भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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भिल्लुसंधाटी१—यह दूसरा शब्द है। यथा—“जोगीं च भिल्लुसंधाटी धूपनायोपकल्पयेत् ॥” पुरानी भिल्लुसंधाटी (कन्या गुदडिया) का धुवाँ दे। जिन वस्तुओं के साथ इसको पढ़ा है उनको देख लीजिये, यथा—

“पुरीषं कौकुरुटं केशाश्चर्मसर्पत्वचं तथा” मुरे की बीठ, बाल, खाल, सर्प की केंचुली इनके साथ जोगी वस्त्र का धुवाँ देना कहा है। ये सब चीजें घृणित-निन्दित हैं। इन निन्दित वस्तुओं के साथ भिल्लुसंधाटी को भी गिना है, इससे स्पष्ट है कि यह कोई पवित्र वस्तु नहीं, अपितु घृणित वस्तु है। जब कि प्रब्राजित साधु सबसे बड़े—मान्य-पूज्य माने हैं। इसलिये टीकाकारों ने भिल्लुसंधाटी से शाक्यभिल्लु बौद्ध का ग्रहण किया है (यथा—भिल्लुरव शाक्यभिल्लुः बौद्धाख्यः—डल्हण)। नहीं तो अपने पूज्य आचार्य को प्रत्येक वस्तु को शिष्य महत्त्व की मानते हैं, जैसे लोग गांधी जी के चप्पल, फाउन्टेनपेन, उनके वस्त्र पूज्य समझते हैं। परन्तु सुश्रुत के समय बौद्धभिल्लु घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे, इसी से उनका जोगी वस्त्र घृणित मानकर घृणित वस्तुओं के साथ धूप कार्य में लिया गया है। ब्राह्मणों का और बौद्धों का परस्पर विरोध रहा, इसका साक्षी इतिहास आज भी है।

इसलिये वर्तमान सुश्रुत बौद्धकाल के उदय काल के पीछे जब पुनः पुष्यसिन्ध ने ब्राह्मणों का राज्य स्थापित किया, तब का बना होना चाहिये। चूँकि इसमें ब्राह्मणों की प्रधानता है।

इसके सिवाय ज्वर की चिकित्सा में रोगी को सम्पूर्ण विश्राम देने का इस सुश्रुत में विशेष विधान है। टाई फाईड रोगी को बिल्कुल हिलने-जुलने से मना करते हैं, सुश्रुत भी ऐसा ही बताते हैं, यथा—“ज्वरे प्रमोहो भवति स्वल्पैरप्यवचेष्टितैः। निषण्णं भोजयेत्समात् मूत्रोच्चारो च कारयेत् ॥ निषण्णम्—शय्याथामेव आसीनमुपविष्टम् ॥”

चरक में इस प्रकार का स्पष्ट वचन रोगी के लिये नहीं मिलता। बौद्धकाल में आयुर्वेद की उन्नति विशेष रूप में हुई। तक्षशिला का विश्वविद्यालय आयुर्वेद के लिये प्रसिद्ध था। जीवक ने यहाँ शिक्षा ली। जीवक—बौद्धग्रन्थों में प्रसिद्ध चिकित्सक रहा२। इसलिये सुश्रुत में ज्वर के इस मुख्य अङ्ग को स्पष्ट किया है। ज्वर में—विश्राम मुख्य वस्तु है।

इन सबके सिवाय उत्तरकुरु शब्द का सुश्रुत में आना है। यह उत्तरकुरु शब्द सुश्रुत के सिवाय और किसी आयुर्वेद-ग्रन्थ में नहीं है।

“वाह्निकाः शाद्वलाश्रीनाः मूलीका यवनाः शकाः। मांसगोधूममाध्वीकशन्त्रवैश्रनारोचिताः ॥

मत्स्यसात्यसत्था प्रान्याः क्षीरसात्यश्च सैन्धवाः। अश्मकावन्तिकानां तु तैलाम्लं सात्यमुच्यते ॥

कन्दमूलफलं सात्यं विद्यानमल्यवासिनाम्। सात्यं दक्षिणतः पेया मन्यश्चोत्तरपश्चिमे ॥

मध्यदेशे भवेत्सात्यं यवगोधूमगोरसाः ॥” चरक चि० अ० ३०-३१६-३१६ ॥

ये देश भारत के हैं, या उसके पास हैं। इनमें उत्तरकुरु का वर्णन नहीं है। सुश्रुत में उत्तरकुरु का वर्णन ऐसे स्थान पर है, जहाँ पर कि जाना सुगम नहीं, वहाँ पर रसायनसेवी ही जा सकता है, यथा—

“क्षीरोदं शकषदनमुत्तरांश्च कुरुनपि। यत्रेच्छति स गन्तुं वा तत्राप्रतिहता गतिः ॥” सु० चि० अ० २६-१७

उत्तरकुरु शब्द महाभारत में भी नहीं आया, परन्तु किरातार्जुनीय में अर्जुन की विजय वर्णन में आया है, यथा—

विजित्य यः प्राञ्चमयन्च्छदुत्तरान् कुरुनकुप्यं वसु वासवोपमः।

सवल्कवासिंसि तवाधुना हरन् करोति मन्युं न कथं धनञ्जयः ॥भारवि

अर्जुन ने उत्तरकुरुओं को जीतकर बहुत सा सोना युधिष्ठिर को लाकर दिया था।

यह उत्तरकुरु—शकषदन—स्वर्ग के बराबर का स्थान है। प्राचीनकाल में जब-जब भी रावण या किसी राजा को (रघु आदि को) धन की जरूरत हुई, उन्होंने स्वर्गपर चढ़ाई की—ऐसी कयायें इस भारत देश में बहुत सी हैं। कुछ भी हो उत्तरकुरु स्थान-स्वर्ग के समान साधारण मनुष्यों से अगम्य था। उत्तरकुरु को वर्तमान ऐतिहासिक “थ्यन शान” कहते हैं। यह चीनी शब्द है, जिसका अर्थ देवताओं का पहाड़ है। जो ठीक भी

१ संधाटी—बौद्ध साधुओं का कटि से ऊपर का उत्तरीय वस्त्र है।

२ मेरा शल्यतंत्र इस विषय में सहायक होगा।