सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
( ७ )
भिल्लुसंधाटी१—यह दूसरा शब्द है। यथा—“जोगीं च भिल्लुसंधाटी धूपनायोपकल्पयेत् ॥” पुरानी भिल्लुसंधाटी (कन्या गुदडिया) का धुवाँ दे। जिन वस्तुओं के साथ इसको पढ़ा है उनको देख लीजिये, यथा—
“पुरीषं कौकुरुटं केशाश्चर्मसर्पत्वचं तथा” मुरे की बीठ, बाल, खाल, सर्प की केंचुली इनके साथ जोगी वस्त्र का धुवाँ देना कहा है। ये सब चीजें घृणित-निन्दित हैं। इन निन्दित वस्तुओं के साथ भिल्लुसंधाटी को भी गिना है, इससे स्पष्ट है कि यह कोई पवित्र वस्तु नहीं, अपितु घृणित वस्तु है। जब कि प्रब्राजित साधु सबसे बड़े—मान्य-पूज्य माने हैं। इसलिये टीकाकारों ने भिल्लुसंधाटी से शाक्यभिल्लु बौद्ध का ग्रहण किया है (यथा—भिल्लुरव शाक्यभिल्लुः बौद्धाख्यः—डल्हण)। नहीं तो अपने पूज्य आचार्य को प्रत्येक वस्तु को शिष्य महत्त्व की मानते हैं, जैसे लोग गांधी जी के चप्पल, फाउन्टेनपेन, उनके वस्त्र पूज्य समझते हैं। परन्तु सुश्रुत के समय बौद्धभिल्लु घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे, इसी से उनका जोगी वस्त्र घृणित मानकर घृणित वस्तुओं के साथ धूप कार्य में लिया गया है। ब्राह्मणों का और बौद्धों का परस्पर विरोध रहा, इसका साक्षी इतिहास आज भी है।
इसलिये वर्तमान सुश्रुत बौद्धकाल के उदय काल के पीछे जब पुनः पुष्यसिन्ध ने ब्राह्मणों का राज्य स्थापित किया, तब का बना होना चाहिये। चूँकि इसमें ब्राह्मणों की प्रधानता है।
इसके सिवाय ज्वर की चिकित्सा में रोगी को सम्पूर्ण विश्राम देने का इस सुश्रुत में विशेष विधान है। टाई फाईड रोगी को बिल्कुल हिलने-जुलने से मना करते हैं, सुश्रुत भी ऐसा ही बताते हैं, यथा—“ज्वरे प्रमोहो भवति स्वल्पैरप्यवचेष्टितैः। निषण्णं भोजयेत्समात् मूत्रोच्चारो च कारयेत् ॥ निषण्णम्—शय्याथामेव आसीनमुपविष्टम् ॥”
चरक में इस प्रकार का स्पष्ट वचन रोगी के लिये नहीं मिलता। बौद्धकाल में आयुर्वेद की उन्नति विशेष रूप में हुई। तक्षशिला का विश्वविद्यालय आयुर्वेद के लिये प्रसिद्ध था। जीवक ने यहाँ शिक्षा ली। जीवक—बौद्धग्रन्थों में प्रसिद्ध चिकित्सक रहा२। इसलिये सुश्रुत में ज्वर के इस मुख्य अङ्ग को स्पष्ट किया है। ज्वर में—विश्राम मुख्य वस्तु है।
इन सबके सिवाय उत्तरकुरु शब्द का सुश्रुत में आना है। यह उत्तरकुरु शब्द सुश्रुत के सिवाय और किसी आयुर्वेद-ग्रन्थ में नहीं है।
“वाह्निकाः शाद्वलाश्रीनाः मूलीका यवनाः शकाः। मांसगोधूममाध्वीकशन्त्रवैश्रनारोचिताः ॥
मत्स्यसात्यसत्था प्रान्याः क्षीरसात्यश्च सैन्धवाः। अश्मकावन्तिकानां तु तैलाम्लं सात्यमुच्यते ॥
कन्दमूलफलं सात्यं विद्यानमल्यवासिनाम्। सात्यं दक्षिणतः पेया मन्यश्चोत्तरपश्चिमे ॥
मध्यदेशे भवेत्सात्यं यवगोधूमगोरसाः ॥” चरक चि० अ० ३०-३१६-३१६ ॥
ये देश भारत के हैं, या उसके पास हैं। इनमें उत्तरकुरु का वर्णन नहीं है। सुश्रुत में उत्तरकुरु का वर्णन ऐसे स्थान पर है, जहाँ पर कि जाना सुगम नहीं, वहाँ पर रसायनसेवी ही जा सकता है, यथा—
“क्षीरोदं शकषदनमुत्तरांश्च कुरुनपि। यत्रेच्छति स गन्तुं वा तत्राप्रतिहता गतिः ॥” सु० चि० अ० २६-१७
उत्तरकुरु शब्द महाभारत में भी नहीं आया, परन्तु किरातार्जुनीय में अर्जुन की विजय वर्णन में आया है, यथा—
विजित्य यः प्राञ्चमयन्च्छदुत्तरान् कुरुनकुप्यं वसु वासवोपमः।
सवल्कवासिंसि तवाधुना हरन् करोति मन्युं न कथं धनञ्जयः ॥भारवि
अर्जुन ने उत्तरकुरुओं को जीतकर बहुत सा सोना युधिष्ठिर को लाकर दिया था।
यह उत्तरकुरु—शकषदन—स्वर्ग के बराबर का स्थान है। प्राचीनकाल में जब-जब भी रावण या किसी राजा को (रघु आदि को) धन की जरूरत हुई, उन्होंने स्वर्गपर चढ़ाई की—ऐसी कयायें इस भारत देश में बहुत सी हैं। कुछ भी हो उत्तरकुरु स्थान-स्वर्ग के समान साधारण मनुष्यों से अगम्य था। उत्तरकुरु को वर्तमान ऐतिहासिक “थ्यन शान” कहते हैं। यह चीनी शब्द है, जिसका अर्थ देवताओं का पहाड़ है। जो ठीक भी
१ संधाटी—बौद्ध साधुओं का कटि से ऊपर का उत्तरीय वस्त्र है।
२ मेरा शल्यतंत्र इस विषय में सहायक होगा।
( ८ )
लगता है, इसका स्थान मध्य एशिया में मानते हैं। जब कि हम लोग स्वर्ग-त्रिविष्टप को वर्तमान तिब्बत कहते हैं। इसलिये उत्तरकुश-वर्तमान तिब्बत के पास का ध्यान शान पर्वत ही हो तो इसमें कोई आपत्ति नहीं।
इन सब से अधिक वर्तमान सुश्रुत में राम-कृष्ण का नाम भी आता है। राम और कृष्ण इस देशवासियों के पूज्य हैं। उनका सुश्रुत में नाम कथन होना—इसको ब्राह्मण काल का सिद्ध करने में प्रबल युक्ति है। यथा—
“महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवामपि। तपसा तेजसा वाऽपि प्रशाम्यध्वं शिवाय वै ॥ सु० चि० अ० ३०।२७
राम, कृष्ण का नाम होना, उत्तरकुश कथन, विशिखा, भिल्लुसंघाटी शब्दों का आना, ब्रह्मभोज आदि बातों का वर्णन—सुश्रुत संहिता को ब्राह्मण काल का सिद्ध करने में पर्याप्त है। साथ ही इसका संस्कृत्ता नागार्जुन-बौद्ध हो, इसमें सन्देह उत्पन्न करता है। बौद्ध संस्कृत्ता-बौद्धों के लिये एक भी प्रतिपादक पंक्ति या उसकी झलक किसी रूप में न देवे, यह मुश्किल है, खासकर जब हम देखते हैं, कि अहिंसा के कारण हमारा शल्यशास्त्र (सर्जरी) पर्याप्त अधोगति में उतरा है, उसमें शल्यशास्त्र के इस प्रधान ग्रंथ का संस्कृत्ता बौद्ध हो, इसके मानने में सन्देह रहता है। यदि संस्कृत्ता नागार्जुन है तो वह बौद्ध नहीं था, और यदि बौद्ध नागार्जुन के सिवाय दूसरा कोई नागार्जुन नहीं मिलता तो इस सुश्रुत का प्रतिसंस्कृत्ता नागार्जुन नहीं है, कोई दूसरा होगा।
इसलिये डल्हन के वचन पर आँखें बन्द करके बैठने में सन्देह रहता है।
वर्तमान सुश्रुत में चरक संहिता के वाक्य बहुत से एक जैसे ही आते हैं। यथा—
सुश्रुत में
(१) मुद्गान्मसुरांश्रणकान् कुलथान् समकुष्ठकान् सु० चि० अ० ३६।१५०
(२) गुरुकावस्थिरावूरु न स्वाविव च मन्यते ॥
(३) गोधूमवेणुयवानुपयुञ्जति।
(४) मधु मधुरमामलकरसेन हरिद्रायुतं,
(५) स्थितं दशाहत्रयमेतदञ्जनम् कृष्णोरगास्यै कुशसंप्रवेष्टिते।
तन्मालतीकोरकसैनधवायुतं
सदाऽञ्जनं स्यात् तिमिरेऽथ रागिणे ॥
(६) अहोरात्रे सततकौ द्वौ कालावनुवर्त्तते।
अन्येद्युष्कस्त्वहोरात्रादेककालं प्रवर्त्तते ॥
(७) मिथ्याचारेण यः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च।
जायन्ते बीजदोषान्च देवान्च श्रृणुताः पुष्क ॥
उ० अ० ३८।५
(८) वातिकं बस्तिमिश्रापि पैत्तिकं तु विरेचनैः।
कफजं वमनैर्ध्यानपस्मारमुपाचरेत् ॥
(९) आनद्यते यस्य विघ्न्यते च प्रकिलद्यते शुष्यति
चापि नासा। न वेत्ति यो गन्धरसांश्च जन्तुः जुष्टं व्यवस्ये- तमपीनसेन ॥ सु० अ० २२।६
चरक में
(१) मुद्गान्मसुरांश्रणकान् कुलथान् समकुष्ठकान्। चरक० चि० अ० ३।१६
(२) अन्यनेयौ हि संमग्नावूरुपादौ च मन्यते ॥
(३) देयास्तथा वेणुयवा यवानां कल्पेन गोधूममयाश्च मद्याः ॥
(४) क्षौद्रेण युक्तामयवा हरिद्रां पिबेद् रसेनामलकीफ- लानाम्।
(५) वदने कृष्णसर्पस्य निहितं भासमञ्जनम्।
ततस्तस्मात्समुद्भूत्य सुशुष्कं चूर्णयैद् बुधः ॥
सुमनःकोरकैः शुष्कैरधीशैः सैन्यवेन च।
एतन्नेत्राञ्जनं कार्यं तिमिरन्मनुत्तमम् ॥
(६) अहोरात्रे सततकौ द्वौ कालावनुवर्त्तते ॥
चि० अ० ३।६३
(७) मिथ्याचारेण ताः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च।
जायन्ते बीजदोषान्च देवान्च श्रृणु ताः पुष्क ॥
चि० अ० १३०
(८) वातिकं बस्तिभृषिष्ठैः पैत्तां प्रायो विरेचनैः।
शलैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत् ॥
(९) आनद्यते यस्य विघ्न्यते च प्रकिलद्यते धूप्यति
चापि नासा। न वेत्ति यो गन्धरसांश्च जन्तुः जुष्टं व्यवस्येतमपीनसेन ॥ चरक चि० अ० २६।११४
अत्रिदेव
१ ‘पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थांयामसंज्ञायाम्’ पाणिनि के इस सूत्र को व्याख्या में ‘उत्तराः कुशरः’ यह उदाहरण है। इससे स्पष्ट है कि पाणिनि से पूर्व उत्तरकुश शब्द प्रसिद्ध था।
* सुश्रुतविषयानुक्रमणिका *
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| सूत्रस्थान | २ वारीरिक रोग ✓ | ६ | पांचों स्थानों के अध्यायों की संख्या | ११ | |
| प्रथमोऽध्यायः | ३ मानसिक रोग ✓ | ६ | सूत्रस्थान के अध्यायों के नाम | ११ | |
| वेदोत्पत्ति अध्याय की व्याख्या | १ | ४ स्वाभाविक रोग ✓ | ६ | निदानस्थान | ११ |
| औपधेनव आदि ऋषियोंका धन्वन्तरि भगवान् के पास आयुर्वेद-अध्ययन के लिये आना | १ | रोगों का आश्रय ✓ | ६ | शारीरस्थान | १२ |
| धन्वन्तरि भगवान् द्वारा औपधेनव आदि ऋषियों का स्वागत | २ | रोगों का निग्रह ✓ | ७ | चिकित्सास्थान | १२ |
| आयुर्वेद अथर्व वेद का उपांग है | २ | रोगों का संशोधन ✓ | ७ | कल्पस्थान | १३ |
| आयुर्वेद के शल्य आदि ८ अङ्ग | ३ | संशमन के दो प्रकार ✓ | ७ | उत्तरस्थान | १३ |
| १ शल्य का लक्षण | ३ | चार प्रकार का आहार आचार | ७ | शालाक्यतंत्र | १३ |
| २ शालाक्य का लक्षण | ३ | औषधियों के दो प्रकार | ७ | कुमारतंत्र | १३ |
| ३ कायचिकित्सा का लक्षण | ३ | स्थावर औषधियों के चार प्रकार | ७ | कायचिकित्सा | १३ |
| ४ भूतविद्या का लक्षण | ३ | जंगम औषधियों के चार प्रकार | ७ | भूतविद्या | १३ |
| ५ कौमारभृत्य का लक्षण | ३ | स्थावर औषधियों के चिकित्सा उपयोगी अवयव | ७ | तन्त्रभूषण | १४ |
| ६ अगदतंत्र का लक्षण | ३ | जंगम औषधियों के चिकित्सा उपयोगी अवयव | ७ | उत्तरतंत्र के नाम का कारण | १४ |
| ७ रसायनतंत्र का लक्षण | ३ | पार्थिव औषधियां | ८ | आयुर्वेद के आठ अङ्ग | १४ |
| ८ वाजीकरण का लक्षण | ३ | कालकृत औषधनिरूपण | ८ | वैद्यों का राजा से पूजित होने का कारण | १४ |
