यह सभी कुछ देखकर सुदामा चकित रह जाता है— “बौल्यौ द्वारपालक 'सुदामा नाम पांडे सुनि, छांड़े सबै राजकाज जी की गति जानै को ? द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाँय, भेंटे लपटाय हिय ऐसे दुख मानै को ? नैन दोऊ जल भरि पूछत कुशल हरि, विप्र बोल्यो विपदा में मोहिं पहिचानै को ? जैसी तुम कीन्हीं तैसी करै को कृपा के सिंधु ! जैसी प्रीति दीनबन्धु ! दीनन पै आनै को ?” श्रीकृष्ण के मित्र-वत्सल रूप के साथ-साथ उनके विनोद-प्रिय रूप को भी कविवर नरोत्तमदास ने अति सुन्दर अभिव्यक्ति दी है। सुदामा के कहने पर उसकी पत्नी ने उसे पाव सेर चावल एक पोटरी में बाँधकर दिए थे। द्वारिका- पुरी के अपार वैभव को देखकर, सुदामा संकोच में पड़ गए कि भेंट स्वरूप वह पोटरी श्रीकृष्ण को दें या नहीं। उनकी इस दुविधामय मनःस्थिति को भाँप कर श्रीकृष्ण अपनी विनोद-प्रिय प्रकृति का परिचय देते हैं— “कछु भाभी हमको दियो, सो तुम काहि न देत । चाँपि पोटरी काँख में, रहौ कहौ केहि हेत ॥ इतना ही नहीं, वे अपने मित्र के संकोच को दूर करने के लिए बाल्य-काल की एक चोरी की घटना का स्मरण कराते हैं। उस पर मधुर व्यंग्य-बाण भी छोड़ते हैं— 'आगे चना गुरु-मातु दए ते लए तुम चाबि हमें नहिं दीने । स्याम कह्यौ मुसुकाय सुदामा सौं चोरी की बानि में हो जु प्रबीने ॥ 'सुदामा-चरित' में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप को भी कवि ने सुरक्षित रखा है। वे सामान्य मनुष्य नहीं वरन् परब्रह्म हैं, उन्हें दीनबन्धु, पतितपावन आदि नामों से भी सम्बोधित किया जाता है। उन्होंने संकट में सदा अपने भक्तों की रक्षा की है। उनके इस विराट रूप से सुदामा की पत्नी भली-भाँति परिचित
सुदामा-चरित / २५ हैं। इसी से वह अपने पति से द्वारिकापुरी जाने का आग्रह करती है, उसका यह दृढ़ विश्वास है कि वे दीनबन्धु उनकी नौका को भी किनारे लगा देंगे— “दीनदयाल कौ ऐसोई द्वार है दीनन की सुधि लेत सदाई । द्रौपदी तें गज तें प्रहलाद तें जानि परी कछु बार न लाई ॥” 'सुदामा-चरित' के श्रीकृष्ण अन्तर्यामी भी हैं, वे अपने मित्र की पीड़ा को जानकर कि वह तीन दिन निरन्तर चलते-चलते थककर चूर हो गया है, उसे सोते-सोते में ही को गोमती के तीर पर पहुँचा देते हैं। इसी प्रकार वे अपने मित्र की घोर निर्धनता के निवारण के निमित्त द्वारिकापुरी से भी अधिक सुन्दर सुदामापुरी का निर्माण करा देते हैं। सभी कार्य उनके अति मानवीय रूप को व्यंजित करते हैं। वस्तुतः नरोत्तमदास की काव्य-कला श्रीकृष्ण के लौकिक एवं अलौकिक दोनों रूपों का अद्भुत सामंजस्य प्रस्तुत करने में ही अपनी सार्थकता समझती है। सुदामा-चरित का काव्य-रूप बन्ध के विचार से काव्य के दो भेद किए गए हैं—प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्य। प्रबन्ध काव्य के पुनः तीन भेद माने जाते हैं—महाकाव्य, खण्ड- काव्य और एकार्थकाव्य। इन सभी काव्य-भेदों में 'सुदामा-चरित' को खण्डकाव्य की संज्ञा दी जा