भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठ
गर्भ के योनि में रुकने पर
धूपन३५२
प्रसव होर पर शिशु के उपचार३५२
प्रसव के ३-४ दिन बाद दूध का आना३५२
पहले ३-४ दिन में बच्चे को क्या पिलाना३५३
स्तिका के उपचार३५३
प्रसूता के मिथ्या आचार आदि से उत्पन्न रोग३५४
अपरा के बाहर न आने से दोष और चिकित्सा३५५
प्रसूता में मल्ल लक्षण तथा उनकी चिकित्सा३५६
बालक के उपचार३५६
दसवें दिन बालक का नाम-कारण३५६
धात्री के लक्षण३५६
बच्चे को कैसा दूध नहीं देना चाहिये३५६
दूध को बढ़ाने के उपाय३५६
दूध की परीक्षा३५६
धात्री के दूषित स्तन का हेतु३५७
अनजान बच्चे के रोग को जानने का उपाय३५७
उन रोगों की चिकित्सा३५८
बालक को नीरोग तथा उसमें बल आदि के उपाय३५८
बालक को कैसे उठाना-बिठाना चाहिये३६०
माता का दूध पर्याप्त मात्रा के अभाव में देने योग्य दूध३६०
बालक की ग्रहों से रक्षा३६०
ग्रहों से आक्रान्त शिशु के सामान्य लक्षण३६१
बालक का विद्याध्ययन३६१
छोटी आयु की कन्या में गर्भाधान नहीं करना चाहिये३६२
गर्भाधान के अयोग्य ली पुरुष३६२
विषयपृष्ठ
गर्भिणी के उपद्रवों की चिकित्सा३६२
प्रत्येक मान में देनेवाली औषधियाँ३६३
शारीर अध्याय के कोष्ठक३६५-३७८
चिकित्सास्थान
प्रथमोऽध्यायः
द्विभ्रणीय चिकित्सा का व्याख्यान३७६
ग्रहों के दो प्रकार३७६
आगन्तुज ब्रण में कर्म ही
विशेष प्रयोजन३८०
दोष के उपप्लवभेद से ब्रणभेद३८०
ब्रण के २ प्रकार के लक्षण३८०
वातजन्य ब्रण३८०
ब्रण के साठ उपक्रम३८१
ब्रण के अवस्थाभेद से करने योग्य उपचार३८१
अपतर्पण का निरूपण३८२
किनको उपवास लंघन न कराना चाहिये३८२
आलेपन विषय३८२
आलेपन का फल३८२
परिषेक का फल तथा प्रयोग३८२
अभ्यंग का फल३८२
स्वेदन३८३
विस्लापन तथा प्रयोग३८३
उपनाह३८३
पाचन तथा प्रयोग३८३
स्लावण३८३
स्नेहपान, वमन, विरेचन३८३
छेदन, भेदन, दारण, लेखन, ऐषण३८४
शल्यकर्म, व्यधन-स्लावण३८४
सीना और सन्धान३८४
पीडन, रक्त-स्थापन, निर्वापण३८४
उत्कारिका शोधन कषाय, शोधन वर्ति३८५
विषयपृष्ठ
घृत सिद्ध करने के शोधन३८५
तैल से शोधन३८५
जो ब्रण तैल से शुद्ध न हों उनमें रसक्रिया बरतें३८५
शोधनीय चूर्ण प्रयोग३८६
रोपण-कषाय, रोपण-वर्ति३८६
रोपण-कल्ल रोपण-सर्पि, रोपण तैल, रोपण रसक्रिया, रोपण-चूर्ण३८६
शोधन रोपण विधि मंत्र की भाँति गुणों को दोषों के अनुसार मिलाकर बरते३८६
धूपन प्रयोग३८७
उत्सादन, अवसादन३८७
कोमल उपचार दारण कर्म३८७
क्षार क्रिया३८८
अनिकर्म, कृष्णकर्म, पाण्डुकर्म३८८
ग्रहों पर प्रतिसारण३८८
पुनः बाल उगने के उपाय३८९
बालनाशक उपाय३८९
वस्ति योग्य ब्रण३८९
उत्तर वस्ति योग्य ब्रण३८९
ब्रण-पर पट्टी बाँधने का कारण३८९
पत्र का उपयोग३८९
ब्रण से क्रमियों को निकालना३९०
शिरोविरेचन विषय नस्य विषय३९०
शोधन तथा रोपण के लिये शीतल कवल३९०
धूमपान विषय३९०
घृत विषय३९०
यंत्र विषय३९१
ब्रणरोगियों को उष्ण और अग्निदीपक आहार३९१
ब्रणरोगी की राक्षसों से रक्षा३९१
ब्रण की संक्षेप से मूलाधिष्ठान लक्षण चिकित्सा३९१
अप्राप्त औषध में उपपत्ति के अनुसार चिकित्सा३९१
ब्रणरोगी के उपद्रव बहुत प्रकार के हैं३९१