सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
विषय पृष्ठ
उचित मात्रा में न दी हुई औषध क्या दोष करती है १४३
चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक विज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १४३
द्रव्य ही प्रधान है ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं १४४
द्रव्य का लक्षण १४४
रस ही प्रधान है ऐसा दूसरे आचार्य कहते हैं १४४
वीर्य ही प्रधान है ऐसा तीसरे आचार्य का मत १४४
विपाक ही प्रधान है ऐसा चौथे आचार्यों का मत है १४५
पाक भी दो प्रकार का है १४५
विपाक के दो भेद १४६
रस, वीर्य, विपाक में द्रव्य को ही श्रेष्ठ समझना १४६
शास्त्र की प्रधानता १४६
एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
द्रव्यविशेष विज्ञानीय अध्याय की व्याख्या १४७
द्रव्य की उत्पत्ति १४७
पार्ष्व द्रव्य १४७
आप्य द्रव्य १४७
वायवीय द्रव्य १४७
आकाशीय द्रव्य १४७
द्रव्य की कार्यशीलता, काल तथा कर्म १४७
द्रव्य के दो भेद (अधोमार्गी, ऊर्ध्वमार्गी) १४७
संशमनगुणवाले द्रव्य संग्राहक, दीपन, आग्नेय, लेखन, बुद्धि १४७
वीर्यसंज्ञक गुण १४८
पंचमहामृतों के समान गुण- वाले द्रव्यों में रस की विलक्षणता १४८
द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
रसविशेषविज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १४९
विषय पृष्ठ
सब मृतों में परस्पर सम्बन्ध बृद्धि तथा ह्राससे जाना जाता है १४९
जलीयरस के छ प्रकार १४९
परस्पर एक दूसरे से मिलने पर ६३ प्रकार १४९
कई आचार्यों के मत से रसों के दो भेद १४९
पित्त १५०
कफ १५०
रस के लक्षण १५०
रस के गुण १५०
अम्ल रस १५१
लवण रस १५१
कटु रस १५१
तिक्त रस १५१
कषाय रस १५१
मधुरवर्ग १५१
अम्लवर्ग १५१
लवणवर्ग १५१
कटुवर्ग १५१
तिक्तवर्ग १५१
कषायवर्ग १५१
छः रसों के परस्पर संयोग से ६३ भेद १५१
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
वमनद्रव्यविकल्पविज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १५३
मैनफलकल्प १५३
जीमूतकल्प १५३
कुटजकल्प १५३
कृतवेधनकल्प १५५
इन्द्राकुल्प १५५
धामागविकल्प १५५
वमन औषधियों का योजना प्रकार १५५
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
विरेचन द्रव्यविकल्प विज्ञानीय अध्याय की व्याख्या १५५
विरेचन में प्रधान द्रव्य १५५
त्रिदूतकल्प १५५
पित्तजन्य तथा कफजन्य रोग १५५
वातकफजरोग १५५
विषय पृष्ठ
मोदक १५६
वैरेचनीयद्रव्य चूर्ण १५६
यूषविधि १५६
पुटपाक रूपत्रिदूतकल्प १५६
वैरेचन लेह १५६
वैरेचन मोदक १५६
वैरेचन लेह गुटिका प्रयोग १५७
वैरेचन चूर्ण १५७
वैरेचन आसव १५७
वैरेचन पैष्टी सुरा १५७
वैरेचन सौवीर (कांजी) १५७
वैरेचन तुषोदक १५७
वैरेचन त्रिदूतमूलविधि १५८
दन्ती द्रवन्ती कल्प १५८
दन्ती द्रवन्ती स्नेहयोग १५८
दन्त्यादिमोदक १५८
व्योषादिविरेचन १५८
तिलककल्प १५८
हरीतकीकल्प १५९
त्रिफलकल्प १५९
हरीतकी विधान १६०
चतुरङ्गुलकल्प १६०
ऐरण्डतैलकल्प १६०
स्तुहीक्षीरकल्प १६०
त्रिदूतमोदक १६१
औषधकल्पनाविधि १६१
पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
द्रव्यविधि की व्याख्या १६१
आन्तरिक्ष जल के गुण १६१
पानी के गिरने से स्थान विशेष के कारण भिन्न भिन्न रस को प्राप्त करता है १६१
लोहित, कपिल आदि भूमि में मधुर अम्ल आदि रस युक्त जल होते हैं १६२
अन्तरिक्ष जल के अभाव में आकाश गुण बहुल १६२
अन्तरिक्ष जल के चार प्रकार १६२
भूमि के पानी के सात प्रकार १६२
हर-श्रुतु में कौन सा जल लेना चाहिये १६३
न बरतने योग्य जल १६४