भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 37

२८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ आपु ही तै जात अध नरकनि बार बार, अजहु न शक मन माहि अव करि है । दुख कौ समूह अवलोकिकै न त्रास होइ, सुन्दर कहत नर नागपासि परि है ॥२६॥ जग मग पग तजि सजि भजि राम नाम, काम कौ न तन मन घेर घेर मारिये । झूठ मूठ हठ त्यागि जागि भागि सुनि पुनि, गुनि ग्यान आन आन वारि वारि डारिये ॥ गहि ताहि जाहि शेष ईश शीस सुर नर, और बात हेत तात फेरि फेरि जारिये । सुन्दर दरद धोइ धोइ धोइ बार बार, सार सग रग अग हेरि हेरि धारिये ॥३०॥ झूठौ जग ऐन सुन नित्य गुरु बैन देखे, आपने हु नैन तोऊ अध रहै ज्वानी मे । केते राव राजा रक भये रहे चलि गये, मिलि गये धूर माहि आये ते कहानी मं । (२६) जनम-जीवन । सिरानो जाय-बीत रहा है । मीच-मौत । गहित-अविद्या-अज्ञान ग्रस्त । विकरम-विकर्म, पापकर्म । नागपास-संसार का फदा । (३०) जगमग पग-संसारी मार्ग पर चलना । ज्ञान आन ज्ञान ले । आन-और बातें । हेत-प्रेम । दरद-दुख । सार सग-सत्संग । हेरि हेरि-तलाश कर कर ।