सकती है। खण्डकाव्य में किसी महापुरुष के खण्ड जीवन या जीवन की किसी समस्या के किसी विशेष पहलू आदि का चित्रण महाकाव्योचित शैली में होता है। इसमें प्रासंगिक कथाओं का अभाव होता है। इसकी कथा- वस्तु विकास की विविध अवस्थाओं से गुजरती हुई एक निश्चित उद्देश्य का सिद्धि को पाकर समाप्त हो जाती है। इसका आकार लघु होता है और इसमें कवि की तीव्र अनुभूतियों एवं भाव प्रवणता को विशेष प्रश्रय मिलता है। महा- काव्य के समान इसका प्रारम्भ भी ईश्वर वन्दना, आशीर्वाद, नमस्कार आदि से होता है और इसमें महाकाव्य की कई अन्य विशेषताओं का समावेश भी बड़ी कलात्मकता के साथ किया जाता है। किन्तु नायक के सम्पूर्ण कथावृत्त तथा जातीय जीवन की विस्तृत चर्चा खण्डकाव्य में सम्भव नहीं होती है। इसकी परिधि सीमित होती है, यह एक देशीय होता है। इसे महाकाव्य का एक अंग भी
२६ / सुदामा-चरित माना जा सकता है, किन्तु यह अंग अपने आप में सर्वांगीण होता है, उसी से यह अत्यन्त प्रभावोत्पादक बनता है। इसमें जीवन के किसी खण्ड की कोई सुनि- श्चित कथा तथा उदात्त उद्देश्य निहित रहता है। इसमें प्रायः एक रस की प्रधानता होती है। 'सुदामा-चरित' में खण्डकाव्य की अधिकांश विशिष्टताओं का सहज सौंदर्य देखा जा सकता है। इसकी कथावस्तु 'श्रीमद्भागवत' के दशम् स्कन्ध से ले गई है। इसमें सुदामा नामक तपोनिष्ठ ब्राह्मण के प्रौढ़ जीवन का वर्णन हुआ है, जिसमें घोर निर्धनता ने अपना साम्राज्य स्थापित कर रखा था। द्वारिकापति श्रीकृष्ण उसके सहपाठी तथा बाल सखा थे। दरिद्र सुदामा उनके पास जाना नहीं चाहता था, उसका स्वाभिमानी ब्राह्मण व्यक्तित्व इसमें सबसे बड़ी दीवार थी। सुदामा-पत्नी के अचूक तर्क-तीरों से वह दीवार अन्ततः टूटती है और श्रीकृष्ण की उदात्त मैत्री से उसका दरिद्रय दूर हो जाता है। उसके जीवन के इस खण्ड या आर्थिक समस्या का वर्णन कवि ने बड़ी कलात्मकता के साथ किया है। उसने सुदामा के जीवन के इस मार्मिक अंग को केन्द्र बनाकर कथा की योजना की है, उसमें न तो किसी प्रासंगिक कथा का समावेश किया है और न उसमें किसी प्रकार की नीरसता आने दी है। उसकी कथावस्तु विकास की विभिन्न अव- स्थाओं को पार करती हुई लक्ष्य-सिद्धि को प्राप्त करती है। 'नियताप्ति' की अवस्था, जहाँ पाठक को ज्ञात हो जाता है कि फल प्राप्ति निश्चित है, उसे कवि ने छोड़ दिया है। इससे कथानक में कौतूहल की सृष्टि हुई है और काव्य-सौंदर्य बढ़ा है। 'सुदामा-चरित' का आकार खण्डकाव्योचित है। इसमें कथानायक के समस्त कथावृत्त और जातीय जीवन की विस्तृत व्याख्या को प्रस्तुत नहीं किया गया है। कवि ने निर्धन सुदामा के दारिद्रय से सम्बद्ध तीव्र अनुभूतियों और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री की उदात्त भावनाओं को ही व्यंजित किया है। इस क्षेत्र में उसकी सफलता असाधारण है। उसने गणेश-वंदना से अपने इस खण्डकाव्य का श्रीगणेश करके, मूलसंवेद्य से सम्बद्ध कथा को तीव्र गति से आगे बढ़ाया है। मंगलाचरण में ही उसने रचना के प्रतिपाद्य-विषय का संकेत दे दिया है—
