सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता के विषय में
वर्तमान समय में जो सुश्रुतसंहिता उपलब्ध है, उस पर केवल श्रीडल्हणाचार्य की टीका मिलती है। उस टीका में उन्होंने अपना सब परिचय दिया है। उसी में उन्होंने जेज्जट, गयदास, भास्कर आदि विद्वानों की टीका पंजिका का नाम कीर्तन किया है, स्थान-स्थान पर दूसरे आचार्यों के पाठ भी दिये हैं।
इसी प्रसंग में उन्होंने प्रतिसंस्कृता रूप में नागार्जुन का नाम भी दिया है; यथा:—“यत्र तत्र परोक्षे लिट् प्रयोगस्तत्र तत्रैव प्रतिसंस्कृत् सूत्रं ज्ञातव्यमिति। प्रतिसंस्कृत्ताऽपीह नागार्जुन एव।”
बस, इस एक स्थान के सिवाय और प्रमाण नागार्जुन के प्रतिसंस्कृता होने का नहीं मिलता। साथ ही नागार्जुन बौद्ध था। सब इतिहासकार इस बात को बिना विरोध के मानते हैं। इसके विपरीत सुश्रुत में स्थान स्थान पर ब्राह्मणों के लिये विशेष उपचार, ब्रह्मभोज आदि का वर्णन मिलता है।
ब्रह्मभोज की प्रथा आज भी इस देश में है, किसी भी पवित्र कार्य में वास्तु संस्कार या कोई मांगलिक कार्य होने पर ब्राह्मणों को भोज दिया जाता है, इसी प्रकार सुश्रुत में भी वर्णित है।
“छत्रं धारयेद् बालव्यजनैश्च वीजयेत्, ब्राह्मणसहस्रं भोजयेत् ॥” चि० अ० ४।२६
चरक में भी छत्र धारण, पंखा करना, उत्तम बस्तियों के सिद्ध करने में है, परन्तु वहाँ ब्रह्मभोज नहीं है। इसके सिवाय सुश्रुत में ब्राह्मण के लिये दूसरे वर्णों से चिकित्सा में तथा दूसरे कार्यों में भेद बताया है।
यथा—
(१) ब्राह्मणो वा शिलोऽञ्चवृत्तिभूत्वा ब्रह्मरथमुद्भरेत्, कृषेत् सततमितरः, खनेद्वा कूपम् ॥
(२) ‘तत्रारिष्टं ब्राह्मणश्चित्रियवेश्यशुद्राणां श्वेततरूपीतकृष्णेषु भूमिप्रदेशेषु बिल्वन्यग्रोधतिन्दुकभरुलातकनिर्मितसर्वागारं यथासंख्यं तन्मयपर्यङ्कम् ॥’ शा० अ० १०।
चरक में इस प्रकार का भेद चिकित्सा में नहीं है। वहाँ पर जातिस्त्रीय विधि में आसन का भेद वर्ण के अनुसार अवश्य है, यह प्रथा स्मृति काल से चालू है, परन्तु वर्णभेद से भूमिभेद नहीं है, अपि तु इसके विपरीत चरक में—
विद्यासमाप्तौ भिषजस्तृतीया जातिरुच्यते। अस्तुते वैद्यशब्दं हि न वैद्यः पूर्वजन्मना। विद्यासमाप्तौ ब्राह्मं वा सर्वस्वार्थमथापि वा, ध्रुवमाविशति ज्ञानात्समाद् वैद्यक्षिजः स्मृतः ॥
(*त्रिजः के स्थान पर द्विजः भी पाठ है)। चरक चि० अ० १।४।५२-५३
इससे स्पष्ट है कि चरक के पीछे सुश्रुत बना है, और सुश्रुत आज कल के रीतिरिवाजों से अधिक परिचित था।
सुश्रुत में बौद्ध समय के शब्दों का भी उल्लेख है, यथा—
विशिखा—“अथातो विशिखानुप्रवेशनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः।” विशिखा का अर्थ कर्म मार्ग या रथा दिया है। परन्तु जैन ग्रन्थों में (उत्तराध्ययनसूत्र में चूर्णिटीका) विशिखा शब्द मल्ल लोगों को आराम करने के स्थान के लिये आया है। कुश्ती करते-करते जब मल्ल थक जाता है, तब वह आराम लेने के लिये जिस स्थान पर जाता है, उस स्थान को विशिखा कहते हैं। आजकल भी बौक्स में ऐसा स्थान निश्चित होता है। वहाँ पर खड़े हुये व्यक्ति पर चोट नहीं की जा सकती। उत्तराध्ययन सूत्र में यह विशिखा शब्द दो मल्लों की कुश्ती के प्रसंग में ही आया है।१
१ तृतीया के स्थान पर द्वितीया भी पाठ है।
२ चरक में भी विशिखा शब्द है—वहाँ पर रथा बर्थ ठोक है, परन्तु सुश्रुत में कर्म मार्ग या घर बर्थ ठोक है।