सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
विषय पृष्ठ
पुरुष भी सत्व, रज, तमोमय कई आचार्य का मत है २८६
मनुष्य इंद्रियों द्वारा निश्चित इंद्रिय के अर्थ का ही ग्रहण करता है २८६
शरीर, आत्मा तथा मन के संयोग से जो गुण उत्पन्न होते हैं उनका वर्णन २८७
मन के सात्विक आदि गुण द्वितीयोऽध्यायः
शुक्र और शोणित का स्वरूप २८७
दूषितशुक्र २८७
क्षीणवीर्य के लक्षण २८७
साध्य तथा असाध्य २८८
दूषित आर्तव २८८
चिकित्सा २८८
शुद्ध शुक्र की परीक्षा २८९
आर्तवशुद्धि की चिकित्सा २८९
शुद्ध आर्तव की परीक्षा २९०
रक्तप्रदर २९०
संतान के उपयुक्त स्त्री पुरुष २९१
ऋतुकाल के समय स्त्री का कर्तव्य २९१
सहवास के पहले पुरुष तथा स्त्री का कर्तव्य २९२
उत्तम तथा निन्दित तिथियां २९२
ऋतुमती स्त्री के साथ सहवास के दोष २९३
गर्भस्थित होने पर वैद्य का कर्तव्य २९४
वर्णों की उत्पत्ति का कारण २९५
नपुंसक के लक्षण २९६
पापजन्मगर्भ आदि का वर्णन २९६
तृतीयोऽध्यायः
गर्भावकान्ति नामक अध्याय की व्याख्या २९७
शुक्र-आर्तव स्वरूप २९७
गर्भावतरणप्रक्रिया २९७
तृतीयोऽध्यायः
गर्भावकान्ति अध्याय की व्याख्या २९७
विषय पृष्ठ
शुक्र और आर्तव का सौम्याग्नेय स्वरूप २९७
मैथुन तथा शुक्रार्तव संयोग २९७
आत्मा के पर्याय तथा शुक्रार्तव के संयोग के समयप्रवेश २९७
गर्भ में पुरुष, स्त्री, नपुंसक होने के कारण २९८
ऋतुमती के लक्षण २९८
ऋतुकाल के पश्चात् योनीकी स्थिति २९८
आर्तव स्वरूप और उसके खवण की युक्ति २९८
आर्तव का प्रारम्भ और अन्त, समविषम दिन और सभागम का फल २९८
गर्भधारण करते ही स्त्री लक्षण २९८
गर्भिणी के लक्षण २९८
गर्भिणी को त्यागने योग्य प्रथम मास से लेकर चतुर्थ मास तक गर्भ का स्वरूप २९९
गर्भवती स्त्री की इच्छा पूर्ण करने का फल ३००
गर्भवती की इच्छा पूर्ति न करने से दोष ३००
गर्भवती की जो इच्छा होती रहती है उखी स्वभाववाली संतान उत्पन्न होती है ३००
पांचवें छठे, सातवें, आठवें महीनों के गर्भ का स्वरूप ३०१
आठवें महीने में बालक उत्पन्न होने से जीता नहीं ३०२
प्रसवकाल की मर्यादा ३०२
गर्भ पोषणक्रम ३०२
गर्भवृद्धि में अंगोत्पत्ति के मतमतान्तर और धन्वन्तरि का मत ३०२
मातापितादि से उत्पन्न होने वाले शरीर का लक्षण ३०२
गर्भ के स्त्री पुनपुंसक शरीर लक्षण ३०३
अंग प्रत्यंग के निर्माणमें गुण-अवगुण धर्म, अधर्म के कारण ३०३
विषय पृष्ठ
चतुर्थोऽध्यायः
गर्भव्याकरण नामक अध्याय शरीर के ११ प्राण सात त्वचाओं का निरूपण सात कलायें तथा लक्षण पुरुष में शुक्र प्रबुत्त होने का मार्ग ३०६
गर्भिणी में अनार्तव का हेतु ३०७
गर्भ के यकृतादि अंगों की उत्पत्ति की कल्पना ३०७
हृदय का स्वरूप ३०७
निद्रा का स्वरूप और प्रकार स्वप्नदर्शन का कारण ३०९
इन्द्रियों की विकलता के कारण आत्मा का सोया हुआ मालूम होना ३०९
दिन में सोने का योग्य काल और किन के लिये दिन में सोना ठीक है, उसके दोष रात्रि जागरणदोष ३१०
उचित प्रमाण की नींद से १०० वर्ष जीता है ३११
नींद न आने के कारण तथा चिकित्सा ३११
निद्रा के अतियोग में तन्त्रा, जम्भाई, कलम, आलस्य ग्लानि, गारव ३१२
गर्भ का शरीर कैसे बढ़ता है दृष्टि और रोमकूप कभी नहीं बढ़ते ३१२
नख और केश सदा बढ़ते हैं ३१३
सात प्रकार की प्रकृतियाँ प्रकृति की उत्पत्ति का हेतु ३१३
वात प्रकृति लक्षण ३१३
पित्तप्रकृति लक्षण ३१३
कफ प्रकृति लक्षण ३१४
पार्थिव तथा आकाश प्रकृति ३१४
सत्त्वादि गुणभेद से प्रकृति ३१४
राजस प्रकृति ३१५
तामस प्रकृति ३१५