सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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२४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ प्रात गये रजनी फिर आवत, सुन्दर यौ नित भार वही है ! और तो लक्षण आइ मिलै सब, एक कमी सिर शृङ्ग नही है ॥२१॥ प्रेत भयौ कि पिशाच भयौ कि, निशाचर सौ जितही तित डोलै । तूं अपनी सुधि भूलि गयौ, मुख तै कछु और को और ई बोलै ॥ भोई उपाड करै जु मरै पचि, बधन तौ कवहू नही खोलै । सुन्दर जा तन मैं हरि पावत, सो तन नाश कियौ मति भोलै ॥२२॥ पेट ते बाहिर होत हि बालक, आड कें मात पयोधर पीनीं । मोह बढ़यौ दिन ही दिन औग, तरुन्न भयौ त्रिय के रस भीनीं ॥ पुत्र पडन बढ्यौ परिवार मु, ऐसो ही भाति गये पन तीनों । सुन्दर राम कौ नाम विसारिन्, आपुहि आपकौ वधन कीनीं ॥२३॥ (२३) पयोधर-स्तन । तरुन्न-तरुण, जवान । त्रिय- स्त्री । पडन पौत्र, पोता । पन तीनों-तीनों अवस्था ।