सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ
पृष्ठ 31, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 31
विषयानुक्रमणिका
१५
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| द्वितीयोऽध्यायः ✓ | |
| सद्योन्न चिकित्सा व्याख्यान | ३६२ |
| भिन्न भिन्न प्रकार के ब्रणों के लक्षण | ३६२ |
| आगन्तु ब्रण के छ प्रकार ✓ | ३६२ |
| छिन्न, भिन्न, कोष्ठ, कोष्ठ भेद के सामान्य लक्षण | ३६२ |
| विशेष लक्षण | ३६२ |
| विद्ध, क्षत, पिच्छित, घृष्ट लक्षण | ३६२ |
| छिन्न भिन्न आदि चारों की चिकित्सा | ३६३ |
| पिच्छित तथा घृष्ट की चिकित्सा | ३६३ |
| छिन्न ब्रणों की चिकित्सा | ३६३ |
| कान की विशेष चिकित्सा | ३६३ |
| तिरस्त्र प्रहारों के कारण चौड़ा ब्रण होने की चिकित्सा | ३६४ |
| पीठ में ब्रण की चिकित्सा | ३६४ |
| कटी हुई शाखा में रोपण क्रिया | ३६४ |
| ब्रण रोपण के लिये चन्दनादि तैल | ३६५ |
| दूसरा चन्दनादि तैल | ३६५ |
| नेत्र में भिन्न ब्रण की चिकित्सा | ३६५ |
| सब नेत्राभिधातों में बकरी के घी का प्रयोग | ३६५ |
| पेट में से भेद की वर्त्ति निकलने की चिकित्सा | ३६५ |
| कोष्ठगत शल्य लक्षण | ३६६ |
| कोष्ठगत असाध्य ब्रण | ३६६ |
| कोष्ठ के फट जाने पर रक्त को पीना | ३६६ |
| कोष्ठ के फट जाने पर भी जो जीता है | ३६६ |
| अन्तभेद चिकित्सा | ३६६ |
| रोपण के लिये तैल | ३६६ |
| जिस पुरुष के अण्ड बाहर आ गये हों उसकी चिकित्सा | ३६७ |
| घिर के ब्रण की चिकित्सा | ३६७ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| शरीर के अन्य भाग के ब्रण की चिकित्सा | ३६७ |
| तैल का प्रयोग | ३६७ |
| तालीशादि तैल | ३६७ |
| क्षत तथा पिच्छित ब्रण चिकित्सा | ३६७ |
| घृष्ट ब्रण की चिकित्सा | ३६७ |
| मर्म स्थानों पर चोट लगने से चिकित्सा | ३६७ |
| रोगी को खदा मृदु, शरीर को देखकर घी या तैल देना चाहिये | ३६७ |
| सद्यःक्षत ब्रणवाले को तेल से परिषेक करे | ३६७ |
| दूषित सद्यःक्षत ब्रणों में तैल | ३६७ |
| दूषित ब्रणों में वमन विरेचन | ३६८ |
| द्रवन्ती आदि तैल | ३६८ |
| कल्क | ३६८ |
| छः ही सबसे श्रेष्ठ हैं | ३६८ |
| चतुर्थोऽध्यायः | |
| भग्गचिकित्सा का व्याख्यान | ३६९ |
| भग्ग रोग किनमें कठिनाई से अच्छा होता है | ३६९ |
| भग्ग रोगी को न सेवन करने योग्य | ३६९ |
| भग्ग रोगी को देने योग्य लेप | ३६९ |
| मृदुओं को देखकर पट्टी बाँधनी | ३६९ |
| भग्ग में साधारण बन्ध ठीक है | ३६९ |
| परिषेचन में कषाय | ३६९ |
| दोष और काल की विवेचनाकर | ३६९ |
| भग्ग में पीने योग्य दूध | ४०० |
| ब्रण वाले भग्गों में घी और मधु | ४०० |
| मुखसाध्य भग्ग | ४०० |
| सन्धि को हट जाने का समय | ४०० |
| शरीर की सब प्रकार की सन्धियों को ठीक बिठाना चाहिये | ४०० |
| नखसन्धि, भग्ग की चिकित्सा | ४०० |
| अकुली, " " | ४०० |
| पैर के तल्लुए, " " | ४०० |
| जंघा और ऊरू, " " | ४०० |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ऊर्वस्थि, भग्ग की चिकित्सा | ४०० |
| कटि, के " " | ४०० |
| पशु काओं, " " | ४०० |
| अंससन्धि " " | ४०१ |
| कूर्परसन्धि " " | ४०१ |
| जानु-गुल्फ, " " | ४०१ |
| हथेली, " " | ४०१ |
| अक्षक अस्थि के भग्ग की चिकित्सा | ४०१ |
| बाहुभग्ग ग्रीवा, हनुसन्धि ग्रीवा, दांत, नासा, कर्ण, शिर जंघा और ऊरू श्रोणी, घृष्ट अंस, वक्षस्थल, अक्षक के भग्ग होने पर | ४०२ |
| स्नेहन तथा स्वेदन | ४०२ |
| शिरोबस्ति तथा अनुवासन बस्ति भग्ग के लिये स्वस्थ करने-वाला तैल | ४०२ |
| भग्ग पकना नहीं चाहिये | ४०२ |
| चतुर्थोऽध्यायः | |
| वातव्याधि चिकित्सा का व्याख्यान | ४०३ |
| षड धरण | ४०३ |
| वायु के पक्षाशय में होने पर | ४०३ |
| वायु प्रकोप में स्नेहन, स्वेदन रक्तमोक्षण आदि | ४०३ |
| वायु के स्नायु-सन्धि और अस्थि में आने पर | ४०३ |
| अस्थि में वायु के भरजाने पर | ४०३ |
| वायु के शुक में आने पर | ४०४ |
| सर्वांगगत वायु में कफ, पित्त से मिली वायुको रक्त से आबूत वायु में | ४०४ |
| वात रोगियों को देने योग्य | ४०४ |
| सार्वण | ४०४ |
| जो अङ्ग संकुचित या जड़ बन गये हों | ४०४ |
| स्कन्ध, वक्ष, त्रिक और मन्धा-गत वायु | ४०४ |
| वात रोगियों के सेवनीय | ४०४ |
| तिल्व घृत | ४०४ |