सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ गुरुदेव पिंड माहि प्राण आइ डार्यो है । सुन्दर कहत गुरुदेव जू कृपालु होइ, फेरि घाट घरि करि मोहि निसतार्यो है ॥१९॥ कोऊ देत पुत्र धन कोऊ दल बल धन, कोऊ देत राज साज देव रिषि मुन्यौ है । कोऊ देत जस मान कोऊ देत रस आन, कोऊ देत विद्या ज्ञान जगत मे गुन्यो है ॥ कोऊ देत रिधि सिधि कोऊ देत नव निधि, कोऊ देत और कछु तातै सीस धुन्यौ है । सुन्दर कहत एक दियौ जिन राम नाम, गुरु सौ उदार कोऊ देख्यो है न सुन्यौ है ॥२०॥ भूमि हू की रेणु की तौ स ख्या कोऊ कहत है, भार हू अठारा द्रुम तिनके जो पात है । मेघन की स ख्या सोऊ रिषिन कही विचार, बू दन की स ख्या तेऊ आइकै बिलात है ॥ तारन की स ख्या सोऊ कही है पुरान माहि, रोमन की स ख्या पुनि जितनेक गात है । सुन्दर जहा लौ जत सबही को आवै अंत, गुरु के अनत गुन कापै कहे जात है ॥२१॥ (१६) गात-शरीर । (२१) रेणु-धल के कण । जन्त-जन्तु, जीव ।