| शल्यशान को मुख्य रखते हुए सारे आयुर्वेद के उपदेश के लिये प्रार्थना | ४ | कालकृत औषधप्रयोजन | ८ | वैद्यों का राजा से वध किये जाने का कारण | १४ |
| औपधेनव आदि का सुश्रुत को प्रश्न करने का अधिकारादेश | ४ | शारीरिक रोगों के प्रकोप तथा शान्ति के कारण | ८ | शास्त्र को न जाननेवाला वैद्य | १४ |
| आयुर्वेदशास्त्र का प्रयोजन ✓ | ४ | आगन्तुक रोगों के दो प्रकार | ८ | आयुर्वेद किस प्रकार पढ़ना चाहिये | १५ |
| आयुर्वेद निरुक्ति ✓ | ४ | पुरुष, व्याधि, औषध, क्रियाकाल की संक्षिप्त व्याख्या | ९ | पाठ करने की विधि | १५ |
| शल्यतंत्र का प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से अविरोध | ५ | चिकित्सा शास्त्र का बीज | ९ | अध्ययन के समय शिष्य का कर्तव्य | १५ |
| शल्यतंत्र का आदि रूप | ५ | सुश्रुतके १२० अध्याय और ५ स्थान | ९ | चतुर्थोऽध्यायः | |
| आयुर्वेदतन्त्रों में शल्यतंत्र सर्व श्रेष्ठ | ५ | सुश्रुत से लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार का सुख मिलता है | ९ | प्रभाषण नामक अध्याय की व्याख्या | १५ |
| शल्यतंत्र की प्रशंसा | ५ | द्वितीयोऽध्यायः | व्याख्या का प्रयोजन | १५ | |
| आयुर्वेद की गुरुपरम्परा ✓ | ५ | शिष्योपनयनीय अध्याय का अवतरण | ९ | व्याख्या की आवश्यकता | १५ |
| भगवान् धन्वन्तरि का आत्मपरिचय | ५ | शिष्य परीक्षा | ९ | आयुर्वेद से अतिरिक्त अन्य शास्त्रों को जानने का उपाय | १६ |
| आयुर्वेद के अधिष्ठानभूत पुरुष का निरूपण | ५ | शिष्य की दीक्षा विधि | ९ | वैद्य शब्द का अधिकारी | १६ |
| व्याधियों का साधारण रूप | ६ | आयुर्वेद अध्ययन के अधिकारी | १० | अन्य शब्दतंत्र | १६ |
| व्याधियाँ चार प्रकार की हैं ✓ | ६ | शिष्य का कर्तव्य | १० | पंचमोऽध्यायः | |
| १ आगन्तुक रोग ✓ | ६ | रोगी परिचर्या के लिये उपदेश | ११ | अग्निपहरणीय अध्याय की व्याख्या | १६ |
| ६ | अनध्याय काल | ११ | कर्म के तीन प्रकार | १६ | |
| ६ | तृतीयोऽध्यायः | शस्त्रकर्म के आठ प्रकार | १६ | ||
| ६ | अध्ययन सम्प्रदातीय अध्याय की व्याख्या | ११ | शस्त्रकर्म के पूर्व तैयार रखने योग्य उपकरण | १७ | |
| ६ | ११ |
२
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| शस्त्रक्रिया का उपदेश | १७ |
| शस्त्रकर्म में व्रण की प्रशस्त आकृति | १७ |
| शस्त्रकर्म करनेवाले वैद्य के गुण | १८ |
| एक व्रण से घाव पूरा साफ न होने से अन्य व्रण बनाने चाहिए | १८ |
| व्रण में जहाँ भी पूय की गति देखे अथवा पूय संचय हो गया हो व्रण कर देना चाहिये | १८ |
| तिरछा छेदन कहाँ करना चाहिये | १८ |
| अर्धचन्द्राकार छेदन कहाँ करना चाहिये | १८ |
| उपर्युक्त विधि से छेदन न करने पर दोष | १८ |
| किन रोगों में रोगी को बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिये | १८ |
| शस्त्रकर्म के पश्चात् कर्म ✓ | १८ |
| व्रण का धूपन | १८ |
| धूपन द्रव्य | १८ |
| राक्षसों के भय को दूर करने के लिये रक्षाकर्म | १८ |
| आहार विहार का उपदेश | २० |
| व्रण को खोलने का समय | २० |
| कषाय, लेपन, वन्धन आहार-विहार की विधि | २० |
| व्रण का रोपण कब करना चाहिये ✓ | २० |
| ऋतु के अनुसार पट्टी करनी चाहिये ✓ | २० |
| इसमें अपवाद | २० |
| शस्त्र क्रिया के कारण उत्पन्न हुई तीव्र वेदना को शान्त करने का उपाय | २० |
पष्टोऽध्यायः
| ऋतुओं में किस प्रकार का आचरण करना चाहिये | २० |
|---|---|
| काल की व्याख्या | २० |
| संवत्सर रूपी धीरीर वाले काल का विभाग | २१ |
| छः ऋतुओं का विभाग | २१ |
| दक्षिणायन तथा उत्तरायण दो अयन विभाग | २१ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| चन्द्र सूर्य का आश्रय करके वायु प्रजा का पालन करती है | २२ |
| युग का वर्णन | २२ |
| ऋतुयें वातादि दोषों के संचित प्रकोप प्रशमन में कारण हैं | २३ |
| प्रकुपित हुए दोषों को दूर करने का उपदेश | २३ |
| कालस्वभाव के कारण वातपित्तादि दोषों की शान्ति कब होती है | २३ |
| सांवत्सरिक विधि को दिन रात में भी कहते हैं | २३ |
| अदूषित ऋतुओं में गेहूँ चने आदि वनस्पतियाँ तथा पानी निर्दोष होते हैं | २३ |
| इन ऋतुओं में विपरीतता का कारण अधर्म है | २४ |
| दूषित अन्न पान से महासारी आदि फैलती है | २४ |
| अन्य कारण जिनसे जनपद नष्ट होते हैं | २४ |
| इनकी सामान्य चिकित्सा | २४ |
| अव्यापन्न ऋतुओं के लक्षण | २४ |
| ऋतुओं के स्वभाविक गुणों में अत्यधिकता के कारण अथवा स्वभाविक गुणों में विपरीतता के कारण प्राणियों के वातादि दोष कुपित हो जाते हैं | २५ |
| रोगोत्पत्ति से पूर्व ही दोषों का शमन करना चाहिये | २५ |
सप्तमोऽध्यायः ✓
| यंत्रविधि अध्याय का वर्णन | २६ |
|---|---|
| यंत्रों की संख्या | २६ |
| यंत्र कैसे कहते हैं | २६ |
| यंत्रों के भेद | २६ |
| यंत्र किसके बनते हैं | २६ |
| यंत्रों की बनावट | २६ |
| उपसंहार | २६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| स्वस्तिक यंत्रों का प्रमाण तथा आकार | २६ |
| संदेश यंत्र | २७ |
| ताल यंत्र | २७ |
| नाड़ी यंत्र | २७ |
| शलाका यंत्र | २८ |
| उपयन्त्र | २८ |
| यंत्रों के उपयोग | २८ |
| यंत्रों के कर्म | २९ |
| उपसंहार | २९ |
| यन्त्र दोष | २९ |
| कैसे यंत्र बरतने चाहियें | ३० |
| भिन्न भिन्न यंत्रों से क्या काम लेना चाहिये | ३० |
| कंकमुख यंत्र सब में प्रधान है | ३० |
अष्टमोऽध्यायः ✓
| शस्त्रावचारणीय अध्याय की व्याख्या | ३० |
|---|---|
| शस्त्रों की संख्या—(आकार नाम से स्पष्ट है) | ३० |
| शस्त्रों का उपयोग | ३० |
| शस्त्रों को पकड़ने की विधि | ३१ |
| शस्त्रों के गुण | ३१ |
| शस्त्रों के दोष | ३१ |
| अधविध कार्य में धारका निश्चय | ३२ |
| बद्धिश तथा एषणी यंत्र की धार | ३२ |
| पायना कैसे कहते हैं और उसके प्रकार | ३२ |
| शस्त्रों की तेज कैसे करना चाहिये | ३२ |
| धार की पहिचान | ३३ |
| अनुग्रन्थ और उनका उपयोग | ३३ |
| शस्त्रों का परिचय अत्यावश्यक | ३३ |
| नवमोऽध्यायः | |
| योग्यास्त्रीय अध्याय की व्याख्या | ३३ |
विषयानुक्रमणिका
३
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| संपूर्ण शास्त्र पढ़े हुए को भी कर्माभ्यास करना चाहिये | ३४ |
| छेदन के सब भेदों को दिखाना चाहिये | ३४ |
| उपसंहार | ३४ |
| दशमोऽध्यायः | |
| विशिखानुप्रवेशनीय अध्याय की व्याख्या | ३४ |
| शास्त्रकर्म के लिये वैद्य को किस प्रकार घर में प्रवेश करना चाहिये | ३५ |
| रोग को जानने के लै प्रकार | ३५ |
| रोग विज्ञान के उपाय | ३५ |
| रोगों की परीक्षा कर लेने पर साधु रोगों की चिकित्सा करनी चाहिये | ३६ |
| किन व्यक्तियों में साधु रोग भी प्रायः करके अति कष्टसाध्य होते हैं | ३६ |
| चिकित्सा के समय वैद्य के लिये नियम | ३६ |
| एकादशोऽध्यायः ✓ | |
| क्षारपाकविधि की व्याख्या | ३६ |
| शास्त्र तथा अनुशास्त्रों में क्षार ही प्रधान है | ३६ |
| क्षारनियुक्ति | ३६ |
| क्षार के गुण कर्म | ३७ |
| क्षार के दो प्रकार | ३७ |
| प्रतिसारणीय क्षार का विषय | ३७ |
| पानीयक्षार | ३७ |
| जिन रोगों में क्षार निषिद्ध है | ३७ |
| पानीयक्षारपाक विधि | ३७ |
| प्रतिसारणीय क्षारनिर्माण विधि | ३७ |
| मृदु मध्यम तथा तीक्ष्ण क्षार | ३८ |
| इन तीनों का व्याधि के अनुसार प्रयोग होना चाहिये | ३९ |
| क्षार के गुण दोष | ३९ |
| क्षारप्रतिसारण विधि | ३९ |
| सम्यग दग्ध होने के लक्षण तथा उसके पश्चात् कृत्य | ४० |
| अग्न से क्षार की शान्ति के लिये प्रकार | ४० |
| सम्यक प्रकार से जलने पर | ४० |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| कम जलने पर | ४० |
| अति जलने पर | ४० |
| किन के लिये क्षार कर्म उपयुक्त नहीं | ४० |
| प्रदेश विशेष से निषेध | ४१ |
| साध्यरोगों में किन अवस्थाओं में क्षारकर्म सफल नहीं होता | ४१ |
| द्वादशोऽध्यायः ✓ | |
| अग्निकर्म की व्याख्या | ४१ |
| क्षार से अग्नि श्रेष्ठ है | ४१ |
| दहन कार्य के साधन | ४१ |
| शरद तथा ग्रीष्म ऋतु को छोड़ | ४१ |
| अग्निकर्म करना चाहिये | ४२ |
| अग्निकर्म के दो प्रकार | ४२ |
| स्वच्छा के जलने पर | ४२ |
| शिर के रोगों तथा अधिमन्य | ४२ |
| किनमें अग्निकर्म करना चाहिये | ४२ |
| रोग के आश्रयभेद से अग्निकर्म चार प्रकार का है | ४३ |
| अग्निकर्म में प्रवृत्ति निवृत्ति का निश्चय | ४३ |
| किन पुरुषों में अग्निकर्म नहीं करना चाहिये | ४३ |
| अन्य प्रकार से जले हुए व्यक्तियों के लक्षण | ४३ |
| आग से जले हुये के ४ प्रकार | ४४ |
| आग से जले हुये के चिकित्सा कर्म | ४४ |
| धूम से पीड़ित व्यक्तियों के लक्षण | ४४ |
| वमन के लिये | ४४ |
| उष्णवात | ४४ |
| त्रयोदशोऽध्यायः ✓ | |
| जलौकावचरणीय अध्याय की व्याख्या | ४५ |
| जौक का उपयोग | ४५ |
| विद्याम्य रक्त को निकालने के तीन तरीके—गाय का सींग, जौक, तथा तुम्बी कौन सा रक्त निकालने के लिये उपयुक्त है | ४५ |
| जलायुका शब्द की नियुक्ति | ४६ |
| जलायु के प्रकार | ४६ |
| विषयुक्त जौके | ४७ |
| निर्विषा जौके | ४७ |
| निर्विष जलौकाओं के प्रशस्तक्षेत्र | ४७ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| जौकों को क्षेत्त्र भेद से विष युक्त तथा निर्विष जौके | ४७ |
| जौक को ग्रहण करने के उपाय | ४७ |
| जौक को पालने के उपाय | ४८ |
| यह जौके जिनका उपयोग नहीं करना चाहिये | ४८ |
| जौकों को किस तरह लगाना चाहिये | ४८ |
| जौक रक्त ले रही है अथवा नहीं यह जानना | ४८ |
| जौक को विशुद्ध रक्त पीने न देने का उपाय | ४८ |
| जौक के गिरने पर उसके रक्त को निकालने का उपाय | ४८ |