सुदामा-चरित / २७ “श्रीगणेश सुमिरन करों, उपजे बुद्धि प्रकाश । सो चरित वरनन करों, जासे दारिद नास ॥” सुदामा के दारिद्रय का नाश हो, यही केन्द्रीय भाव है, जिसे सम्पूर्ण कथा- वृत्त में चित्रित किया गया है । सुदामा की निर्धनता को दूर कराने में उसकी पत्नी सुबुद्धि के योगदान भी अत्यन्त महत्त्व था, जिसकी प्रेरणा से वे द्वारिकापुरी गए । फलतः कवि सुबुद्धि के सबल तर्कों तथा बुद्धि-चातुर्य को समुचित महत्त्व देता हुआ, अन्त में श्रीकृष्ण की भव्य तथा स्तुत्य आदर्श-मैत्री को वाणी देता है । इस प्रकार उसने अपने संक्षिप्त, सुगठित तथा प्रवाहमयी कथा के माध्यम से एक निश्चित उद्देश्य को मुखरित किया है । उसने जीवन के जिस अंग को लिया है, उसकी सर्वांगीण व्याख्या की है । उसके वर्णन सजीव तथा मार्मिक हैं । मर्मस्पर्शी स्थलों पर उसकी भावप्रवणता चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो गई है । सुदामा के दारिद्रय का एक कारुणिक चित्र द्रष्टव्य है— “कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट न चाहति हों दधि दूध मिठौती । × × × या घरतें कबहुँ न गयो पिय, फटो तयौ और टूटी कठौती ॥” सुदामा की दयनीय दशा और श्रीकृष्ण की पावन मैत्री को एक ही छन्द में जिस भावमयता एवं आत्मानुभूति का घना स्पर्श देखकर कवि ने व्यक्त किया है, वह चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो हो गई है— “ऐसे बेहाल बिवाइन सों पग कंटक जाल लगे पुनि जोए । ‘हाय महादुख पायौ सखा ! तुम आए इतै न कितै दिन खोए ॥’ देखि सुदामा की दीन दशा, करुणा करके करुणानिधि रोए । पानी परात को हाथ छुयौ नहीं, नैनन के जल सों पग धोए ॥” कविवर नरोत्तमदास ने कथावस्तु को सर्गों में विभाजित नहीं किया है, उसके मूल में भी कथानक में एकात्मक अन्विति को बनाए रखना है । वे अपने संवेद्य को ही अपना सर्वस्व मानकर, उसी की अभिव्यंजना में अपनी सारी शक्ति व्यय करते हैं । उनकी प्रबन्ध-कल्पना, वस्तु एवं भाव-वर्णन मुख्यतः सुदामा की निर्धनता और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री से सम्बद्ध हैं ।
२८ / सुदामा-चरित 'सुदामा-चरित' में करुण, शांत, अद्भुत, भक्ति आदि अनेक रसों का परिपाक हुआ है, किन्तु सारे खण्डकाव्य पर मित्र-वत्सलता छाई हुई है, जिसे शास्त्रीय दृष्टि से किसी रस का नाम नहीं दिया जा सकता। ऐसी स्थिति में एक रस की प्रधानता के स्थान पर एक केन्द्रीय भाव के प्राधान्य का रसास्वादन किया जा सकता है। सारांशतः 'सुदामा-चरित' में खण्डकाव्य की प्रायः सभी विशेषताएँ मिलती हैं और इसे हिन्दी-साहित्य का एक सफल खण्डकाव्य कहा जा सकता है। सुदामा-चरित का कला-सौष्ठव भाव-पक्ष यदि काव्य की आत्मा है तो कलापक्ष उसका शरीर है। काव्य- पुरुष की आत्मा को सुरक्षित रखने वाले शरीर अर्थात् कलापक्ष के महत्त्व को प्रायः सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है। कलापक्ष से सम्बद्ध उपकरणों में मुख्य हैं---भाषा, वर्णन कुशलता, छन्द-योजना तथा अलंकार-योजना। 