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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ११ गोविंद के कीये जीव जात है रसताल कौ, गुरु उपदेशे सो तो छूटै जम फद त । गोविंद के कीये जीव बस परे कर्मन के, गुरु के निवाजे सो फिरत है स्वच्छंद तै ॥ गोविंद के कीये जीव बूडत भौसागर मे, सुन्दर कहत गुरु काढै दुख द्वंद तै । और हू कहा लौ कछु मुख तै कहै बनाइ, गुरु की तौ महिमा अधिक है गोविंद तै ॥२२॥ चिंतामनि पारस कलपतरु कामधेनु, और हू अनेक निधि वारि वारि नाषिये । जोई कछु देखिये सो सकल विनाशवत, बुद्धि मै विचार करि बहु अभिलाषिये ॥ तातै अव मन वच क्रम करि कर जोरि, सुन्दर कहत सीस मेलि दीन भापिये । बहुत प्रकार तीनो लोक सब मोधे हम, ऐसी कौन भेट गुरुदेव आगे राखिए ॥२३॥ महादेव वामदेव रिषभ कपिलदेव, व्यासदेव शुकदेव जयदेव नामदेव जू । रामानन्द मुग्धानंद कट्टिय अनतानंद, (२२) रसातल-पाताललोक । जमफंद-यम की फाँसी । (२३) मन वच क्रम-मन वाणी कर्म । मोधे-खोज लिये ।

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