सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ
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विषणानुक्रमणिका
१३
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| पञ्चमोऽध्यायः | ममों की लम्बाई चौड़ाई | ३३० | दोषयुक्त शेषरक्त की चिकित्सा ✓ | ||
| शरीर संख्या व्याकरण | मर्म स्थान को बचाकर | संशमन से | ३४० | ||
| व्याख्या | ३१६ | शस्त्रकर्म | ३३० | बलवान् व्यक्ति के रक्त निकालने | |
| शरीर नाम कितने कहते हैं | ३१६ | अमर्म आदि स्थानों के छेदन-भेदन | का परिमाण | ३४० | |
| शरीर के अंग प्रत्यंग | ३१६ | से मृत्यु नहीं होती | ३३२ | भिन्न २ रोगों में सिरावेष का ✓ | |
| आशय, आंत, खोल | ३१६ | सद्यः प्राणहर ममों पर आघात | परिमाण | ३४१ | |
| कण्डरार्य, जालकों, कूर्च | ३१८ | लगने से इन्द्रिय विषय | दूषितरू में वेधन हुई सिराएँ | ३४१ | |
| बड़ीमांस रज्जु, सेवनी, अस्थिकायों | ज्ञान नहीं | ३३२ | दूषित सिराओं का विवरण | ३४१ | |
| के संघात सीमान्त | ३१८ | ममों पर आघात पहुँचने से प्रायः | सिराओं का वेधन यत्न पूर्वक | ३४१ | |
| अस्थियों की संख्या | ३१६ | विकलता (मृत्यु) अवश्य | सिरावेष रोग जल्दी शान्त | ||
| सन्धियों के दो प्रकार | ३२० | होती है | ३३३ | होते हैं | ३४१ |
| सन्धियों की संख्या | ३२० | सप्तमोऽध्यायः | शल्यतंत्र में आधी चिकित्सा | ||
| स्नायु | ३२१ | सिरा वर्ण विभक्ति शरीर | ३३३ | सिरावेष है | ३४१ |
| पेशियाँ तथा उनका आकार | ३२२ | सात सौ शिराएँ स्वरूप | ३३३ | सिरावेष आदि के लिये त्याज्य | |
| प्रत्यक्ष तथा शस्त्र दोनों ही ज्ञान | नाभि, प्राण और सिराओं | बातें | ३४२ | ||
| बुद्धि के कारण हैं | ३२३ | का सम्बन्ध | ३३३ | दूषित रक्त को निकालने का ✓ | |
| आत्मा को कैसे देखा जाता है | ३२४ | मूल सिरा और दोषवह सिराओं | तरीका | ३४२ | |
| षष्ठोऽध्यायः ✓ | की संख्या | ३३४ | नवमोऽध्यायः | ||
| मर्म निर्देश शरीर का | वातवह सिराओं का प्राकृत | धमनी व्याकरण शरीर की | |||
| व्याख्यान | ३२४ | कार्य | ३३४ | व्याख्या | ३४३ |
| मर्म के १०७ प्रकार ✓ | ३२४ | वातपित्तकफ सिराओं का रंग | ३३५ | धमनी की २४ संख्या | ३४३ |
| टांग पेट और छाती, पीठ, बाहु, | अवेध्य सिराएँ | ३३५ | ऊपर को जानेवाली धमनियाँ | ३४३ | |
| जनु से ऊपर के ममे | ३२४ | अष्टमोऽध्यायः | नीचे की ओर जानेवाली | ||
| मांसमर्म, सिरामर्म, स्नायुमर्म, ✓ | सिराव्येष विधि शरीर की ✓ | धमनियाँ | ३४५ | ||
| अस्थिमर्म, सन्धिमर्म | ३२४ | व्याख्या | ३३७ | तिर्यगगत धमनियाँ | ३४७ |
| मर्म के पाँच भेद ✓ | ३२५ | किन अवस्थाओं में सिरावेष ✓ | खोलों के मूल में बुद्ध होने से | ||
| प्राणहर मर्म ✓ | ३२५ | न करे | ३३८ | उत्पन्न लक्षण | ३४८ |
| मर्म का लक्षण ✓ | ३२५ | निषिद्ध रोगियों में सिरावेष | दशमोऽध्यायः | ||
| शरीर का पालन करनेवाली | के प्रयोजन | ३३८ | गर्भिणी व्याकरण शरीर का | ||
| चार प्रकार की सिराएँ | ३२६ | सिरावेष विधि ✓ | ३३८ | व्याख्यान | ३४६ |
| ममों की परीक्षा कर शल्य ✓ | सिरावेष का अयोग्य काल ✓ | ३३८ | गर्भिणी के प्रथम दिन से | ||
| निकालना चाहिये | ३२७ | सिरावेष के लिये यन्त्रविधि | ३३८ | कर्तव्य | ३४६ |
| प्राणहर ममों के मारने की ✓ | प्रदेश विशेष से शस्त्र का | गर्भिणी को मासक्रम से सेवने | |||
| कालविधि | ३२७ | प्रमाण | ३३६ | योग्य | ३४६ |
| टांग के ममों का व्याख्यान | ३२८ | सिरावेष ऋतुभेद से कालभेद ✓ | ३४० | नवम मास में सूतिका ग्रह | |
| उदर और छाती के ममों का | मुनिद्ध सिरा लक्षण | ३४० | प्रवेश | ३५० | |
| व्याख्यान | ३२६ | सिरावेष से पहले दूषित | प्रसव के स्पष्ट लक्षण | ३५० | |
| पृष्ठ के ममों का व्याख्यान | ३२६ | रक्त का निकालना | ३४० | प्रसव को जानकर करने | |
| जनु के ऊपर के ममों का | क्षीण व्यक्ति के सिरावेष का | योग्य उपचार | ३५० | ||
| व्याख्यान | ३३० | समय | ३४० | प्रतिलोम को अनुलोम करना | ३५१ |