'सुदामा-चरित' में व्यंजित भावों की उदात्तता के साथ-साथ कलापक्ष का सौष्ठव भी द्रष्टव्य है— भाषा—भाषा मुख्यतः ब्रज है, उसमें अवधी, उर्दू, आंचलिक आदि शब्दों का प्रयोग भी यथास्थान हुआ है। इस रचना की ('सुदामा-चरित' की) लोकप्रियता के मूल में उसकी भाषा का वैशिष्ट्य एक प्रधान कारण है। वह सर्वत्र स्वाभा- विक, प्रसादगुण-सम्पन्न, देशकालानुरूप, मधुर-प्रांजल, लोकोक्तियों एवं मुहावरों से युक्त, संघात्मक तथा टकसालीपन के सौन्दर्य को लिए हुए है। उसमें लाक्ष- णिकता, अनुकरणात्मकता, चित्रात्मकता, प्रवाहमयता, व्यंग्यात्मकता आदि गुण भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। वह संवेद्य को अधिकाधिक मर्मस्पर्शी बनाने में अपनी सार्थकता समझती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में—"नरोत्तमदास की भाषा बहुत ही परिमार्जित और व्यवस्थित है। बहुतेरे कवियों के समान भरती के शब्द और वाक्य इसमें नहीं हैं।" 'सुदामा-चरित' की भाषा सरल, स्वाभाविक तथा प्रसादगुण-सम्पन्न है। कविवर नरोत्तमदास ने बोलचाल की भाषा को ही साहित्यिक भाषा का सौष्ठव प्रदान कर दिया है। उन्होंने वैसे तो ओज, माधुर्य एवं प्रसाद तीनों गुणों को
सुदामा-चरित / २६ विषयानुसार प्रश्रय दिया है किन्तु प्रसादगुण अपनी स्वच्छता एवं द्रवणशीलता में सभी से आगे बढ़ गया है और वह अन्य गुणों को आत्मसात् करता प्रतीत होता है। वे शब्दों का चयन करते समय देशकाल को दृष्टि में रखते हैं। सुदामा के दारिद्रय का वर्णन करने के लिए वे ग्रामीण शब्दावली – 'जुरतो', 'हठौती', 'टूटो तयौ', 'फूटी कठौती' आदि का और द्वारिकापुरी के अपार वैभव का वर्णन करने के लिए सुसंस्कृत भाषा की शब्दावली—'वसुधा', 'अभिराम', 'सुषमा', 'सन्ताप', 'कनक', 'सुरभी', 'घृत', 'दुति' आदि का प्रयोग करते हैं। अपनी भाषा को सहज तथा बोधगम्य बनाने के लिए वे लोक-प्रचलित विदेशी शब्दों का प्रयोग भी करते हैं। 'अफ़सोस, 'गरीबनवाज' 'सामा', 'लायक' आदि शब्दों का प्रयोग इसी तथ्य की पुष्टि करता है। इसी प्रकार भाषा के सौष्ठव को बढ़ाने वाले अवधी के प्रयोग—'कठौती', 'पंडाइन', 'कोदी सवाँ' आदि भी कम महत्त्व- पूर्ण नहीं हैं। आंचलिक प्रयोगों में 'छूछी छाम' 'पेलि पठौती', लदाय लड़ा' आदि का प्रयोग अत्यन्त प्रभावोत्पादक बन गया है। 'सुदामा-चरित' में प्रयुक्त मुहावरों एवं लोकोक्तियों ने उसकी भाषा की व्यंजना-शक्ति को बढ़ाने में अत्यधिक सहयोग दिया है। इससे वह जन- भाषा के अति निकट पहुँच गई है और संवेद्य अपेक्षाकृत अधिक मार्मिक बन गया है। कवि ने लोक प्रसिद्ध लोकोक्तियों, सूक्तियों तथा मुहावरों का बड़ी निपुणता के साथ प्रयोग किया है। यथा—'जेंइए जो मित्र के तो आपहु जेंवाइए', 'विपति परे पै द्वार मित्र के न जाइए' आदि लोकोक्तियों या सूक्तियों और 'सुख दुख