भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ २३ भूलि गयौ विषया सुख मैं गठ, लालच लागि रह्यौ अति थोरै ॥ ज्यौ कोऊ कचन छार मिलावत, लेकरि पाथर सौ नग फोरै । सुन्दर या नर देह अमोलिक, तीर लगी नवका कत वोरै ॥१६॥ देषित के नर सोभित हैं जैसे, आहि अनूपम केरि कौ खंभा । भीतर तौ कुछ सार नही पुनि, ऊपर छीलक अवर दभा ॥ बोलत है पर नाही कछू सुधि, ज्यौ बबयारि तैं बाजत कुम्भा । रूसि रहै कपि ज्यौं छिन माहिमु, याहि तै सुन्दर होत अचभा ॥२०॥ देषत के नर दीसत हैं पर, लक्षन तौ पसु के सबही है । बोलत चालत पीवत खात सु, वै घर वै बन जात सही है ॥ (१६) छार-राख । नग-हीरा मोती । कत-क्यो । वोरै-डुबाता है । (२०) केरि-केला । अवर-दभा-आडवर । बवियारि- फूंक । कुम्भा-घडा ।