| शोणितवासेचन होने पर ब्रणों को चिकित्सा | ४८ |
| चतुर्दशोऽध्यायः | |
| शोणितवर्णनीय अध्याय की व्याख्या | ४९ |
| रस का वर्णन | ४९ |
| रक्त तथा आर्तव की उत्पत्ति वर्णन | ४९ |
| रक्त तथा आर्तव भेद | ४९ |
| शोणित के स्वभाव में मतान्तररक्त पांचभौतिक है | ४९ |
| शुक्र की उत्पत्ति तथा भाग | ४९ |
| अन्नपान का सारभाग रस है | ४९ |
| रस शब्द की निरुक्ति | ४९ |
| एक धातु में रस का अवस्थानकाल | ५० |
| शरीर में रस की तीन प्रकार की गति | ५० |
| वाजीकरण औषधियों का शीघ्र शुक्र विरेचन | ५१ |
| बालकों की शुक्र अदर्शन में युक्ति | ५१ |
| अन्न रस का बुढ़ापे में पुष्ट न करना | ५२ |
| धातुशब्दनिरुक्ति | ५२ |
| विकृत शोणित का दोषभेद से लक्षण | ५२ |
| शुद्ध शोणित का वर्णन | ५२ |
| विद्याम्य रक्तों की व्याख्या | ५२ |
| रक्तमोक्षण के अयोग्य रोगी | ५३ |
| शास्त्रविद्यावण के प्रकार | ५३ |
| रक्तखाव के अयोग्य हेतु | ५३ |
| दुष्टरक्त के बाहर न निकलने से खाव से दोष | ५३ |
४
सुश्रुतसंहिता
विषय पृष्ठ
रक्त के अतियोग और उसके उपद्रव ५३
रक्तविखावण योग्य काल ५३
रक्तशुद्धि के लक्षण ५३
रक्तके सम्यक् प्रवाह के उपाय ५४
रक्तके अधिक प्रवाह रोकने के योग्य ५४
रक्तखावनिवारण के चार उपाय ५५
पंचदशोऽध्यायः
दोष धातु मलक्षय बुद्धि विज्ञानीय
अध्याय की व्याख्या ५५
स्वस्थों के वातादि का कर्म ५५
धातु रक्षा के उपदेश ५६
दोषों के क्षय की चिकित्सा रसक्षय ५६
मलक्षय ५७
आर्तव क्षय ५७
बढ़े हुए दोष धातु मलों के लक्षण और उनकी चिकित्सा ५७-५८
बल और बलक्षय के लक्षण ५८
ओज का क्षय ५८
ओज के तीन दोष और चिकित्सा ५८
स्थूलता और कृशता की
चिकित्सा ५९-६१
मध्य की श्रेष्ठता ६२
षोडशोऽध्यायः
कर्ण वेधन विधि की व्याख्या ६२
कर्ण वेधन विधि ६२
सिराओं के वेधन से क्या दोष होते हैं ६३
इन दोषों की चिकित्सा ६४
वेधन के पश्चात्कर्म ६५
दोष के शान्त होने पर कानों को लम्बा करना ६५
कानों के दो मार्ग हो जाने पर उनको जोड़ने की विधि ६६
पन्द्रह कर्णबन्धाकृतियाँ ६६
कपाट सन्धि तथा अर्ध कपाट सन्धिक बन्धन ६६
कर्ण पाली को बनाना ६६
कर्ण सन्धि ६६
कर्णबन्ध के समय परित्याग करने योग्य बातें ६६
विषय पृष्ठ
सन्धान न करने के कारण ६७
अदूषित कान को बढ़ाने के लिये अभ्यङ्ग ६७
उद्बर्तन ६७
असंख्य कर्ण बन्धन ६७
पाली के उपद्रवों के नाम और लक्षण ६७
उत्पाटक रोग में ६७
श्याम रोग में ६७
नासिका का शल्यकर्म ६७
ओष्ठ सन्धानविधि ६७
सप्तदशोऽध्यायः
आमपक्ववेणीय अध्याय की व्याख्या ६८
ग्रन्थि, विद्रधि, अलजी आदि रोगों का प्रधान कारण शोथ ६८
शोथ का लक्षण ६८
शोथ छे प्रकार का है ६८
आम शोथ के पकने के लक्षण ६९
शस्त्रकर्म से पूर्व कर्म ७०
कष्टसाध्य शोथ ७०
बाहर न निकली हुई पूय, मांस, शिरा स्नायुओं का भक्षण करता है ७०
अष्टादशोऽध्यायः
त्रणलेपनबन्धविधि की व्याख्या ७१
आलेप ही सब उपायों में प्रधानतम है ७१
आलेप को लोमों के अधिमुख लगाना चाहिये ७१
सूखा हुआ आलेप निरर्थक और दर्द करनेवाला होता है ७१
आलेप तीन प्रकार का है ७१
आलेप का प्रमाण ७१
रात्रि को आलेप नहीं करना चाहिये ७२
प्रदेह साध्य व्याधि में दिन में आलेप करना उत्तम है ७२
त्रणबन्धन द्रव्यों की व्याख्या ७३
पट्टियाँ ७३
शरीर के भिन्न २ प्रदेशों में कौन सी पट्टी बाँधना चाहिये ७३
औषधकल्क ७४
विषय पृष्ठ
त्रणके स्थानभेद से बन्ध भी तीन प्रकार का है
दोष विशेष से बन्ध ७४
कालविशेष से बन्ध विशेष ७४
क्षिथिलबन्ध के स्थान पर गाढ बन्ध नहीं बाँधना चाहिये ७४
त्रण पर पट्टी न बाँधने से त्रण जल्दी कैसे भरता है ७५
किन अवस्थाओं में बन्धन नहीं बाँधना चाहिये ७५
उपसंहार-यंत्रणा तीन प्रकार की है ७६
किन में बन्धन बाँधना आवश्यक है ७६
एकोनविंशोऽध्यायः
त्रणितोपासन्य की व्याख्या ७६
त्रणी पुरुष के लिए सबसे पहले क्या व्यवस्था करनी चाहिये ७६
प्रशस्त प्रदेश में बने घर से लाभ ७६
शय्या पर सोने से लाभ ७६
त्रणी पुरुष को कभी दिन में न सोना चाहिए ७६
त्रणी की चेष्टाएँ किस प्रकार होनी चाहिए ७६
गम्य ग्राम्यधर्म के योग्य स्त्रियों से दूर बचना चाहिए ७७
किस आहार का परित्याग करना चाहिये ७७
बाह्य आहार-विहार-जिनसे बचना चाहिये ७७
आधिदैविक रक्षा ७७
धूप कैसी देनी चाहिये ७८
किन औषधियों को सिर पर धारण करना चाहिये ७८
सेवन विधि ७८
विशतितमोऽध्यायः
हिताहितौय नामक अध्याय की व्याख्या ७९
द्रव्य स्वभाव से, संयोग से, पूर्णरूप में हित या अहित दोनों करने-वाले होते हैं ७९
विषयानुक्रमणिका
५
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| पूर्णरूप में हितकारी द्रव्य | ८० |
| प्राणियों का पथ्य-आहार | ८० |
| विहार | ८० |
| अन्य द्रव्य संयोग के आहार | |
| विषवत् अतिकारी हो जाते हैं | ८० |
| अग्नि आदि पदार्थों को देखकर | |
| एकान्त अहित पदार्थों का भी | |
| उपयोग करें | ८० |
| अन्यसंयोगरूपी अहितकारी | |
| द्रव्य | ८० |
| कर्मविरुद्धद्रव्य | ८१ |
| मानविरुद्ध द्रव्य | ८१ |
| रस, वीर्य और विपाक में विरुद्ध | |
| द्रव्य | ८१ |
| कोई द्रव्य दोष का प्रकोपक और | |
| कोई द्रव्य दोष की शान्ति | |
| करता है | ८१ |
| रस आदि धातुओं में विकार | |
| कैसे होता है | ८२ |
| चिकित्सासूत्र | ८२ |
| किन अवस्थाओं में विरुद्ध भोजन | |
| निष्फल हो जाता है | ८२ |
| दिशा के योग से वायु की हित् | |
| कारिता और अहित कारिता | ८३ |
| एकविंशतितमोऽध्यायः | |
| व्रण प्रश्न नामक अध्याय की | |
| व्याख्या | ८३ |
| शरीर की उत्पत्ति में कारण | ८३ |
| निरुक्ति | ८३ |
| दोषों के स्थान | ८४ |
| इनके पांचविभाग | ८४ |
| पित्त के अतिरिक्त क्या कोई | |
| और अग्नि शरीर में है | ८४ |
| शरीर में पित्त के कार्य | ८४ |
| पित्त के लक्षण | ८५ |
| कफ के स्थान | ८५ |
| कफ के गुण | ८५ |
| दोषों के प्रकोपक कारण | ८६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| दोषों का प्रसार | ८६ |
| रोग की उपलब्धि | ८८ |
| व्रण शब्द की निरुक्ति | ८६ |
| द्वविंशतितमोऽध्यायः | |
| व्रणस्त्रावविज्ञानीय अध्याय की | |
| व्याख्या | ९० |
| व्रण के आठ अधिष्ठान | ९० |
| त्वचा में स्थित व्रण सुख | |
| साध्य है | ९० |
| व्रण की चार आकृतियाँ | ९० |
| दुष्ट व्रण के लक्षण | ९० |
| सब प्रकार के स्त्राव | ९१ |
| वायु के कारण | ९१ |
| असाध्य स्त्राव | ९१ |
| सब व्रणों की वेदना | ९१ |
| पैतिक व्रणों के लक्षण | ९१ |
| कफजन्य व्रण के लक्षण | ९२ |
| व्रण के रङ्ग | ९२ |
| त्रयोविंशतितमोऽध्यायः | |
| कृत्याकृत्य नामक अध्याय की | |
| व्याख्या | ९२ |
| अतिशय सुखसाध्यव्रण | ९३ |
| कृच्छ्र साध्य व्रण | ९३ |
| व्रण जो सुखपूर्वक रोहण हो जाते हैं | ९३ |
| साध्य के भेद कृच्छ्रसाध्य व्रण | ९३ |
| याप्य व्रण | ९३ |
| याप्य का लक्षण | ९३ |
| असाध्य रोग | ९३ |
| शुद्धव्रण के लक्षण | ९४ |
| रोहण होते हुये व्रण के लक्षण | ९४ |
| सम्यग् रुद्ध के लक्षण | ९४ |
| चतुर्विंशतितमोऽध्यायः | |
| व्यापिसमुद्देशीय नामक अध्याय की | |
| व्याख्या | ९५ |
| रोग दो प्रकार के हैं | ९५ |
| तीन प्रकार का दुःख | ९५ |
| सात प्रकार की व्याधियाँ | ९५ |
| दुष्ट शोणित बलजाता | ९५ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| प्रहार शक्ति से उत्पन्न आगन्तु- | |
| जरोग | ९५ |
| कालवृल प्रवृत्ता | ९५ |
| रसादि धातुओं के विकार | ९६ |
| वात आदि दोषों का ज्वर आदि | |
| रोगों के साथ सम्बन्ध सदा बना | |
| रहता है अथवा नहीं | ९७ |
| पञ्चविंशतितमोऽध्यायः | |
| अष्टविध शस्त्रकर्मोपध्याय की | |
| व्याख्या | ९७ |
| छेदन करने योग्य रोग | ९७ |
| भेदन करने योग्य रोग | ९८ |
| लेखन करने योग्य रोग | ९८ |
| वेधन करने योग्य रोग | ९८ |
| शलाका द्वारा एषण करने | |
| योग्य | ९८ |
| स्त्रावण करने योग्य रोग | ९८ |
| सीने योग्य रोग | ९८ |
| किन अवस्थाओं में सीना नहीं | |
| चाहिये | ९९ |
| संशोधन करने योग्य | ९९ |
| सीने की विधि | ९९ |
| सीने के चार प्रकार | ९९ |
| सूई के भेद | ९९ |
| सीने के पश्चात् कर्म | ९९ |
| आठ प्रकार के शस्त्र कर्म में चार | |
| प्रकार की व्यापद है | ९९ |
| किस वैद्य का परित्याग करना | |
| चाहिये | १०० |
| शस्त्र के अतियोग से होनेवाले | |
| लक्षण | १०० |
| सर्म्पविद्धशिशा आदि के | |
| लक्षण | १०० |
| स्नायु के विद्ध होने पर | १०० |
| सन्धि के विद्ध होने पर | १०० |
| अस्थि के विद्ध होने पर | १०० |
| बिरादि सर्म्प के विद्ध होने पर | १०१ |
६
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| वैद्य को रोगी की रक्षा कैसे करनी चाहिये और उसका फल | १०१ |
| षड्विंशतितमोऽध्यायः | |
| प्रनष्टशल्यविज्ञानीय अध्याय की व्याख्या | १०१ |
| शल्य के प्रकार | १०१ |
| शारीरिक शल्य | १०१ |
| शल्य के प्रसिद्ध भेद | १०१ |
| छोटे बड़े शल्यों की पाँच प्रकार की गति | १०२ |
| शल्य का लक्षण | १०२ |
| वात आदि दोषों से अदूषित | १०२ |
| त्वचा में शल्य छिप जाने पर | १०२ |
| सामान्य विज्ञानीय उपाय | १०३ |
| निःशल्य के लक्षण | १०३ |
| अस्थि रूप शल्य | १०४ |
सप्तविंशतितमोऽध्यायः
| शल्योपनयनीय अध्याय की व्याख्या | १०४ |
|---|---|
| शल्य के दो प्रकार | १०४ |
| अनवबद्ध शल्य को निकालने के १५ उपाय | १०४ |
| सब प्रकार के शल्य निकालने की दो विधियाँ | १०५ |
| अर्वाचीन शल्य को निकालने का उपाय | १०५ |
| पराचीन शल्य निकालने का उपाय | १०५ |
| उत्तुषित मुखवाले शल्य को निकालने का उपाय | १०५ |
| कुखि, वक्ष आदि के शल्य को निकालने का उपाय | १०५ |
