सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ [ २७ होइगा हिसाव तब आवैगा न ज्वाव कछु, सुन्दर कहत गुन्हैगार है खुदाइ का ॥२७॥ कर कर आयौ जब घर घर काट्यौ नार, भर भर बाज्यौ ढोल घर घर जान्यौ है । दर दर दौर्यौ जाइ नर नर आगै दीन, बर बर बकत न नेक अलसान्यौ है ॥ सर सर सोधै धन तर तर तोरै पात, जर जर काटत अधिक मोद मान्यौ है । फर फर फूल्यौ फिरै डर डरपै न मूढ, हर हर हसत न सुन्दर सकान्यौ है ।२८।।। जनम सिरानौ जाइ भजन बिमुख शठ, काहे कौ भवन कूप बिन मीच मरि है । ग्रहित अविद्या जानि शुक नलिनी ज्यौ मूढ, करम विकरम करत नहि डरि है । (२७) लोड ता है-भोगता है । औजूद-शरीर । बेमिहर- निर्दय । दोजग-दोजख, नर्क । बलाई का-पापो का । गुन्हैगार-अपराधी । धनी-स्वामी, परमेश्वर । (२८) कर कर आयो-पाप पुण्य करके जन्म लिया । नार-नाभिनात । भर-भर भड भड । दर दर-घर घर के दरवाजे । बर वर-बड वड । सर-सर सोधै-सूत-सूत कर इकट्ठा करे । तर तर-तरड तरड । जर जर-जरड-जरड । मोद-आनद ।