करि दिन काटे ही बनेंगे', 'भेंटे लपटाय हिय' आदि मुहावरों का जैसा सफल एवं सार्थक प्रयोग 'सुदामा-चरित' में मिलता है, वैसा अन्यत्र सरलता से नहीं मिल सकता है। इस कला में कवि की दक्षता सराहनीय है। वह लोकोक्तियों आदि के प्रयोग से अपनी भाषा को टकसाली बनाने में पर्याप्त सफल रहा है। उससे काव्य-सौष्ठव में निखार आया है और भावों की प्रभाव-शक्ति बढ़ी है— “कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती। या घर ते कबहूं न गयौ पिय टूटौ तयौ अरु फूटी कठौती॥” 'सुदामा-चरित' में परिस्थितियों के अनुरूप अनुकरणात्मक, लाक्षणिक तथा
३० / सुदामा-चरित व्यंग्यात्मक प्रयोग देखे जा सकते हैं। अनुकरणात्मक शब्दों में 'जगर-मगर' 'सिसि- यात', 'मिठौती' आदि का प्रयोग अत्यन्त सार्थक है। लाक्षणिक प्रयोगों में कवि- कौशल चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो गया है, उससे भावों की मार्मिकता को बल मिला है। वे अत्यन्त प्रभावशाली बन गए हैं— “पानी परात को हाथ छुयौ नहीं, नैनन के जल सों पग धोये ।” कवि हास्य-व्यंग्य संचार करने के लिए व्यंग्योक्तियों का प्रयोग करने में भी सिद्धहस्त है। सुदामा अपने फटे-पुराने कपड़े में बँधे चावल, श्रीकृष्ण को भेंट करने में अति संकोच अनुभव करता है, जिसे वे भाँप लेते हैं और मीठी चुटकियों एवं व्यंग्योक्तियों के प्रयोग का सुअवसर समझकर कह उठते हैं— “आगे चना गुरु मातु दए ते तुम खाए हमें नहीं दीने। स्याम कही मुस्काय सुदामा सों चोरी की बानि में हू जे प्रवीने॥” श्रीकृष्ण सुदामा का अत्यधिक आदर-सत्कार करते हैं, किन्तु जाते समय उसे प्रत्यक्ष रूप में कुछ नहीं देते हैं। इसकी सुदामा पर तीव्र प्रतिक्रिया हुई, उसी को वह व्यंग्यात्मक रूप में व्यंजित करता हुआ कहता है – “हौं आवत नाहीं हुतौ, वाहि पठयो ठेलि। कहिहौं धन सौं जाइके, अब धन धरौ सकेलि॥” ‘सुदामा-चरित’ की भाषा में संगीतात्मकता, चित्रात्मकता, प्रवाहमयता आदि का वैशिष्ट्य भी यत्र-तत्र देखा जा सकता है। इस दिशा में उसका शब्द- चयन सर्वाधिक सहायक रहा है। कवि मधुर-प्रांजल शब्दों; बिम्ब प्रस्तुत करने में समर्थ शब्दावली का प्रयोग करने में बड़ी निपुणता दिखाता है। उससे भाषा वेगमयी, बिम्बात्मक तथा हृदयस्पर्शी बन गई है। वर्णन-कौशल—‘सुदामा-चरित’ का रचयिता वस्तु एवं भाव दोनों के वर्णन में असाधारण सफलता प्राप्त करता है। उसका वर्णन कौशल सुदामा के दारिद्रय चित्रण, श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री के प्रतिष्ठापन और सुदामा के अन्तर्द्वन्द्व को व्यंजित करने में जिस निपुणता का परिचय देता है, वह निःसन्देह सराहनीय है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का यह कथन ‘सुदामा-चरित’ पर पूर्णतः चारितार्थ होता है—‘‘कवि की भावुकता कथा प्रसंगों के मार्मिक स्थलों की पहचान में