| शल्य को निकालने के पश्चात् कर्म | १०५ |
| हृदय के समीप शल्य निकालने का उपाय | १०६ |
| अस्थि छिद्र में प्रविष्ट को निकालने के उपाय | १०६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| कर्णवाले शल्य को निकालने का उपाय | १०६ |
| लाख आदि वस्तु के गले में फँस जाने से उसे निकालने का उपाय | १०७ |
| मछली का शल्य आदि निकालने का उपाय | १०७ |
| पानी में डूबे हुए मनुष्य के पेट में से जल निकालना | १०७ |
| भोजन का प्राप्त गले में फँस जाने से निकालने का उपाय | १०७ |
| गला घोटने पर | १०७ |
| अष्टविंशतितमोऽध्यायः | |
| विपरीत व्रण विज्ञानीय अध्याय | १०८ |
| रिष्टलक्षण मृत्यु को बता देता है | १०८ |
| किन अवस्थाओं में रिष्टलक्षण नहीं पता चलते | १०८ |
| रिष्टलक्षणों के निवारण के उपाय | १०८ |
| प्राकृतिक गन्ध | १०८ |
| वैकृतगन्ध | १०८ |
| किन व्रणों का परित्याग करना चाहिये | १०८ |
| शब्द वैकृत | १०९ |
| स्पर्श वैकृत | १०९ |
| आकृति विशेष वैकृत | १०९ |
| उपद्रव | १०९ |
एकौनत्रिंशत्तमोऽध्यायः
| विपरीताविपरीत-दूत-शकुन-स्वप्न निदर्शनीय नामक अध्याय की व्याख्या | १०९ |
|---|---|
| वैद्य की मानसिक चेष्टाओं से रोगी के शुभ अशुभ भाव पता लग जाते हैं | १०९ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| निन्दित दूत के लक्षण | ११० |
| चेष्टायेँ | ११० |
| वेला | ११० |
| नक्षत्र | ११० |
| तिथि | ११० |
| शुभ-अशुभ शकुन | १११ |
| शुभ तथा निन्दित वायु | १११ |
| वैद्य को इनकी निश्चित रूप से परीक्षा करनी चाहिये | १११ |
| स्वप्न | ११३ |
| विफल स्वप्न | ११३ |
| उत्तरतंत्र में पढ़े हुये रोगों के लिये अन्य स्वप्न | ११४ |
| अशुभ स्वप्न में चिकित्सा | ११४ |
| शुभ स्वप्न | ११४ |
त्रिंशत्तमोऽध्यायः
| पंचेन्द्रियार्थ विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या | ११४ |
|---|---|
| अरिष्ट के लक्षण | ११५ |
| न बचनेवाले रोगी के लक्षण | ११५ |
एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः
| छाया विप्रतिपत्ति अध्याय की व्याख्या | ११६ |
|---|---|
| निश्चयात्मक मरनेवालों के लक्षण | ११६ |
| मृत्यु के कारण | ११७ |
द्वान्त्रिंशत्तमोऽध्यायः
| स्वभाव विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या | ११८ |
|---|
| प्रकृति से प्रसिद्ध-शरीर के एक भाग में स्थित अवयवों का दूसरे रूप में परिवर्तित होना मृत्यु के लिये होता है | ११८ |
|---|---|
| असाध्य के लक्षण | ११८ |
त्रयत्रिंशत्तमोऽध्यायः
अवार्णीय नामक अध्याय की | ---|---
विषयानुक्रमणिका
9
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| व्याख्या | १२० |
| आठ महारोग | १२१ |
| वैद्य को किन रोगियों का परित्याग करना चाहिये | १२२ |
| चतुर्विंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| युक्तसेनीय नामक अध्याय की व्याख्या | १२२ |
| राजा की रक्षा वैद्य को किस प्रकार करनी चाहिये | १२३ |
| १०१ साल की काल मृत्यु | १२३ |
| पुरोहित वैद्य से श्रेष्ठ है | १२४ |
| राजा के व्यसनों में फँसने के कारण | १२४ |
| चिकित्सा कर्म की सफलता में चार कारण वस्तुएँ | १२४ |
| वैद्य के गुण | १२४ |
| रोगी मनुष्य के गुण | १२४ |
| क्षेपज के गुण | १२४ |
| परिचारक के गुण | १२४ |
| पञ्चत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| आतुरोपक्रमणीय अध्याय की व्याख्या | १२४ |
| चिकित्सा से पहले रोगी की आयु परीक्षा | १२४ |
| दीर्घायु के लक्षण | १२५ |
| मध्यमायु पुरुष के लक्षण | १२६ |
| जघन्य आयु के लक्षण | १२६ |
| आयु के विज्ञान के लिये अङ्ग प्रत्यंग का ज्ञान, प्रमाण एवं सार | १२६ |
| क्रिया का लक्षण | १२८ |
| अग्नि के चार प्रकार | १२९ |
| विषमार्गिन | १२९ |
| तीक्ष्णार्गिन | १२९ |
| समार्गिन | १२९ |
| जाठराग्नि | १३० |
| वय तीन प्रकार की है | १३० |
| बृद्धावस्था में बाल्यावस्था के समान औषध मात्रा | १३० |
| देह परीक्षा | १३१ |
| देश तीन प्रकार का है | १३१ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| मुख साध्य रोग | १३१ |
| षट्त्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| भूमिप्रविभागीय नामक अध्याय की व्याख्या | १३२ |
| भूमि का दो प्रकार का विभाग | १३२ |
| विशेष भूमि परीक्षा | १३२ |
| गन्ध, वर्ण एवं रस से उक्त भूमि का प्रकार की है | १३३ |
| औषधियों को रखने का स्थान | १३३ |
| सप्तत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| मिश्रक अध्याय की व्याख्या | १३४ |
| सन्निपातजन्य शोथ को नष्ट करने के प्रलेप | १३४ |
| लेप का संस्कार | १३४ |
| पाचन द्रव्य | १३४ |
| दारण द्रव्य | १३४ |
| पीडन द्रव्य | १३४ |
| शोथन द्रव्य | १३४ |
| वर्ति | १३५ |
| कल्क | १३५ |
| संशोधनघृत | १३५ |
| तैल | १३५ |
| शोथन चूर्ण | १३५ |
| शोथनी रसक्रिया | १३५ |
| धूपन | १३५ |
| रोपणकषाय | १३५ |
| रोपणवर्ति | १३५ |
| व्रण के संरोहण के लिये कल्क | १३५ |
| सिद्ध घृत | १३५ |
| रोपण तैल | १३५ |
| रोपणचूर्ण | १३६ |
| रोपण कार्य के लिए रस क्रिया | १३६ |
| मांसवर्धन कार्य में प्रशस्त औषधियाँ | १३६ |
| उभरे हुए मांस को काटने के लिये | १३६ |
| अष्टत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| द्रव्यसंप्रहणीय अध्याय की व्याख्या | १३६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| सैतीस द्रव्य समूह के नाम आरग्वधादिगण | १३६ |
| सालसारदिगण | १३६ |
| वीरतर्वादिगण | १३७ |
| लोब्रादिगण | १३७ |
| अर्कादिगण | १३७ |
| सुरसादिगण | १३७ |
| मुष्कादिगण | १३७ |
| पित्तक्यादिगण | १३७ |
| एलादिगण | १३७ |
| वचादि तथा हरिद्रादिगण | १३८ |
| श्यामादिगण | १३८ |
| बृहत्यादिगण | १३८ |
| पटोलादिगण | १३८ |
| काकोल्यादिगण | १३९ |
| ऊषकादिगण | १३९ |
| सारिवादिगण | १३९ |
| अञ्जनादिगण | १३९ |
| पुरुषादिगण | १३९ |
| अम्बुघादिगण | १३९ |
| न्यम्रोघादिगण | १३९ |
| गुड्द्यादिगण | १३९ |
| उत्पलादिगण | १३९ |
| मुस्तादिगण | १३९ |
| त्रिफला | १३९ |
| त्रिकटु | १३९ |
| आमलक्यादिगण | १३९ |
| त्रप्वादिगण | १३९ |
| पञ्चमूल | १३९ |
| महापञ्चमूल | १३९ |
| वक्षमूल | १३९ |
| वल्लीपञ्चमूल | १४० |
| कण्टकपञ्चमूल | १४० |
| तुष्ट्यपञ्चकमूल | १४० |
| एकोनचत्वारिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| संशोधनसंशमनीय नामक अध्याय की व्याख्या | १४१ |
| दो प्रकार के संशोधन | १४१ |
| शिरीरविरचन द्रव्य | १४२ |
| संशमनद्रव्य | १४२ |
८
सुश्रुतसंहिता
विषय पृष्ठ
उचित मात्रा में न दी हुई औषध क्या दोष करती है १४३
चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक विज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १४३
द्रव्य ही प्रधान है ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं १४४
द्रव्य का लक्षण १४४
रस ही प्रधान है ऐसा दूसरे आचार्य कहते हैं १४४
वीर्य ही प्रधान है ऐसा तीसरे आचार्य का मत १४४
विपाक ही प्रधान है ऐसा चौथे आचार्यों का मत है १४५
पाक भी दो प्रकार का है १४५
विपाक के दो भेद १४६
रस, वीर्य, विपाक में द्रव्य को ही श्रेष्ठ समझना १४६
शास्त्र की प्रधानता १४६
एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
द्रव्यविशेष विज्ञानीय अध्याय की व्याख्या १४७
द्रव्य की उत्पत्ति १४७
पार्ष्व द्रव्य १४७
आप्य द्रव्य १४७
वायवीय द्रव्य १४७
आकाशीय द्रव्य १४७
द्रव्य की कार्यशीलता, काल तथा कर्म १४७
द्रव्य के दो भेद (अधोमार्गी, ऊर्ध्वमार्गी) १४७
संशमनगुणवाले द्रव्य संग्राहक, दीपन, आग्नेय, लेखन, बुद्धि १४७
वीर्यसंज्ञक गुण १४८
पंचमहामृतों के समान गुण- वाले द्रव्यों में रस की विलक्षणता १४८
द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
रसविशेषविज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १४९
विषय पृष्ठ
सब मृतों में परस्पर सम्बन्ध बृद्धि तथा ह्राससे जाना जाता है १४९
जलीयरस के छ प्रकार १४९
परस्पर एक दूसरे से मिलने पर ६३ प्रकार १४९
कई आचार्यों के मत से रसों के दो भेद १४९
पित्त १५०
कफ १५०
रस के लक्षण १५०
रस के गुण १५०
अम्ल रस १५१
लवण रस १५१
कटु रस १५१
तिक्त रस १५१
कषाय रस १५१
मधुरवर्ग १५१
अम्लवर्ग १५१
लवणवर्ग १५१
कटुवर्ग १५१
तिक्तवर्ग १५१
कषायवर्ग १५१
छः रसों के परस्पर संयोग से ६३ भेद १५१
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
वमनद्रव्यविकल्पविज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १५३
मैनफलकल्प १५३
जीमूतकल्प १५३
कुटजकल्प १५३
कृतवेधनकल्प १५५
इन्द्राकुल्प १५५
धामागविकल्प १५५
वमन औषधियों का योजना प्रकार १५५
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
विरेचन द्रव्यविकल्प विज्ञानीय अध्याय की व्याख्या १५५
विरेचन में प्रधान द्रव्य १५५
त्रिदूतकल्प १५५
पित्तजन्य तथा कफजन्य रोग १५५
वातकफजरोग १५५
विषय पृष्ठ
मोदक १५६
वैरेचनीयद्रव्य चूर्ण १५६
यूषविधि १५६
पुटपाक रूपत्रिदूतकल्प १५६
वैरेचन लेह १५६
वैरेचन मोदक १५६
वैरेचन लेह गुटिका प्रयोग १५७
वैरेचन चूर्ण १५७
वैरेचन आसव १५७
वैरेचन पैष्टी सुरा १५७
वैरेचन सौवीर (कांजी) १५७
वैरेचन तुषोदक १५७
वैरेचन त्रिदूतमूलविधि १५८
दन्ती द्रवन्ती कल्प १५८
दन्ती द्रवन्ती स्नेहयोग १५८
दन्त्यादिमोदक १५८
व्योषादिविरेचन १५८
तिलककल्प १५८
हरीतकीकल्प १५९
त्रिफलकल्प १५९
हरीतकी विधान १६०
चतुरङ्गुलकल्प १६०
ऐरण्डतैलकल्प १६०
स्तुहीक्षीरकल्प १६०
त्रिदूतमोदक १६१
औषधकल्पनाविधि १६१
पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
