सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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२६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मनहर छंद । करत प्रपंच इनि पंचनि कैं वसि पर्यौ, परदारा रत भै न आनत बुराई कौ । पर धन हर पर जीव की करत घात, मद्य मास षाइ लव लेस न भलाई कौ ॥ होइगो हिसाब तब मुषतैं न आवै ज्वाब, सुन्दर कहत लेषा लेत राई राई कौ । इहा तैं किये बिलास जम की न तोहि त्रास, उहातौ न व्है है कछु राज पोपाबाई कौ ॥२६॥ दुनिया कौ दौडता है औरति कौ लोडता है, औजूद कौ मोडता है बटोही सराइ का । मुरगी कौ मोसता है बकरी कौ रोसता है, गरीबू कौ शोसता है बेमिहर गाइ का ॥ जुलम कौ करता है धनी सौ न डरता है, दोजग कौ भरता है खजाना बलाइ का । (२६) प्रपच-जंजाल । परदारा-पराई स्त्री । भै-भय । घात-हत्या । बिलास-भोग विलास । त्रास-डर । पोपाबाई को राज-पोल का राज्य ।