सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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२२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ पाइ अमोलक देह इहै नर, क्यौं न बिचार करै दिल अन्दर । कामहु क्रोधहु लोभहु मोह हु, लूटत है दस हू दिसि दुर्दर ॥ तूं अब बाछत है सुरलोक हि, कालहु पाड परै सु पुरदर । छाडि कुबुद्धि सुबुद्धि हृदै धरि, "आतमराम भजै किन सुन्दर" ॥१७॥ इन्द्रिय के सुख मानत हैं शठ, याहित तै बहुते दुख पावै । ज्यौं जल मैं झष मास हि लीलत, स्वाद बध्यो जल बाहरि आवै ॥ ज्यौं कपि मूठि न छाडत है, रसना बस वदि पर्यो बिललावै । सुन्दर बर्षा पहिलै न सभारत, "जो गुर पाट सु कान विंधावै" ॥ १८ ॥ कौन कुबुद्धि भई घट अंतर, तू अपने प्रभु सों मन चोरै । (१७) दुर्दर-द्वन्द्व । पुरंदर-इन्द्र । किन-क्यों नहीं । (१८) झष-मछली। लीलत-खाने के लिए । गुर-गुरु ।