द्रव्यविधि की व्याख्या १६१
आन्तरिक्ष जल के गुण १६१
पानी के गिरने से स्थान विशेष के कारण भिन्न भिन्न रस को प्राप्त करता है १६१
लोहित, कपिल आदि भूमि में मधुर अम्ल आदि रस युक्त जल होते हैं १६२
अन्तरिक्ष जल के अभाव में आकाश गुण बहुल १६२
अन्तरिक्ष जल के चार प्रकार १६२
भूमि के पानी के सात प्रकार १६२
हर-श्रुतु में कौन सा जल लेना चाहिये १६३
न बरतने योग्य जल १६४
विषयानुक्रमणिका
६
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| ल प्रकार के दोष जो अन्तरिक्ष जल में नहीं | १६४ | हथिनी का दूध | १६८ | मधु के आठ भेद उनके गुणदोष | |
| दूषित पानी को स्वच्छ करने के उपाय | १६४ | प्रातःकाल का दूध | १६८ | भिन्न प्रकार | १७५ |
| दूषित पानी को पीने से कौन रोग होते हैं | १६४ | सायंकाल का दूध | १६८ | इलुवर्ग के गुण दोष | १७७ |
| रात वस्तुयें जो मलिन जल को स्वच्छ करती हैं | १६५ | कच्चा दूध | १६८ | मध्य वर्ग के भिन्न प्रकार के गुण दोष | १७८-१८२ |
| पाँच वस्तुयें जिन पर पानी का बर्तन रखना चाहिये | १६५ | स्त्री के दूध को छोड़ सब गरम पीने चाहिये | १६९ | मूत्र के भिन्न प्रकार, गुण दोष | १८२ |
| पानी को ठण्डा करने के सात उपाय | १६५ | धारोण दूध | १६९ | षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः | |
| भूमि के पानी के गुण | १६५ | त्यागने योग्य दूध | १६९ | अन्नपानविधि की व्याख्या | १८३ |
| पृथक् पृथक् नदियों के जल के गुण-दोष | १६५ | दही तीन प्रकार का है | १६९ | शालिवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष | १८४ |
| जिन अवस्थाओं में शीतल पानी का देना उत्तम है | १६६ | मधुर दही | १६९ | कुधान्यवर्ग के भिन्न प्रकार | |
| जिन अवस्थाओं में शीतल जल नहीं देना चाहिये | १६६ | मन्दजात दही | १६९ | गुण दोष | १८५ |
| नदी, सरोवर, तङ्गा, वापी, कुण्ड का खारा पानी, चौण्ड्य, झरने, औद्भिद, वैकिर, खेतों का पानी, छोटे गड्ढों का पानी | १६६ | गाय, बकरी, भैंस, ऊँटनी, भेड़, घोड़ी, स्त्री, हथिनी के दूध के | मांसवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष | १८८ | |
| आनूप देश का पानी | १६६ | दही के गुण दोष | १६९ | फलवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष | १९४ |
| गरम पानी | १६६ | गाय के दूध का दही सर्वश्रेष्ठ वस्त्र में से छाना दही | १६९ | शाकवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष | १९९ |
| रात का वासी पानी | १६६ | उबाल कर दूध से बनाई दही | १७० | पुष्पवर्ग के भिन्न प्रकार | |
| नारियल का पानी | १६६ | मलाई | १७० | गुण दोष | २०४ |
| किन अवस्थाओं में गरम करके ठण्डा किया हुआ जल देना चाहिये | १६७ | मलाई के बिना दही | १७० | कन्दवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष | २०५ |
| किस अवस्था में पानी धीरे धीरे पीना चाहिये | १६७ | दही किस ऋतु में नहीं खाना चाहिए | १७० | लवणवर्ग के भिन्न प्रकार | |
| दूध आठ प्रकार का है | १६७ | मस्तु के गुण | १७० | गुण दोष | २०६ |
| गाय का दूध | १६७ | तक्रवर्ग | १७० | मशियों के गुण | २०७ |
| बकरी का दूध | १६८ | तक्र किस अवस्था में नहीं खाना चाहिए | १७० | सब वर्गों में श्रेष्ठ | २०७ |
| ऊँटनी का दूध | १६८ | तक्र के गुण दोष | १७० | कृत्ताक्षवर्ग के भिन्न प्रकार | |
| भेड़ का दूध | १६८ | तुरन्त निकाला मक्खन | १७० | गुण दोष | २०८ |
| भैंस का दूध | १६८ | दूध से निकाला मक्खन | १७१ | भक्ष्यवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष | २१३ |
| घोड़ी का दूध | १६८ | दूध की मलाई | १७१ | अनुपानवर्ग | २१६ |
| स्त्रियों का दूध | १६८ | घी का सामान्य गुण | १७१ | सम्पूर्ण आहारविधि | २२० |
| गाय, बकरी, भैंस, ऊँटनी, भेड़, घोड़ी, स्त्री, हथिनी का घी | १७२ | निदानस्थान | |||
| दूध से निकाला घी | १७२ | प्रथमोऽध्यायः | |||
| पुरातन घी | १७२ | वातव्याधिनिदान की व्याख्या | २२३ | ||
| दस साल का पुराना घी | १७२ | वायु के विषय में प्रश्न | २२३ | ||
| एक सौ ग्यारह साल का घी | १७२ | वायु के स्वरूप का वर्णन | २२३ | ||
| तेल | १७२ | वायु का शरीर में विरेचन का क्रम | २२४ | ||
| भिन्न २ प्रकार के तेल के गुण दोष | १७३ |
१०
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| प्राण, उदान, समान, ध्यान, अपान वायु | २२४ |
| नाना स्थानों में आश्रित वायु के प्रकोप से होनेवाले रोग | २२५ |
| अवयवों में पहुँचकर वायु असंख्य रोग होते हैं | २२५ |
| प्राण वायु के पित्त के साथ मिलने पर | २२६ |
| वातरक्त रोग का कारण | २२६ |
| सम्प्राप्ति | २२६ |
| पूर्वरूप, असाध्य, आक्षेप | २२७ |
| असाध्य अपतानक | २२७ |
| पक्षाघात, अपतन्त्रक, मन्यास्तम्भ आदि, असाध्य, गुह्रसी विरवाची, क्रोष्टुक शीर्ष, खञ्ज और पंगु, कलाय खञ्ज, वाथ कण्टक, पाददाह, पादद्वर्ष अवबाहुक, बाधियं, कर्णशूल, तूनी-प्रतूनी, आध्मान, प्रत्याध्मान, अछीला, प्रत्यछीला, २२७-२३३ | |
| द्वितीयोऽध्यायः | |
| अर्श निदान की व्याख्या | २३३ |
| अर्श छ प्रकार का है | २३४ |
| सामान्य कारण, गुदा, पूर्वरूप, सामान्यरूप, वातजन्य अर्श, पित्तजन्य अर्श | २३५ |
| कफजन्य अर्श, रक्तजन्य अर्श | २३५ |
| सन्निपातजन्य अर्श, सहजन्य अर्श | २३५ |
| मेढादि में अर्श, | २३६ |
| अनिमाम्नाय का कारण | २३७ |
| तृतीयोऽध्यायः | |
| अश्मरी निदान | २३७ |
| अश्मरी रोग के चार प्रकार | २३७ |
| सामान्यलक्षण | २३८ |
| रुलेष्माश्मरी पैत्तिक अश्मरी, वातजन्य अश्मरी, शुक्राश्मरी | २३८ |
| शर्करा, रोगी के लक्षण | २३९ |
| अश्मरी के मूत्रमार्ग में पहुँचने पर उपद्रव | २३९ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| बस्ति का मूत्र द्वारा सदा भरना | २३९ |
| अश्मरी की उत्पत्ति | २३९ |
| वायु के प्रतिलोम होने पर नाना रोग | २४१ |
| चतुर्थोऽध्यायः | |
| भगन्दर निदान | २४१ |
| भगन्दर के पाँच प्रकार | २४१ |
| भगन्दर का पूर्वरूप | २४१ |
| शतपोनक भगन्दर | २४१ |
| उष्ट्रग्रीव भगन्दर | २४१ |
| परिखावि भगन्दर | २४१ |
| शम्बूकार्त भगन्दर | २४२ |
| उन्मार्गगामि भगन्दर | २४२ |
| सृजन के कारण गुदा के समीप पिङ्का | २४२ |
| असाध्यभगन्दर | २४२ |
| पञ्चमोऽध्यायः | |
| असाध्य कुष्ठरोग निदान | २४३ |
| कुष्ठ के कारण | २४३ |
| कुष्ठ का पूर्वरूप | २४३ |
| सात महाकुष्ठ और ११ लुद्र | |
| कुष्ठ के नाम | २४३ |
| महाकुष्ठ के लक्षण | २४३ |
| लुद्रकुष्ठों के लक्षण | २४४ |
| क्षुद्रकुष्ठों में कफ, वायु | |
| पित्तजन्य | २४४ |
| किलास का वर्णन | २४४ |
| त्वचा में कुष्ठ के लक्षण | २४५ |
| कुष्ठ के रक्त में होने पर | २४५ |
| मेद में कुष्ठ के पहुँचने पर | २४५ |
| माता पिता में कुष्ठ दोष के कारण | |
| संतान पर प्रभाव | २४५ |
| जितेन्द्रिय पुरुष का साध्य तथा | |
| असाध्य कुष्ठ रोग | २४६ |
| कर्मजन्य कुष्ठ | २४६ |
| कुष्ठ से अधिक दुःखदाई कोई नहीं | २४६ |
| कुष्ठरोग से मुक्ति | २४६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में यह रोग आ जाता है | २४६ |
| षष्ठोऽध्यायः | |
| त्रिदोषजन्य प्रमेह निदान | २४६ |
| प्रमेह के कारण | २४६ |
| प्रमेह के पूर्वरूप | २४६ |
| कफ के कारण दस प्रमेह | २४६ |
| पित्त के कारण छ प्रमेह | २४६ |
| वायु के कारण चार प्रमेह | २४७ |
| कफजन्य प्रमेह की व्याख्या | २४८ |
| पित्त " " | २४८ |
| वायु " " | २४८ |
| उपद्रव | २४८ |
| दशों पिङ्कायों की उत्पत्ति | २४९ |
| बीस प्रकार के प्रमेहों की उत्पत्ति | २४९ |
| सप्तमोऽध्यायः | |
| उदररोग की व्याख्या | २५० |
| उदर रोग के आठ प्रकार | २५० |
| कारण | २५१ |
| सम्प्राप्ति | २५१ |
| पूर्वरूप | २५१ |
| वातोदर | २५१ |
| पित्तोदर | २५१ |
| कफोदर | २५१ |
| सन्निपातोदर | २५१ |
| प्लीहोदर | २५२ |
| बद्धगुदोदर | २५२ |
| परिखाण्युदर | २५२ |
| दकोदर | २५२ |
| सामान्य लक्षण | २५३ |
| साध्यासाध्य लक्षण | २५३ |
| अष्टमोऽध्यायः | |
| मूद्गर्भ रोग निदान | २५३ |
| मूद्गर्भ के कारण | २५३ |
| मूद्गर्भ के चार प्रकार | २५३ |
| मूद्गर्भ की आठ गतियाँ | २५३ |
| असाध्य के लक्षण | २५३ |
| यह गर्भ भी असमय में गिरता है | २५४ |
विषयानुक्रमणिकां
११
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| गर्भस्त्राव और गर्भपात | २५४ |
| असाध्य मूढ़गर्भ तथा गर्भिणी के लक्षण | २५४ |
| शिशु के गर्भाशय में मरने के लक्षण | २५४ |
| माता के मरने पर जीवित गर्भ को निकालने के उपाय | २५४ |
| नवमोऽध्यायः ✓ | |
| विद्रधि निदान व्याख्या | २५५ |
| सम्प्राप्ति | २५५ |
| वातजन्यविद्रधि | २५५ |
| पित्तजन्यविद्रधि | २५५ |
| कफजन्यविद्रधि | २५५ |
| सन्निपातजन्यविद्रधि | २५५ |
| आगंतुजविद्रधि | २५६ |
| रक्तजन्यविद्रधि | २५६ |
| अभ्यन्तरविद्रधि | २५६ |
| स्थान | २५७ |
| स्थानमेद से विशेष लक्षण | २५७ |
| रक्तविद्रधि | २५७ |
| गुल्म और विद्रधि रोगमें मेद | २५७ |
| विद्रधि के अस्थि में पहुँच कर पक जाने के लक्षण | २५७ |
| दशमोऽध्यायः | |
| विसर्प नाड़ी स्तन रोग की व्याख्या | २५८ |
| विसर्प के लक्षण | २५८ |
| वातादि दोष मेदों से लक्षण | २५८ |
| पित्तजन्य विसर्प | २५८ |
| कफजन्य विसर्प | २५८ |
| सन्निपातजन्य विसर्प | २५८ |
| क्षतजन्य विसर्प | २५८ |
| साध्यासाध्य | २५८ |
| नाडी | २५९ |
| आठ प्रकार के नाडी ब्रण | २५९ |
| स्तन्यनिदान | २५९ |
| जिनमें स्तन रोग नहीं होते | २५९ |
| स्तन्य | २५९ |
| प्रवृत्ति के कारण | २६० |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| स्तन्य वायु से दूषित होने पर सम्प्राप्ति | २६० |
