सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
पृष्ठ 23, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुगम चिकित्सा
१८
ठण्डी, ताकत देने वाली और आँखों को हितकारी है। इसमें खूब धूमना चाहिए। जब चारों ओर की हवा चले तो समझना चाहिए कि कोई चवाई बीमारी फैलेगी। खबरदार हो जाना चाहिए।
भोजन हमारे शरीर को बलवान रखता है और काम करने से जो हमारी ताकत खर्च होती है, वह भोजन से पूरी होती है।
भोजन में तीन चीजें होनी चाहिए, एक पुष्टिकारक, दूसरी चिकनाई, तीसरा नमक। गेहूँ, जौ, चना, मटर, ज्वार, बाजरा, चावल, दाल, तरकारी फल आदि बारी-बारी से खाने चाहिए। अकेले चावल या दाल-रोटी ही न खानी चाहिए। हरी तरकारी भोजन की जरूरी चीजें हैं। फल अधपके खाने चाहिए। दूध, दही, छाछ और ताजा घी भोजन में जरूर रहना चाहिए। सर्दियों के दिनों में गुड़, काजू, अखरोट, मूगफली, बादाम खाने से चदन में चिकनाई और पुष्टि बनी रहती है। फलों में आड़ू, अंगूर, आम, केला, अमरुद और नारंगी बहुत अच्छे हैं। पर बीमारों को अंगूर और अनार ही खाना चाहिए। बच्चों को मिठाई न खिलाकर फल और तरकारी खिलाना चाहिए। चना, मूँग, और मोठ, ज्वार पानी में भिगोकर टोकरे में भरकर एक गीली चोरी से ढक दी जाय, जब वह उपज आवे तो उबाल कर या कच्चा ही खाने से बहुत गुणकारी होता है।
भोजन को पकाने के तीन तरीके हैं। उबालना, भूलना, और तलना। तलना अच्छा नहीं है। तला हुआ भोजन देर में पचता