सुदामा-चरित / ३१ निहित है। वहा भावुक कहा जा सकता है जो मार्मिक स्थलों को शब्द चित्रों द्वारा अंकित कर सजीव दृश्य उपस्थित कर दे, जिसे पढ़कर पाठक आत्म-विभोर हो जायँ और उसी भाव में डूबने-उतरने लगें।" कविवर नरोत्तमदास ने मार्मिक स्थलों की पहचान और उन्हें शब्द-चित्रों द्वारा सजीव दृश्यों में उपस्थित करने में अपनी गहन अनुभूति तथा भाव प्रवणता को व्यक्त किया है। उसी से इन मार्मिक स्थलों को पढ़ते समय पाठक आत्म-विभोर हो जाते हैं और उन्हीं भावों में डूबने-उतरने लगते हैं। सुदामा की निर्धनता का वे इतना कारुणिक हृदय- विदारक तथा यथार्थ दृश्य प्रस्तुत करते हैं कि पाठकों का हृदय द्रवित हो उठता है - "कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती। सीत वितीत भयौ सिसियातहि, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती॥ जो जनती न हितू हरि-सौँ, तो काहे को द्वारिका पेलि पठौती। या घर ते कबहूँ न गयौ पिय, टूट्यो तयो अरु फूटी कठौती॥" 'सुदामा-चरित' का दूसरा प्रमुख मार्मिक स्थल श्रीकृष्ण और सुदामा का मार्मिक मिलन है। सुदामा की दयनीय दशा पाठकों के हृदय को जहाँ अत्यधिक द्रवित करती है वहाँ श्रीकृष्ण की उदात्त मैत्री-भावना का दृश्य पाठकों को अलौ- किक आनन्द से आत्मविभोर कर देता है— "ऐसे बेहाल विवाइन सों पग कंटक जाल लगे पुनि जोये। हाय महा दुख पायौ सखा, तुम आये इतै न कितै दिन खोये॥ देखि सुदामा की दीन दसा करुणा करिकै करुणानिधि रोये। पानी परात को हाथ छुऔ नहिं नैनन के जल सों पग धोये॥" कविवर नरोत्तमदास जिस तीसरे मार्मिक स्थल का चयन करते हैं, वह है सुदामा की उस मनः स्थिति का वर्णन जिसमें वह कभी अपनी पत्नी पर और कभी अपने मित्र श्रीकृष्ण की कृपणता पर झुँझलाते हैं— "घर-घर ओढ़त फिरे तनक दही के काज, कहा भयौ जो अब भयौ, हरि को राज समाज।
३२ / सुदामा-चरित हौं आवत नाहीं हुतौ, वाही पठियौ ठलि, कहि हौं धन सों जाइके, अब धन धरौ सकेलि ॥” भाव-वर्णन में ही नहीं, वस्तु-वर्णन में भी कवि कई मर्मस्पर्शी शब्द-चित्र अंकित करता है। वे शब्द-चित्र मुख्यतः द्वारिकापुरी के वैभव और उसके बाद सुदामापुरी के वैभव से सम्बद्ध हैं। श्रीकृष्ण जो अपार वैभव सुदामा को देते हैं, उसे देखकर राजा इन्द्र भी लजा जाते हैं। उसी का एक शब्द-चित्र प्रस्तुत करता हुआ कवि कहता है— कै वह टूटी सी छानी हुती, कहाँ कंचन के सब धाम सुहावत, कै पग में पनही न हुती, कहाँ लै गजराजहु ठाढ़े महावत । भूमि कठोर पै रैन कटै, कहाँ कोमल सेज पै नींद न आवत, कै जुरतौ नहिं कोदों सवाँ, प्रभु के प्रताप ते दाख न भावत ॥” ‘सुदामा-चरित’ का वर्णन कौशल मुख्यतः दो शैलियों में मुखरित हुआ है – वर्णनात्मक शैली और नाटकीय शैली । कथा-प्रसंगों को गतिशीलता प्रदान करने के लिए वर्णनात्मक शैली को और भावपूर्ण मार्मिक स्थलों के लिए नाटकीय शैली को अपनाना कवि अधिक उपयुक्त समझता है। भावपूर्ण स्थलों के चित्रण में कवि का मन विशेष रूप से रमा है और ऐसे स्थल भाव-सम्पदा के अनूठे उदाहरण बन गए हैं। इन स्थलों के कलात्मक सौष्ठव का श्रेय उसकी नाटकीय शैली