| वातादिजन्य पांचों स्तन रोगों के लक्षण | २६१ |
| एकादशोऽध्यायः ✓ | |
| ग्रन्थि, अबुर्द, गलगण्ड अपची निदान की व्याख्या | २६१ |
| ग्रन्थि के लक्षण ✓ | २६१ |
| वात, पित्तजन्य ग्रन्थि | २६१ |
| मेदोग्रन्थि | २६१ |
| शिराजन्य ग्रन्थि | २६१ |
| अपचीरोग की सम्प्राप्ति | २६२ |
| अबुर्द ✓ | २६२ |
| अबुर्द के लक्षण | २६२ |
| मांसजन्य अबुर्द | २६२ |
| द्विरबुर्द अधबुर्द असाध्य | २६२ |
| न पकने के कारण | २६३ |
| गलगण्ड सम्प्राप्ति | २६३ |
| वात, कफ, मेदजन्य गलगण्ड | २६३ |
| असाध्यता | २६४ |
| गलगण्ड का स्वरूप | २६४ |
| द्रादशोऽध्यायः | |
| वृद्धि, उपदंश तथा श्लीपद निदान | २६४ |
| वृद्धिरोग के सात प्रकार ✓ | २६४ |
| पूर्वरूप ✓ | २६५ |
| लक्षण ✓ | २६५ |
| उपदंश के लक्षण | २६६ |
| उपदंश के पाँच प्रकार | २६६ |
| श्लीपद के लक्षण | २६६ |
| त्रयोदशोऽध्यायः | |
| क्षुद्ररोगों के निदान की व्याख्या संक्षेप में ४४ क्षुद्र रोगों के नाम तथा पृथक् पृथक् लक्षण | २६७ |
| चतुर्दशोऽध्यायः | |
| शूकदोष निदानव्याख्या | २७१ |
| १८ प्रकार के शूक दोषजन्य रोग तथा उनके पृथक् पृथक् लक्षण | २७२ २७३ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| पञ्चदशोऽध्यायः ✓ | |
| भग्गनिदान व्याख्या | २७४ |
| भग्ग रोग के कारण | २७४ |
| सन्धिपुक्त भग्ग के ६ प्रकार | २७४ |
| लक्षण | २७४ |
| विशेष लक्षण | २७४ |
| सामान्य लक्षण | २७४ |
| पांच प्रकार की अस्थियां | २७५ |
| षोडशोऽध्यायः | |
| मुख रोग निदानव्याख्या | २७५ |
| ६५ प्रकार के मुखरोग सात स्थानों में उत्पन्न होते हैं | २७५ |
| ओष्ठ रोग | २७५ |
| वायु, पित्त, कफ, सन्निपात, रक्त, मांस, मेद, अभिघात के कारण ओष्ठरोग | २७५ |
| दन्तमूल में स्थित १५ रोग तथा उनके लक्षण | २७५ |
| जिह्वागत रोग | २७६ |
| वायु, पित्त, कफ, अलास, उपजिह्वाका के कारण जिह्वागत रोग | २७६ |
| तालुजन्य नौ रोग और उनके लक्षण | २७६ |
| कण्ठगत सत्रह रोग और उनके लक्षण | २७६ |
| सर्वसररोग के ४ प्रकार तथा उनके लक्षण | २८० |
| शारीरस्थान | |
| प्रथमोऽध्यायः | |
| सर्वभूतचित्तानामक शरीर की व्याख्या | २८१ |
| अव्यक्त निरूपण | २८२ |
| २४ तत्त्वों की व्याख्या | २८३ |
| ज्ञान तथा कर्मेन्द्रियों के विषय | २८५ |
| आठ प्रकृतियाँ तथा १६ विकार | २८५ |
| चौबीस तत्त्वों का वर्ग अचेतन | २८६ |
| प्रकृति तथा पुरुष के साधर्म्य तथा वैधर्म्य की व्याख्या | २८६ |
१२
सुश्रुतसंहिता
विषय पृष्ठ
पुरुष भी सत्व, रज, तमोमय कई आचार्य का मत है २८६
मनुष्य इंद्रियों द्वारा निश्चित इंद्रिय के अर्थ का ही ग्रहण करता है २८६
शरीर, आत्मा तथा मन के संयोग से जो गुण उत्पन्न होते हैं उनका वर्णन २८७
मन के सात्विक आदि गुण द्वितीयोऽध्यायः
शुक्र और शोणित का स्वरूप २८७
दूषितशुक्र २८७
क्षीणवीर्य के लक्षण २८७
साध्य तथा असाध्य २८८
दूषित आर्तव २८८
चिकित्सा २८८
शुद्ध शुक्र की परीक्षा २८९
आर्तवशुद्धि की चिकित्सा २८९
शुद्ध आर्तव की परीक्षा २९०
रक्तप्रदर २९०
संतान के उपयुक्त स्त्री पुरुष २९१
ऋतुकाल के समय स्त्री का कर्तव्य २९१
सहवास के पहले पुरुष तथा स्त्री का कर्तव्य २९२
उत्तम तथा निन्दित तिथियां २९२
ऋतुमती स्त्री के साथ सहवास के दोष २९३
गर्भस्थित होने पर वैद्य का कर्तव्य २९४
वर्णों की उत्पत्ति का कारण २९५
नपुंसक के लक्षण २९६
पापजन्मगर्भ आदि का वर्णन २९६
तृतीयोऽध्यायः
गर्भावकान्ति नामक अध्याय की व्याख्या २९७
शुक्र-आर्तव स्वरूप २९७
गर्भावतरणप्रक्रिया २९७
तृतीयोऽध्यायः
गर्भावकान्ति अध्याय की व्याख्या २९७
विषय पृष्ठ
शुक्र और आर्तव का सौम्याग्नेय स्वरूप २९७
मैथुन तथा शुक्रार्तव संयोग २९७
आत्मा के पर्याय तथा शुक्रार्तव के संयोग के समयप्रवेश २९७
गर्भ में पुरुष, स्त्री, नपुंसक होने के कारण २९८
ऋतुमती के लक्षण २९८
ऋतुकाल के पश्चात् योनीकी स्थिति २९८
आर्तव स्वरूप और उसके खवण की युक्ति २९८
आर्तव का प्रारम्भ और अन्त, समविषम दिन और सभागम का फल २९८
गर्भधारण करते ही स्त्री लक्षण २९८
गर्भिणी के लक्षण २९८
गर्भिणी को त्यागने योग्य प्रथम मास से लेकर चतुर्थ मास तक गर्भ का स्वरूप २९९
गर्भवती स्त्री की इच्छा पूर्ण करने का फल ३००
गर्भवती की इच्छा पूर्ति न करने से दोष ३००
गर्भवती की जो इच्छा होती रहती है उखी स्वभाववाली संतान उत्पन्न होती है ३००
पांचवें छठे, सातवें, आठवें महीनों के गर्भ का स्वरूप ३०१
आठवें महीने में बालक उत्पन्न होने से जीता नहीं ३०२
प्रसवकाल की मर्यादा ३०२
गर्भ पोषणक्रम ३०२
गर्भवृद्धि में अंगोत्पत्ति के मतमतान्तर और धन्वन्तरि का मत ३०२
मातापितादि से उत्पन्न होने वाले शरीर का लक्षण ३०२
गर्भ के स्त्री पुनपुंसक शरीर लक्षण ३०३
अंग प्रत्यंग के निर्माणमें गुण-अवगुण धर्म, अधर्म के कारण ३०३
विषय पृष्ठ
चतुर्थोऽध्यायः
गर्भव्याकरण नामक अध्याय शरीर के ११ प्राण सात त्वचाओं का निरूपण सात कलायें तथा लक्षण पुरुष में शुक्र प्रबुत्त होने का मार्ग ३०६
गर्भिणी में अनार्तव का हेतु ३०७
गर्भ के यकृतादि अंगों की उत्पत्ति की कल्पना ३०७
हृदय का स्वरूप ३०७
निद्रा का स्वरूप और प्रकार स्वप्नदर्शन का कारण ३०९
इन्द्रियों की विकलता के कारण आत्मा का सोया हुआ मालूम होना ३०९
दिन में सोने का योग्य काल और किन के लिये दिन में सोना ठीक है, उसके दोष रात्रि जागरणदोष ३१०
उचित प्रमाण की नींद से १०० वर्ष जीता है ३११
नींद न आने के कारण तथा चिकित्सा ३११
निद्रा के अतियोग में तन्त्रा, जम्भाई, कलम, आलस्य ग्लानि, गारव ३१२
गर्भ का शरीर कैसे बढ़ता है दृष्टि और रोमकूप कभी नहीं बढ़ते ३१२
नख और केश सदा बढ़ते हैं ३१३
सात प्रकार की प्रकृतियाँ प्रकृति की उत्पत्ति का हेतु ३१३
वात प्रकृति लक्षण ३१३
पित्तप्रकृति लक्षण ३१३
कफ प्रकृति लक्षण ३१४
पार्थिव तथा आकाश प्रकृति ३१४
सत्त्वादि गुणभेद से प्रकृति ३१४
राजस प्रकृति ३१५
तामस प्रकृति ३१५
विषणानुक्रमणिका
१३
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| पञ्चमोऽध्यायः | ममों की लम्बाई चौड़ाई | ३३० | दोषयुक्त शेषरक्त की चिकित्सा ✓ | ||
| शरीर संख्या व्याकरण | मर्म स्थान को बचाकर | संशमन से | ३४० | ||
| व्याख्या | ३१६ | शस्त्रकर्म | ३३० | बलवान् व्यक्ति के रक्त निकालने | |
| शरीर नाम कितने कहते हैं | ३१६ | अमर्म आदि स्थानों के छेदन-भेदन | का परिमाण | ३४० | |
| शरीर के अंग प्रत्यंग | ३१६ | से मृत्यु नहीं होती | ३३२ | भिन्न २ रोगों में सिरावेष का ✓ | |
| आशय, आंत, खोल | ३१६ | सद्यः प्राणहर ममों पर आघात | परिमाण | ३४१ | |
| कण्डरार्य, जालकों, कूर्च | ३१८ | लगने से इन्द्रिय विषय | दूषितरू में वेधन हुई सिराएँ | ३४१ | |
| बड़ीमांस रज्जु, सेवनी, अस्थिकायों | ज्ञान नहीं | ३३२ | दूषित सिराओं का विवरण | ३४१ | |
| के संघात सीमान्त | ३१८ | ममों पर आघात पहुँचने से प्रायः | सिराओं का वेधन यत्न पूर्वक | ३४१ | |
| अस्थियों की संख्या | ३१६ | विकलता (मृत्यु) अवश्य | सिरावेष रोग जल्दी शान्त | ||
| सन्धियों के दो प्रकार | ३२० | होती है | ३३३ | होते हैं | ३४१ |
| सन्धियों की संख्या | ३२० | सप्तमोऽध्यायः | शल्यतंत्र में आधी चिकित्सा | ||
| स्नायु | ३२१ | सिरा वर्ण विभक्ति शरीर | ३३३ | सिरावेष है | ३४१ |
| पेशियाँ तथा उनका आकार | ३२२ | सात सौ शिराएँ स्वरूप | ३३३ | सिरावेष आदि के लिये त्याज्य | |
| प्रत्यक्ष तथा शस्त्र दोनों ही ज्ञान | नाभि, प्राण और सिराओं | बातें | ३४२ | ||
| बुद्धि के कारण हैं | ३२३ | का सम्बन्ध | ३३३ | दूषित रक्त को निकालने का ✓ | |
| आत्मा को कैसे देखा जाता है | ३२४ | मूल सिरा और दोषवह सिराओं | तरीका | ३४२ | |
| षष्ठोऽध्यायः ✓ | की संख्या | ३३४ | नवमोऽध्यायः | ||
| मर्म निर्देश शरीर का | वातवह सिराओं का प्राकृत | धमनी व्याकरण शरीर की | |||
| व्याख्यान | ३२४ | कार्य | ३३४ | व्याख्या | ३४३ |
| मर्म के १०७ प्रकार ✓ | ३२४ | वातपित्तकफ सिराओं का रंग | ३३५ | धमनी की २४ संख्या | ३४३ |
| टांग पेट और छाती, पीठ, बाहु, | अवेध्य सिराएँ | ३३५ | ऊपर को जानेवाली धमनियाँ | ३४३ | |
| जनु से ऊपर के ममे | ३२४ | अष्टमोऽध्यायः | नीचे की ओर जानेवाली | ||
| मांसमर्म, सिरामर्म, स्नायुमर्म, ✓ | सिराव्येष विधि शरीर की ✓ | धमनियाँ | ३४५ | ||
| अस्थिमर्म, सन्धिमर्म | ३२४ | व्याख्या | ३३७ | तिर्यगगत धमनियाँ | ३४७ |
| मर्म के पाँच भेद ✓ | ३२५ | किन अवस्थाओं में सिरावेष ✓ | खोलों के मूल में बुद्ध होने से | ||
| प्राणहर मर्म ✓ | ३२५ | न करे | ३३८ | उत्पन्न लक्षण | ३४८ |
| मर्म का लक्षण ✓ | ३२५ | निषिद्ध रोगियों में सिरावेष | दशमोऽध्यायः | ||
| शरीर का पालन करनेवाली | के प्रयोजन | ३३८ | गर्भिणी व्याकरण शरीर का | ||
| चार प्रकार की सिराएँ | ३२६ | सिरावेष विधि ✓ | ३३८ | व्याख्यान | ३४६ |
| ममों की परीक्षा कर शल्य ✓ | सिरावेष का अयोग्य काल ✓ | ३३८ | गर्भिणी के प्रथम दिन से | ||
| निकालना चाहिये | ३२७ | सिरावेष के लिये यन्त्रविधि | ३३८ | कर्तव्य | ३४६ |
| प्राणहर ममों के मारने की ✓ | प्रदेश विशेष से शस्त्र का | गर्भिणी को मासक्रम से सेवने | |||
| कालविधि | ३२७ | प्रमाण | ३३६ | योग्य | ३४६ |
| टांग के ममों का व्याख्यान | ३२८ | सिरावेष ऋतुभेद से कालभेद ✓ | ३४० | नवम मास में सूतिका ग्रह | |
| उदर और छाती के ममों का | मुनिद्ध सिरा लक्षण | ३४० | प्रवेश | ३५० | |
| व्याख्यान | ३२६ | सिरावेष से पहले दूषित | प्रसव के स्पष्ट लक्षण | ३५० | |
