सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 10, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें( २ )
इसलिए मैं यह उचित समझता हूँ कि इन दोनों संहिताओं का विशेष करके उनके सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक उपयुक्त अंशों का अध्ययन केवल आयुर्वेद के विद्यालयों तक ही सीमित न रख करके इतर चिकित्सा पद्धतियों के विद्यालयों में भी जारी करना चाहिये। इससे वहाँ के विद्यार्थियों और डाक्टरों को अपना शास्त्र पढ़ने और पढ़ाने में अधिक सहायता मिलेगी तथा केवल अपना ही शास्त्र पढ़ने-पढ़ाने के कारण जो अवैज्ञानिक, अनुदार तथा अव्यापक दृष्टि उत्पन्न होती है वह दूर होकर वे जनता के सच्चे सेवक बनेंगे।
आयुर्वेद की ये संहिताएँ तथा उनकी टीकाएँ संस्कृत में होने के कारण संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान इनके अध्ययनार्थ आवश्यक होता है। परन्तु आजकल आयुर्वेद महाविद्यालयों में भी जहाँ पर प्रवेश के लिए संस्कृत-प्रावीण्य की अत्यन्त आवश्यकता होती है, संस्कृत की अपेक्षा अंग्रेजी को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा। परिणाम यह हुआ कि अच्छे संस्कृतज्ञ विद्यार्थियों की संख्या घटने लगी। इतर वैद्यक महाविद्यालयों में भरती के लिये संस्कृत की आवश्यकता ही न होने के कारण वहाँ पर संस्कृतज्ञ विद्यार्थी नगण्य होते हैं। ऐसी अवस्था में आयुर्वेद की प्रतिष्ठा बढ़ाने की दृष्टि से तथा उसके दिक्कलावाधित सुन्दर सिद्धान्तों के द्वारा सब पद्धतियों के चिकित्सकों को चारित्र्य और शील की शिक्षा प्रदान करने की दृष्टि से इन संहिताओं के प्रचलित भाषाओं में अच्छे अच्छे अनुवाद करके प्रकाशित करना प्रत्येक आयुर्वेद प्रेमी का एक परम कर्तव्य हो जाता है।
प्राचीन संहिताओं के अनुवाद अनेक पद्धतियों से किये जाते हैं। प्रथम पद्धति में मूल-संहिता न देकर केवल उसका अनुवाद सरल भाषा में दिया जाता है। इस पद्धति के अनुवाद शास्त्राध्ययन करनेवालों की दृष्टि से अच्छे नहीं हो सकते हैं, परन्तु संहिताओं का भावार्थ मालूम करने की दृष्टि से पर्याप्त होने के कारण सामान्य जनता को शास्त्र का परिचय कराने के लिए उपयोगी होते हैं। दूसरी पद्धति में ऊपर मूलसंहिता देकर उसके नीचे उसका सरल भाषानुवाद दिया जाता है। इस पद्धति के अनुवाद सामान्य जनता के लिए जितने उपयोगी होते हैं उतने ही शास्त्रज्ञासु के लिए भी उपकारक होते हैं, क्योंकि इसमें पाठक के सामने मूलसंहिता भी रहती है और वह अनुवाद के अर्थ की यथार्थता स्वयं देख सकता है। तीसरी पद्धति में मूल और उसके अनुवाद के अतिरिक्त मूल की टीकोपटीकाएँ तथा उनके भी सरल अनुवाद दिये हुए रहते हैं। सामान्य जनता के लिए ये अनुवाद विशेष उपयोगी नहीं होते, परन्तु शास्त्राध्ययन की दृष्टि से दूसरी पद्धति के अनुवादों को अपेक्षा अधिक उपयोगी होते हैं। इसका कारण यह है कि टीकोपटीकाओं में मूल के अतिरिक्त शास्त्र की काफों चर्चा रहती है, जिससे शास्त्र का आकलन होने में सहायता होती है। चतुर्थ पद्धति में मूल संहिता और उसके सरल अनुवाद के पश्चात् अनुवादक स्वयं अपना वक्तव्य प्रकट करता है। इसमें कठिन तथा गूढ़ शब्दों और भावों पर उचित प्रकाश डाला जाता है, मतमतान्तरों का उल्लेख किया जाता है, जहाँ दोनों का समन्वय हो सकता है वहाँ समन्वय करने की चेष्टा की जाती है, जहाँ पर वास्तविक विरोध होता है वहाँ पर पक्षपातविरहित होकर विरोध प्रदर्शित किया जाता है, प्राचीन वृट्टियों की पूर्ति आधुनिक ज्ञान विज्ञान से की जाती है और इसके लिए श्रुति-स्मृति-पुराण उपनिषद्-इतिहास इत्यादि प्राचीन शास्त्र उनकी टीकाएँ, आधुनिक पाश्चात्य तथा पौर्वात्य विद्वानों के लेख, ग्रन्थ, संशोध-नात्मक टिप्पणी इत्यादि का उचित परामर्श लिया जाता है। संक्षेप में मूल का उचित अर्थ करने के लिए प्राचीन तथा अर्वाचीन सब साधन सामग्री रखकर दोनों का सुन्दर सम्मेलन करने का प्रयत्न किया जाता है। अनुवाद को यह पद्धति सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि इससे मूल का आकलन इतर पद्धतियों को अपेक्षा आसानो से होता है और इसके अतिरिक्त जहाँ मतभेद का अवसर होता है वहाँ पर सामने रखी हुई सब साधन सामग्री के आधार पर पाठक स्वयं अपना मत बना सकता है।
सुश्रुतसंहिता के आज तक अनेक अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें निर्देश करने योग्य प्रथम पद्धति का अनुवाद अंग्रेजी भाषा में है। दूसरी पद्धति के अनेक अनुवाद हिन्दी तथा इतर सब भारतीय भाषाओं में हुए हैं। तीसरी पद्धति का एक भी अनुवाद नहीं हुआ है। इस प्रकार का सुश्रुत का एकाध अनुवाद होना जरूरी है। चौथी पद्धति के अनुवाद अधिक उपयोगी होने के कारण उस प्रकार के जितने भी अनुवाद प्रकाशित हो सकते हैं उतने होने चाहिए। मैंने इस पद्धति का 'आयुर्वेदरहस्यदीपिका' नामक सुश्रुत का अनुवाद करने का बृहत्पयास किया था और उसके परिणाम स्वरूप सूत्र-निदान-शारीर के दो विभाग प्रकाशित हो चुके थे। परन्तु अभ्यास में उसको पूरा न कर सका और मेरा वह प्रयास अपूर्ण ही रह गया।