को दिया जा सकता है। इस शैली के प्रयोग से इस रचना में कौतूहल, रोचकता, प्रभावोत्पादकता तथा मार्मिकता का संचार हुआ है। छन्द-योजना—‘सुदामा-चरित’ में मुख्यतः दोहा, कवित्त, सवैया आदि छन्दों की योजना हुई है। ये छन्द विषय एवं प्रसंग के अनुरूप अपने स्वाभाविक रूप में प्रयुक्त हुए हैं। इन छन्दों में दोहा छन्द का प्रयोग कवि ने वर्णनात्मक प्रसंगों में कथा-विकास को दृष्टि में रखकर किया है। वह कथावस्तु के विविध मोड़ों और आग-पीछे के प्रसंगों को परस्पर जोड़ने के निमित्त इस छन्द के प्रयोग को सर्वाधिक उपयोगी समझता है। कथावृत्त का प्रारम्भ, द्वारिकापुरी में प्रवेश, वहाँ से प्रस्थान और सुदामापुरी में प्रवेश के विभिन्न अवसरों पर यह छन्द विशेषतः प्रयुक्त हुआ है। इस छन्द का सौष्ठव सांकेतिक अभिव्यंजना और
सुदामा-चरित / ३३ कथावस्तु को लघु आकार प्रदान करने में देखा जा सकता है। भावपूर्ण मार्मिक स्थलों की अभिव्यक्ति के निमित्त कवि कवित्त एवं सवैया नामक छन्दों का अधिक प्रयोग करता है। भाव-व्यंजना को उपयुक्त विस्तार देने के लिए इन छन्दों का उपयोग अपेक्षाकृत अधिक समीचीन था। इस रचना के नाटकीय सौष्ठव लाने के लिए सवैया छन्द और परिस्थिति-चित्रण के लिए कवित्त छन्द का प्रयोग भी बहुत उपयुक्त रहा है। वस्तुतः विषय एवं प्रसंग के अनुकूल छन्दों का चयन एवं प्रयोग कवि की सूझ-बूझ का परिचायक है। वह छन्द-शास्त्र से न केवल परिचित है वरन् उसके उपयुक्त उपयोग का भी पारखी है। 'सुदामा-चरित' की छन्द-योजना की कतिपय निजी विशेषताएँ भी उसके महत्त्व को बढ़ाती हैं। कवि ने लय, तुक, यति, गति आदि का प्रयोग कुछ इस प्रकार से किया है कि उसके कवित्व में एक विशिष्ट संगीत, प्रवाह, भावमयता तथा सरसता आ गई है। कवि का छन्द-गठन पर पूर्ण अधिकार है, वह तुक- पूर्ति के लिए न तो शब्दों की अधिक तोड़-मरोड़ करता है और न अनावश्यक शब्दों की भरती करता है। 'सामा', 'मिठौती', 'हठौती' आदि प्रयुक्त तुकें ब्रज- भाषा व्याकरण के अति निकट हैं और छन्द-गठन में उनकी उपयोगिता निर्विवाद है। फलतः इस रचना के छन्दों में पाठकों को भाव-विभोर कर लेने की पर्याप्त क्षमता है। वे अपने संगीत एवं मर्मस्पर्शी भाव-व्यंजना के नाते बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं। पाठक उन्हें बार-बार पढ़ने, कंठस्थ करने तथा उनका रसास्वादन करने में मग्न हो जाता है। सवैया छन्द का एक उत्कृष्ट उदाहरण द्रष्टव्य है - “सीस पगा न झगा तन में प्रभु जानै को आहि बसै केहि ग्रामा। धोती फटी सी लटी दुपटी अरु पायं उपानहु को नहिं सामा ॥ द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक रह्यौ चकि सौं वसुधा अभिरामा। पूछत दीनदयाल को धाम बतावत आपनौ नाम सुदामा ॥” अलंकार-योजना—'सुदामा-चरित' की अलंकार-योजना पूर्णतः स्वाभाविक एवं भावानुकूल है। कवि ने कहीं भी सायास अलंकारों का प्रयोग नहीं किया है; उनका विधान आप-से-आप हो गया है। भाव, लय तथा कथा-प्रसंग के