| पृष्ठ के ममों का व्याख्यान | ३२६ | रक्त का निकालना | ३४० | प्रसव को जानकर करने | |
| जनु के ऊपर के ममों का | क्षीण व्यक्ति के सिरावेष का | योग्य उपचार | ३५० | ||
| व्याख्यान | ३३० | समय | ३४० | प्रतिलोम को अनुलोम करना | ३५१ |
१४
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| गर्भ के योनि में रुकने पर | |
| धूपन | ३५२ |
| प्रसव होर पर शिशु के उपचार | ३५२ |
| प्रसव के ३-४ दिन बाद दूध का आना | ३५२ |
| पहले ३-४ दिन में बच्चे को क्या पिलाना | ३५३ |
| स्तिका के उपचार | ३५३ |
| प्रसूता के मिथ्या आचार आदि से उत्पन्न रोग | ३५४ |
| अपरा के बाहर न आने से दोष और चिकित्सा | ३५५ |
| प्रसूता में मल्ल लक्षण तथा उनकी चिकित्सा | ३५६ |
| बालक के उपचार | ३५६ |
| दसवें दिन बालक का नाम-कारण | ३५६ |
| धात्री के लक्षण | ३५६ |
| बच्चे को कैसा दूध नहीं देना चाहिये | ३५६ |
| दूध को बढ़ाने के उपाय | ३५६ |
| दूध की परीक्षा | ३५६ |
| धात्री के दूषित स्तन का हेतु | ३५७ |
| अनजान बच्चे के रोग को जानने का उपाय | ३५७ |
| उन रोगों की चिकित्सा | ३५८ |
| बालक को नीरोग तथा उसमें बल आदि के उपाय | ३५८ |
| बालक को कैसे उठाना-बिठाना चाहिये | ३६० |
| माता का दूध पर्याप्त मात्रा के अभाव में देने योग्य दूध | ३६० |
| बालक की ग्रहों से रक्षा | ३६० |
| ग्रहों से आक्रान्त शिशु के सामान्य लक्षण | ३६१ |
| बालक का विद्याध्ययन | ३६१ |
| छोटी आयु की कन्या में गर्भाधान नहीं करना चाहिये | ३६२ |
| गर्भाधान के अयोग्य ली पुरुष | ३६२ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| गर्भिणी के उपद्रवों की चिकित्सा | ३६२ |
| प्रत्येक मान में देनेवाली औषधियाँ | ३६३ |
| शारीर अध्याय के कोष्ठक | ३६५-३७८ |
| चिकित्सास्थान | |
| प्रथमोऽध्यायः | |
| द्विभ्रणीय चिकित्सा का व्याख्यान | ३७६ |
| ग्रहों के दो प्रकार | ३७६ |
| आगन्तुज ब्रण में कर्म ही | |
| विशेष प्रयोजन | ३८० |
| दोष के उपप्लवभेद से ब्रणभेद | ३८० |
| ब्रण के २ प्रकार के लक्षण | ३८० |
| वातजन्य ब्रण | ३८० |
| ब्रण के साठ उपक्रम | ३८१ |
| ब्रण के अवस्थाभेद से करने योग्य उपचार | ३८१ |
| अपतर्पण का निरूपण | ३८२ |
| किनको उपवास लंघन न कराना चाहिये | ३८२ |
| आलेपन विषय | ३८२ |
| आलेपन का फल | ३८२ |
| परिषेक का फल तथा प्रयोग | ३८२ |
| अभ्यंग का फल | ३८२ |
| स्वेदन | ३८३ |
| विस्लापन तथा प्रयोग | ३८३ |
| उपनाह | ३८३ |
| पाचन तथा प्रयोग | ३८३ |
| स्लावण | ३८३ |
| स्नेहपान, वमन, विरेचन | ३८३ |
| छेदन, भेदन, दारण, लेखन, ऐषण | ३८४ |
| शल्यकर्म, व्यधन-स्लावण | ३८४ |
| सीना और सन्धान | ३८४ |
| पीडन, रक्त-स्थापन, निर्वापण | ३८४ |
| उत्कारिका शोधन कषाय, शोधन वर्ति | ३८५ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| घृत सिद्ध करने के शोधन | ३८५ |
| तैल से शोधन | ३८५ |
| जो ब्रण तैल से शुद्ध न हों उनमें रसक्रिया बरतें | ३८५ |
| शोधनीय चूर्ण प्रयोग | ३८६ |
| रोपण-कषाय, रोपण-वर्ति | ३८६ |
| रोपण-कल्ल रोपण-सर्पि, रोपण तैल, रोपण रसक्रिया, रोपण-चूर्ण | ३८६ |
| शोधन रोपण विधि मंत्र की भाँति गुणों को दोषों के अनुसार मिलाकर बरते | ३८६ |
| धूपन प्रयोग | ३८७ |
| उत्सादन, अवसादन | ३८७ |
| कोमल उपचार दारण कर्म | ३८७ |
| क्षार क्रिया | ३८८ |
| अनिकर्म, कृष्णकर्म, पाण्डुकर्म | ३८८ |
| ग्रहों पर प्रतिसारण | ३८८ |
| पुनः बाल उगने के उपाय | ३८९ |
| बालनाशक उपाय | ३८९ |
| वस्ति योग्य ब्रण | ३८९ |
| उत्तर वस्ति योग्य ब्रण | ३८९ |
| ब्रण-पर पट्टी बाँधने का कारण | ३८९ |
| पत्र का उपयोग | ३८९ |
| ब्रण से क्रमियों को निकालना | ३९० |
| शिरोविरेचन विषय नस्य विषय | ३९० |
| शोधन तथा रोपण के लिये शीतल कवल | ३९० |
| धूमपान विषय | ३९० |
| घृत विषय | ३९० |
| यंत्र विषय | ३९१ |
| ब्रणरोगियों को उष्ण और अग्निदीपक आहार | ३९१ |
| ब्रणरोगी की राक्षसों से रक्षा | ३९१ |
| ब्रण की संक्षेप से मूलाधिष्ठान लक्षण चिकित्सा | ३९१ |
| अप्राप्त औषध में उपपत्ति के अनुसार चिकित्सा | ३९१ |
| ब्रणरोगी के उपद्रव बहुत प्रकार के हैं | ३९१ |
विषयानुक्रमणिका
१५
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| द्वितीयोऽध्यायः ✓ | |
| सद्योन्न चिकित्सा व्याख्यान | ३६२ |
| भिन्न भिन्न प्रकार के ब्रणों के लक्षण | ३६२ |
| आगन्तु ब्रण के छ प्रकार ✓ | ३६२ |
| छिन्न, भिन्न, कोष्ठ, कोष्ठ भेद के सामान्य लक्षण | ३६२ |
| विशेष लक्षण | ३६२ |
| विद्ध, क्षत, पिच्छित, घृष्ट लक्षण | ३६२ |
| छिन्न भिन्न आदि चारों की चिकित्सा | ३६३ |
| पिच्छित तथा घृष्ट की चिकित्सा | ३६३ |
| छिन्न ब्रणों की चिकित्सा | ३६३ |
| कान की विशेष चिकित्सा | ३६३ |
| तिरस्त्र प्रहारों के कारण चौड़ा ब्रण होने की चिकित्सा | ३६४ |
| पीठ में ब्रण की चिकित्सा | ३६४ |
| कटी हुई शाखा में रोपण क्रिया | ३६४ |
| ब्रण रोपण के लिये चन्दनादि तैल | ३६५ |
| दूसरा चन्दनादि तैल | ३६५ |
| नेत्र में भिन्न ब्रण की चिकित्सा | ३६५ |
| सब नेत्राभिधातों में बकरी के घी का प्रयोग | ३६५ |
| पेट में से भेद की वर्त्ति निकलने की चिकित्सा | ३६५ |
| कोष्ठगत शल्य लक्षण | ३६६ |
| कोष्ठगत असाध्य ब्रण | ३६६ |
| कोष्ठ के फट जाने पर रक्त को पीना | ३६६ |
| कोष्ठ के फट जाने पर भी जो जीता है | ३६६ |
| अन्तभेद चिकित्सा | ३६६ |
| रोपण के लिये तैल | ३६६ |
| जिस पुरुष के अण्ड बाहर आ गये हों उसकी चिकित्सा | ३६७ |
| घिर के ब्रण की चिकित्सा | ३६७ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| शरीर के अन्य भाग के ब्रण की चिकित्सा | ३६७ |
| तैल का प्रयोग | ३६७ |
| तालीशादि तैल | ३६७ |
| क्षत तथा पिच्छित ब्रण चिकित्सा | ३६७ |
| घृष्ट ब्रण की चिकित्सा | ३६७ |
| मर्म स्थानों पर चोट लगने से चिकित्सा | ३६७ |
| रोगी को खदा मृदु, शरीर को देखकर घी या तैल देना चाहिये | ३६७ |
| सद्यःक्षत ब्रणवाले को तेल से परिषेक करे | ३६७ |
| दूषित सद्यःक्षत ब्रणों में तैल | ३६७ |
| दूषित ब्रणों में वमन विरेचन | ३६८ |
| द्रवन्ती आदि तैल | ३६८ |
| कल्क | ३६८ |
| छः ही सबसे श्रेष्ठ हैं | ३६८ |
| चतुर्थोऽध्यायः | |
| भग्गचिकित्सा का व्याख्यान | ३६९ |
| भग्ग रोग किनमें कठिनाई से अच्छा होता है | ३६९ |
| भग्ग रोगी को न सेवन करने योग्य | ३६९ |
| भग्ग रोगी को देने योग्य लेप | ३६९ |
| मृदुओं को देखकर पट्टी बाँधनी | ३६९ |
| भग्ग में साधारण बन्ध ठीक है | ३६९ |
| परिषेचन में कषाय | ३६९ |
| दोष और काल की विवेचनाकर | ३६९ |
| भग्ग में पीने योग्य दूध | ४०० |
| ब्रण वाले भग्गों में घी और मधु | ४०० |
| मुखसाध्य भग्ग | ४०० |
| सन्धि को हट जाने का समय | ४०० |
| शरीर की सब प्रकार की सन्धियों को ठीक बिठाना चाहिये | ४०० |
| नखसन्धि, भग्ग की चिकित्सा | ४०० |
| अकुली, " " | ४०० |
| पैर के तल्लुए, " " | ४०० |
| जंघा और ऊरू, " " | ४०० |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ऊर्वस्थि, भग्ग की चिकित्सा | ४०० |
| कटि, के " " | ४०० |
| पशु काओं, " " | ४०० |
| अंससन्धि " " | ४०१ |
| कूर्परसन्धि " " | ४०१ |
| जानु-गुल्फ, " " | ४०१ |
| हथेली, " " | ४०१ |
| अक्षक अस्थि के भग्ग की चिकित्सा | ४०१ |
| बाहुभग्ग ग्रीवा, हनुसन्धि ग्रीवा, दांत, नासा, कर्ण, शिर जंघा और ऊरू श्रोणी, घृष्ट अंस, वक्षस्थल, अक्षक के भग्ग होने पर | ४०२ |
| स्नेहन तथा स्वेदन | ४०२ |
| शिरोबस्ति तथा अनुवासन बस्ति भग्ग के लिये स्वस्थ करने-वाला तैल | ४०२ |
| भग्ग पकना नहीं चाहिये | ४०२ |
| चतुर्थोऽध्यायः | |
| वातव्याधि चिकित्सा का व्याख्यान | ४०३ |
| षड धरण | ४०३ |
| वायु के पक्षाशय में होने पर | ४०३ |
| वायु प्रकोप में स्नेहन, स्वेदन रक्तमोक्षण आदि | ४०३ |
| वायु के स्नायु-सन्धि और अस्थि में आने पर | ४०३ |
| अस्थि में वायु के भरजाने पर | ४०३ |
| वायु के शुक में आने पर | ४०४ |
| सर्वांगगत वायु में कफ, पित्त से मिली वायुको रक्त से आबूत वायु में | ४०४ |
| वात रोगियों को देने योग्य | ४०४ |
| सार्वण | ४०४ |
| जो अङ्ग संकुचित या जड़ बन गये हों | ४०४ |
| स्कन्ध, वक्ष, त्रिक और मन्धा-गत वायु | ४०४ |
| वात रोगियों के सेवनीय | ४०४ |
| तिल्व घृत | ४०४ |
१६
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| अणुतैल | ४०५ | वातकफजन्य अशों की चिकित्सा | अष्टमोऽध्यायः ✓ | ||
| शतपाक तैल | ४०५ | अग्नि और क्षार से | ४१४ | भगन्दरों की चिकित्सा का | |
| स्नेहलवण | ४०६ | पित्तरक्तजन्य अशों की मृदु | व्याख्यान | ४२१ | |
| कल्याण लवण | ४०६ | क्षार से | ४१४ | पांच प्रकार के भगन्दर | ४२१ |
| पंचमोऽध्यायः | अशों को जलाने की विधि | ४१४ | अपक्ष पिडिका वाली भगन्दरकी | ||
| महावातव्याधि चिकित्सा का | अर्श रोगी को खाने के लिये | ४१४ | ११ उपक्रमों से चिकित्सा | ४२२ | |
| व्याख्यान | ४०६ | अशों को जलाने के बाद | विशेष चिकित्सा | ४२२ | |
| वातरक्त के दो भेद | ४०६ | स्नेहकर्म | ४१४ | शतपोनक में व्रण को कभी चौड़ा | |
| वातरक्त के कारण तथा | क्षारकर्म, अग्निकर्म आदि बहुत | न करे | ४२२ | ||
| पूर्वरूप | ४०६ | सावधानी से करना चाहिये | ४१४ | डरपोक में शतपोनक कष्ट साध्य है | ४२२ |
| वातरक्त किनको होता है | ४०६ | अर्शयंत्र का प्रमाण | ४१५ | स्वेद विधि | ४२२ |
| वात प्रबल वातरक्त में लेप | ४०६ | अशों के लिये लेप | ४१५ | उध्मृीव चिकित्सा | ४२३ |
| पित्त प्रबल वातरक्त में लेप | ४०६ | न दीखनेवाले अशों के लिये | ४१५ | परिखाविक भगन्दर चिकित्सा | ४२३ |
