सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ [ २५ मात पिता सुत भाइ बध्यौ, जुवती के कहे कहा कान करे है । चोरी करै बटमारी करै किरषी बनजी कर पेट भरै है ॥ शीत सहै सिर घाम सहै, कहि सुन्दर सो रन माहि मरै है । वाध रह्यौ ममता सब सौ नर, ताहि तैं बाध्यौ ई बाँध्यो फिरै है ॥२४॥ तू ठगि कै धन और कौ ल्यावत, तेरेऊ तौ घर औरई फोरै । आगि लगै सबही जरि जाइ सु, तू दमरी दमरी कर जोरै ॥ हाकिम कौ डर नाहि न सूझत, सुन्दर एक हि वार निचोरै । तू षरचै नहिं आपु न षाइ सु, “तेरी ही चातुरी तोहि ले बोरै” ॥२५॥ (२४) जुवती-युवती । किरषी-खेती । बनजी-व्यापार । (२५) चातुरी-चतुराई ।