| कफ प्रबल वातरक्त में लेप | ४०८ | दशमूलादि काथ | ४१५ | बच्चे में भगन्दर के लिये | ४२३ |
| सब प्रकार के वातरक्त में | ४०८ | पिप्पल्यादि काथ | ४१६ | गतिव्रणों को नष्ट करने के | |
| वातरक्त की तीव्र वेदना के | भल्लातकविधि | ४१६ | लिये वर्ति | ४२३ | |
| लिये काथ | ४०८ | द्वितीय विधि | ४१७ | आगन्तुज भगन्दर | ४२४ |
| वातरक्त में संवाहन | ४०८ | दोष की प्रधानता को देखकर | वेदना नाश के उपाय | ४२४ | |
| अपतन्त्रक रोगी की चिकित्सा | ४०८ | घृत अवलेह आदि देने चाहिये | ४१७ | भगन्दर के शोधन कार्य में | |
| पक्षाघात रोगीकी चिकित्सा | ४०९ | सप्तमोऽध्यायः ✓ | उत्तम द्रव्य | ४२४ | |
| मन्यास्तम्भ में चिकित्सा | ४१० | अश्मरी चिकित्सा का व्याख्यान | ४१८ | व्रण के शोधन में हितकारी | ४२४ |
| अपतर्पण रोगी की वातकफ | अश्मरी रोग के पूर्वरूपों में | भगन्दर शामक तैल | ४२४ | ||
| नाशक चिकित्सा करे | ४१० | स्नेहन आदि | ४१८ | अन्य कई प्रकारके तैल | ४२५ |
| अर्दित रोगीकी वातव्याधि | वातजन्य अश्मरी को नष्ट करने | नवमोऽध्यायः | |||
| चिकित्सा के अनुसार | वाला घृत | ४१८ | कुष्ठ चिकित्साव्याख्यान | ४२५ | |
| चिकित्सा | ४१० | कुश आदि के कल्क से सिद्ध | स्वर्ग रोग के कारण | ४२५ | |
| किन में सिरावेध न करे | ४११ | किया घृत | ४१८ | स्वर्ग रोगवाला व्यक्ति | ४२५ |
| कर्णशूल में | ४११ | वरुणादिगण के कल्क से सिद्ध | पथ्य | ४२५ | |
| तूनी, प्रतूनी में | ४११ | किया बकरी का घृत | ४१८ | पूर्वरूप में वमन, विरेचन | ४२५ |
| आध्यान में | ४११ | शर्करा नाशक कई चूर्ण | ४१८ | असाध्य कुष्ठ | ४२६ |
| अछीला और प्रत्यछीला में | ४१२ | अश्मरी, गुल्म, शर्करा को नष्ट | सर्व प्रथम वमन आदि संशोधन | ||
| हिंवादिचूर्ण | ४१२ | करने वाला क्षार | ४१८ | देकर स्नेहपान विधि से | |
| ऊरुस्तम्भ चिकित्सा | ४१२ | शर्करा नाशक क्षार | ४१९ | चिकित्सा | ४२६ |
| गुग्गुल आदि | ४१२ | अश्मरी में शस्त्रकर्म | ४१९ | महातिकक घृत | ४२६ |
| षष्ठोऽध्यायः ✓ | किसकी पथरी नहीं निकलनी | तिकक घृत | ४२६ | ||
| अशों की चिकित्सा का | चाहिये | ४२० | सात-सिद्ध लेप | ४२६ | |
| व्याख्यान | ४१३ | मृत्तमार्ग का शोधन | ४२० | ददु और शिवत्रों के लिये | |
| चार प्रकारकी अशों की | शस्त्रकर्म के समय आठ अशों | विशेष योग | ४२७ | ||
| चिकित्सा | ४१३ | को बचाये | ४२१ | छाले उत्पन्न करना | ४२७ |
| अशों पर क्षार प्रयोग | ४१३ | छाछों के फूटने पर लेप | ४२७ |
विषयानुक्रमणिका
१७
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| क्षेत्र नष्ट करने के कई उपाय | ४२८ |
| किलास नाश का उपाय | ४२८ |
| नीलघृत | ४२८ |
| महानील घृत | ४२८ |
| कुष्ठरोगी के लिये वसन | |
| विरेचन अवश्य | ४२९ |
| कुष्ठरोग के लिये सिद्ध किया | |
| पुरातन घृत कुष्ठ नाशक | ४२९ |
| स्नान में क्वाथ | ४३० |
| नीम का क्वाथ | ४३० |
| कुष्ठ में क्रमि नाश के लिये | ४३० |
| वज्रक तैल | ४३० |
| महावज्रक तैल | ४३० |
| लाक्षादि तैल | ४३१ |
| दोषों के शांत होने पर स्नान | |
| क्वाथ तथा पीने के लिये | ४३१ |
| दोष का प्रकोप न हो ऐसे | |
| उपाय | ४३१ |
| सम्पूर्ण रूप में वरता खैर कुष्ठ को | |
| शक्ति भर नष्ट कर देता है | ४३१ |
| दशमोऽध्यायः | |
| महाकुष्ठ चिकित्सा व्याख्यान | ४३१ |
| मन्थकल्प | ४३२ |
| अरिष्टों का वर्णन | ४३२ |
| आसवों का वर्णन | ४३२ |
| सुरा का वर्णन | ४३२ |
| लेहों का वर्णन | ४३२ |
| चूर्ण किया | ४३३ |
| अयस्कृतिका वर्णन | ४३३ |
| खदिर विधान | ४३४ |
| गिलोय का क्वाथ | ४३४ |
| काले तिलादि का योग | ४३५ |
| एकादशोऽध्यायः | |
| प्रमेह चिकित्सा की व्याख्या | ४३५ |
| दो प्रकार का प्रमेह | ४३५ |
| रुध के लिये संस्कृत किया | ४३५ |
| रक्त पुरुष के लिये अपतर्पणवाली | |
| किया | ४३५ |
| सब प्रकार के प्रमेही को |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| त्यागने योग्य | ४३६ |
| सब प्रकार के प्रमेही को खाने योग्य | ४३६ |
| स्निग्ध प्रमेह रोगी के लिये | ४३६ |
| पांच योग सब प्रमेहों के लिये | ४३६ |
| विशेषरूप से वर्णन | ४३६ |
| बड़े ऐश्वर्य वाले के लिये | ४३७ |
| गरीब के लिये | ४३८ |
| द्वादशोऽध्यायः | |
| प्रमेह पिडका चिकित्सा व्याख्यान | ४३८ |
| साध्य पिडकायें | ४३९ |
| प्रमेह रोगी की प्रारम्भ में ही चिकित्सा | ४३९ |
| धान्वन्तर घृत | ४३९ |
| तीक्ष्ण विरेचन | ४४० |
| स्वेद कभी भी न देना चाहिये | ४४० |
| प्रमेहियों में दोष ऊपर को नहीं जाते | ४४० |
| अपक्व तथा पक्व पिडकाओं की चिकित्सा | ४४० |
| लेह सब प्रमेहों के नाश के लिये | ४४० |
| नवायस | ४४० |
| लोहारिष्ट | ४४० |
| त्रयोदशोऽध्यायः | |
| मधुमेह चिकित्साका व्याख्यान | ४४१ |
| शिलाजतु रंगादि छ में से किसी के मिला रहता है | ” |
| जो शिलाजतु लौह से उत्पन्न होता है | ” |
| रंगादि छ में से शिलाजतु उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता है | ” |
| सब प्रकार के शिलाजतु | ४४१ |
| शिलाजतु सब रोगों को नष्ट करता है | ४४१ |
| शिलाजतु और माक्षिक सेवन करनेवाला कपोत और कुलत्थ को छोड़ दे | ४४१ |
| तुवरक फल का तैल | ४४१ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| चतुर्दशोऽध्यायः | |
| उदररोग की चिकित्सा का व्याख्यान | ४४२ |
| बद्धगुदोदर और परिखावी असार्ध शेष कष्ट साध्य | ४४२ |
| उदररोगी को खाने योग्य | ४४३ |
| वातोदररोगी के लिये विदारीगन्धादि | ४४४ |
| पित्तोदररोगी को काकोल्थादि | ४४४ |
| कफोदररोगी को पिप्पल्यादि | ४४४ |
| दृष्योदररोगी के लिये घृत | ४४५ |
| इसमें सामान्ययोग | ४४५ |
| कोष्ठ के क्रमियों को नाश करने के लिये | ४४५ |
| आनाहवर्ति किया | ४४६ |
| प्लीहोदररोगी के लिये | ४४६ |
| घट्टपलक घृत | ४४६ |
| प्लीहा की शांति के लिये | ४४६ |
| बद्धगुद उदर तथा परिखावि उदर के लिये | ४४६ |
| पञ्चदशोऽध्यायः | |
| दकोदर रोगी के लिये | ४४७ |
| मृदुगर्भ चिकित्साव्याख्यान | ४४७ |
| मृदुगर्भ को निकालना महाकठिन | ४४८ |
| मृदु गति आठ प्रकार की होती है | ” |
| गर्भ के जीवित रहने पर | ” |
| अपरा पातन की औषधियों का प्रयोग | ४४९ |
| अन्य उपाय | ” |
| पिप्पली आदि का प्रयोग | ४५० |
| बला तैल | ” |
| तिलों को बला क्वाथ से भावित कर तैल निकालना | ४५० |
| शतपाकी तैल | ” |
| बला तैल के समान तैल | ४५१ |
| षोडशोऽध्यायः | |
| विद्रधि की चिकित्सा का व्याख्यान | ४५१ |
१६
विषय
पच साध्य बिद्रधियां
वातजन्यविद्रषि
पित्तजविद्रधि
करंजादिघत
कफजन्यविद्रषि में
रक्तजन्य ओर आगन्व॒ज
विद्रधिर्या
कृफजन्य अन्तः विद्रधि
पक्र विद्रधि की चिकिस्छा
मज्जाजन्यविद्रषि सप्रदओोऽध्यायः विसरष-नाडी-स्तन रोग
चिकित्सा ६ साध्य तथा असाध्य विप
वातजन्यविसप
पित्तजन्यविसपं मे केप
गोयांदिघत
कृफजन्य विखप के लिये अजगन्धा
आदि्छेप
वरुणादिगण का प्रयोग
वरेण को शोघन करनेवाला
तेल ` पित्तजन्य नादी =
कोष्टस्थित नाडी को नष्ट
करने का घत
कफजन्य नाडी में
हाल्यजन्य नाडी में
कृश दुं पुरष की नाडी
सब वर्तयां नाड्यां में
बरतनी चाहिये
दुध क विक्त होने पर
उसका शोघन
स्तन विद्रधि
ग्रन्थि, अपची अदु द्, गक्ग्ण्ड ।
। चिकित्षा का व्याख्यान
४५
2
सुश्रतसं हितां
पुष | विषय
४५१ | पित्तजन्य म्रन्थि मे
४५१ | कफजन्य ग्रन्थि मं
५१ | जो ग्रन्थि उपरोक्त चिकित्षा
से शातन दहो उसे चीरकर
निकाल दं
मांस कन्दी के लि
मे दोजन्यग्रन्थि में
जीमूतक आदि से सिद्ध घुत
ममंस्थान से रहित स्थानों मे
अपक्त म्रथिरयों के विषय में
इन्द्रवस्तिमम
अपंचियों क निड्त्ति के यि
रोपण काल में
कर्कार चूर्णं आदि पित्ताबुदमें कफाबुद में
अन्द् पर ल्ेपादि ` मेदो द स्वेदन आदिः
बातजन्य गण्ड मे स्वेद
कफजन्य गण्ड मं स्वेद आदि
४५४
४५४
४५४
४५४
४५४
$प्र ४
क न च ४५४
मेदोजन्य गलगण्ड में ४११ स्नेहन आदि
४१५
४५५
५२ का व्याख्यान `
बृद्धिरोग
वातब्रद्धि मे -
पित्तजन्य इद्धि में
फफजन्य बृद्धि भ
मेदजन्य ब्द्धि्मे ..
. | मूत्रजन्यव्रद्धिमे
-साध्यउपदंशोर्मे
वातजन्य उपदंश में
वैत्तिकं उपदंश मे
५५६
४५७ ४१७
| प्रकारे उपद्श् के ल्थि चूण
गर्रण्डरोग मे चिकट आदि `
एकोनविज्ञोऽध्यायः
चरद्धिः उपदंश, श्टीपद, चिकित्सा
अत्रबदिको छोड बाकी-छ ~ =:
--3 ४६२ - ४६३
२४६३
९२
~ ~
ः = < | < 4 ४६४ ४६४
४: कफजन्य उपदंश मँ ~ ˆ - : ४६४
| उपद्् चिक्त्ा सब : 1 ४६५ ६
पृष्ठ
४५८
४६८
४५६
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४५६
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४६१
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४६२१
४६२ ~ ४६२
23
४६२
४६२
४६२
४६२
-जवुमणि आदि ्
न्यच्छ, व्यंग ओर नीलिका
-चिषश्ड प्रकशमं.
गुद्श्रशम -4
एकविंशतितमोऽध्यायः |
शक्रदोष चिकिस्वा का व्याख्यान . ४५
अष्टील्कामे ` -
विषय
उपद॑शों मँ रोपण के स्यि तेख तरणजन्य विषपं के.ख्यि चूं
रक्त जन्य ओर सन्निपातजन्य
उपदश
सन्निपातजन्य उपदंश में विशेष
चिकित्सा
वातजन्यश्लोपद मे स्नेहन आदि
कफजन्य श्लोपद् में
पित्तजन्य श्लोपद् में
पानीयक्षार
काकादनी आदिमे सिद
किथा तेख
त्रिफला क्राथ मिलाया क्षार
विंशतितमोऽध्यायः
लुद्ररोग चिकित्साका व्याख्यान
अपक्व अजगल्लिका मं
स्वेद तथा लेप
पित्तजन्य विसपुः
चिप्परोग~;“
पकी विदारिका को चीरना
शकरा दकी चिकित्सा
पाददारी मे स्नेहन आदि
अलसरोगण म~~
इन्द्रलुक्त मं
अरूषिका में
दाङ्णकःरोग मं मसूरिका मे
युवान पिड़काओं मे
पद्मिनी कटक रोगमं.
परिवर्तिकामं
वल्मीकमं ._
अहिपूतना रोग मं
सषपी मं व्रण रोपकः तेल